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मोदी की ताकत क्या है?
मनोज मिश्र
Updated Tue, 23 Jul 2013 08:41 PM IST
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लोकसभा चुनाव के बाद क्या समीकरण बनेंगे? नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो पाएंगे या नहीं? यह तय होना अभी शेष है। लेकिन, इतना तो साफ है कि मोदी देश की राजनीति में राष्ट्रीय फलक पर अपनी पहचान बना चुके हैं।
मौजूदा दौर की राजनीति में कोई भी चर्चा उनके बिना अधूरी है। मुख्यमंत्री से राष्ट्रीय नेता बनने तक का उनका सफर कई मायनों में किसी चमत्कार से कम नहीं है। गुजरात दंगों के बाद से ही वह आलोचनाओं के केंद्र में हैं। इसके बावजूद अगर उन्हें भावी प्रधानमंत्री के तौर पर देखा जा रहा है, तो इस परिघटना के प्रेरक तत्वों की पहचान करना जरूरी हो जाता है।
मोदी के उत्थान के लिए कई तरह के कारक जिम्मेदार हैं, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बदली रणनीति सबसे अहम है। संघ अभी तक भारतीय राजनीति में चोर दरवाजे से दखल देता रहा है। उसके जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी नामक चुनावी दस्ते कभी जनता पार्टी के सहारे, तो कभी अटल बिहारी वाजपेयी के तथाकथित धर्मनिरपेक्ष चेहरे की बदौलत भारतीय लोकतंत्र में अपने लिए जगह बनाते रहे हैं। यह पहली बार है कि संघ ने राजनीति में सीधे दखलंदाजी का फैसला किया।
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पिछले दिनों मेरठ में दिए गए संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयान में उसकी इस बदली रणनीति की अंतर्ध्वनियों को साफ सुना जा सकता है। भागवत का साफ-साफ कहना था कि कोई पसंद करे या न करे, हिंदुत्व ही वह तरीका है, जो देश में परिवर्तन लाएगा। उन्होंने आगे जोड़ा, ‘हमने नेता और एजेंडा, दोनों बदलकर देख लिया, लेकिन कुछ काम नहीं आया।’ ऐसे में संघ अब एक ऐसे चेहरे को आगे कर रहा है, जिसकी पहचान खांटी सांप्रदायिक है। गुजरात दंगों में जिसने अपनी प्राथमिकताओं को स्पष्ट कर दिया था।
मोदी भी संघ की आकांक्षाओं पर खरा उतरने के लिए कभी हिंदू राष्ट्रवाद, तो कभी 'धर्मनिरपेक्षता के बुरके' का मुद्दा उछाल रहे हैं। हिंदुत्व के इस नए पहरुए को बाजार का भी पूरा समर्थन हासिल है। पिछले 20 वर्षों से मनमोहन सिंह बाजार की आंख का तारा बने हुए थे। उन्होंने वह सब कुछ किया, जो बाजार की जरूरत थी।
मनमोहन सिंह की नीतियों की बदौलत ही बाजार ओडिशा, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे तमाम राज्यों के जंगलों से अमूल्य खनिज पदार्थों से लेकर कोयला तक, सब औने-पौने दामों में कब्जाने में सफल रहा है। मनमोहन सिंह की बदौलत ही स्पेक्ट्रम यानी आसमान से लेकर जमीन (किसानों की) तक सब बाजार को आसानी से उपलब्ध होती चली गई।
कोई वक्त था, जब मजदूर यूनियनें इस देश में अहम हैसियत रखती थीं। श्रम कानूनों की वजह से मजदूरों और कर्मचारियों का शोषण संभव नहीं था। आर्थिक उदारीकरण के दौरा में इन्हें षड्यंत्रपूर्वक कमजोर किया गया। आज हालत यह है कि यूनियनें अप्रासंगिक हो गई हैं। कोई भी उद्योगपति रातों-रात अपने सैकड़ों या फिर हजारों कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा देता है और कहीं से कोई आवाज तक नहीं उठती। सरकारें और उसके कानून पूरी निष्ठा के साथ बाजार के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं।
इतना सब करने के बावजूद बाजार की शक्तियां अब मनमोहन सिंह से खुश नहीं हैं। उन्हें लगता है कि आर्थिक सुधार, जिनकी बदौलत वे देश को और तेजी से लूट सकें, का नया दौर शुरू करने में मनमोहन सिंह अक्षम हैं। गठबंधन की राजनीति इसके आड़े आ रही है।
ऐसे में बाजार को मोदी के रूप में एक ऐसा शख्स दिखाई दे रहा है, जो उसकी अपेक्षाओं को पूरा कर सकता है। जो विकास के नाम पर इस देश की संपदा को लूटने की खुली छूट दे सकता है। इसलिए उसने अपनी वफादारी बदल ली है।
वैसे हिंदुत्व और बाजार के चहेते मोदी का उत्थान इस देश को कहां ले जाएगा, इसकी कल्पना भी भयावह है। 1947 के बंटवारे के बाद हिंदुओं और मुसलमानों के बीच अविश्वास का जो भाव पैदा हुआ था, उस पर बाद के वर्षों ने कुछ मरहम लगाया। लेकिन आतंकवाद के उभार के साथ ही अविश्वास की यह खाई और अधिक चौड़ी हो गई। यह एक ऐसी सच्चाई है, जिस पर कोई चर्चा तक नहीं करना चाहता। लेकिन रेत में सिर छिपाने से तूफान नहीं थम जाता।
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मौजूदा दौर की राजनीति में कोई भी चर्चा उनके बिना अधूरी है। मुख्यमंत्री से राष्ट्रीय नेता बनने तक का उनका सफर कई मायनों में किसी चमत्कार से कम नहीं है। गुजरात दंगों के बाद से ही वह आलोचनाओं के केंद्र में हैं। इसके बावजूद अगर उन्हें भावी प्रधानमंत्री के तौर पर देखा जा रहा है, तो इस परिघटना के प्रेरक तत्वों की पहचान करना जरूरी हो जाता है।
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मोदी के उत्थान के लिए कई तरह के कारक जिम्मेदार हैं, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बदली रणनीति सबसे अहम है। संघ अभी तक भारतीय राजनीति में चोर दरवाजे से दखल देता रहा है। उसके जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी नामक चुनावी दस्ते कभी जनता पार्टी के सहारे, तो कभी अटल बिहारी वाजपेयी के तथाकथित धर्मनिरपेक्ष चेहरे की बदौलत भारतीय लोकतंत्र में अपने लिए जगह बनाते रहे हैं। यह पहली बार है कि संघ ने राजनीति में सीधे दखलंदाजी का फैसला किया।
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पिछले दिनों मेरठ में दिए गए संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयान में उसकी इस बदली रणनीति की अंतर्ध्वनियों को साफ सुना जा सकता है। भागवत का साफ-साफ कहना था कि कोई पसंद करे या न करे, हिंदुत्व ही वह तरीका है, जो देश में परिवर्तन लाएगा। उन्होंने आगे जोड़ा, ‘हमने नेता और एजेंडा, दोनों बदलकर देख लिया, लेकिन कुछ काम नहीं आया।’ ऐसे में संघ अब एक ऐसे चेहरे को आगे कर रहा है, जिसकी पहचान खांटी सांप्रदायिक है। गुजरात दंगों में जिसने अपनी प्राथमिकताओं को स्पष्ट कर दिया था।
मोदी भी संघ की आकांक्षाओं पर खरा उतरने के लिए कभी हिंदू राष्ट्रवाद, तो कभी 'धर्मनिरपेक्षता के बुरके' का मुद्दा उछाल रहे हैं। हिंदुत्व के इस नए पहरुए को बाजार का भी पूरा समर्थन हासिल है। पिछले 20 वर्षों से मनमोहन सिंह बाजार की आंख का तारा बने हुए थे। उन्होंने वह सब कुछ किया, जो बाजार की जरूरत थी।
मनमोहन सिंह की नीतियों की बदौलत ही बाजार ओडिशा, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे तमाम राज्यों के जंगलों से अमूल्य खनिज पदार्थों से लेकर कोयला तक, सब औने-पौने दामों में कब्जाने में सफल रहा है। मनमोहन सिंह की बदौलत ही स्पेक्ट्रम यानी आसमान से लेकर जमीन (किसानों की) तक सब बाजार को आसानी से उपलब्ध होती चली गई।
कोई वक्त था, जब मजदूर यूनियनें इस देश में अहम हैसियत रखती थीं। श्रम कानूनों की वजह से मजदूरों और कर्मचारियों का शोषण संभव नहीं था। आर्थिक उदारीकरण के दौरा में इन्हें षड्यंत्रपूर्वक कमजोर किया गया। आज हालत यह है कि यूनियनें अप्रासंगिक हो गई हैं। कोई भी उद्योगपति रातों-रात अपने सैकड़ों या फिर हजारों कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा देता है और कहीं से कोई आवाज तक नहीं उठती। सरकारें और उसके कानून पूरी निष्ठा के साथ बाजार के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं।
इतना सब करने के बावजूद बाजार की शक्तियां अब मनमोहन सिंह से खुश नहीं हैं। उन्हें लगता है कि आर्थिक सुधार, जिनकी बदौलत वे देश को और तेजी से लूट सकें, का नया दौर शुरू करने में मनमोहन सिंह अक्षम हैं। गठबंधन की राजनीति इसके आड़े आ रही है।
ऐसे में बाजार को मोदी के रूप में एक ऐसा शख्स दिखाई दे रहा है, जो उसकी अपेक्षाओं को पूरा कर सकता है। जो विकास के नाम पर इस देश की संपदा को लूटने की खुली छूट दे सकता है। इसलिए उसने अपनी वफादारी बदल ली है।
वैसे हिंदुत्व और बाजार के चहेते मोदी का उत्थान इस देश को कहां ले जाएगा, इसकी कल्पना भी भयावह है। 1947 के बंटवारे के बाद हिंदुओं और मुसलमानों के बीच अविश्वास का जो भाव पैदा हुआ था, उस पर बाद के वर्षों ने कुछ मरहम लगाया। लेकिन आतंकवाद के उभार के साथ ही अविश्वास की यह खाई और अधिक चौड़ी हो गई। यह एक ऐसी सच्चाई है, जिस पर कोई चर्चा तक नहीं करना चाहता। लेकिन रेत में सिर छिपाने से तूफान नहीं थम जाता।