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आबादी से बनते-बिगड़ते शक्ति संतुलन

Thu, 29 Jun 2017 06:08 PM IST
बनवारी
बनवारी Updated Thu, 29 Jun 2017 06:08 PM IST
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Population-Deteriorating Power Balance
बनवारी

संयुक्त राष्ट्र ने विश्व की जनसंख्या के बारे में 2017 के जो संशोधित अनुमान घोषित किए हैं, उनके अनुसार सात वर्ष में भारत की आबादी चीन के बराबर हो जाएगी। उसके बाद भारत संसार का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश हो जाएगा। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या संबंधी यह अनुमान देशों और महाद्वीपों के आधार पर करता है। उसके अनुसार अभी जनसंख्या वृद्धि की जो दर है, उसे देखते हुए प्रतिवर्ष विश्व की जनसंख्या आठ करोड़ 30 लाख बढ़ जाती है। इस समय विश्व की आबादी सात अरब 60 करोड़ है।

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पिछले 12 वर्ष में उसमें एक अरब लोग जुड़े हैं। वृद्धि की गति कुछ धीमी हुई है, अब एक अरब आबादी बढ़ने में 13 वर्ष लगेंगे। अगर विश्व की आबादी अभी तक के अनुभव के अनुसार बढ़ी, तो इस शताब्दी के अंत तक वह स्थिर होगी  और  फ‌िर घटना शुरू कर देगी। पर तब तक विश्व की आबादी 11 अरब से अधिक हो गई होगी। 
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विश्व की आबादी के बारे में लगाए जाने वाले ये अनुमान सीमित अवधि के बारे में तो सही आकलन दे सकते हैं। पर लंबी अवधि के लिए उन पर भरोसा करना कठिन है। वैसे भी विश्व की जनसंख्या की दिशा को लेकर किया जाने वाला यह आकलन सतही है और वह हमें जनसंख्या के आधार पर बदल रहे विश्व के शक्ति संतुलन की सही जानकारी नहीं देता। जैसे, कुछ समय पहले तक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का अनुकरण करते हुए भारतीय विशेषज्ञ भी दोहराते थे कि भारत की आबादी तेजी से बढ़ रही है, देश में फैली गरीबी का यही प्रधान कारण है और जब तक हम इस पर अंकुश नहीं लगाते, हम आर्थिक विकास नहीं कर पाएंगे।
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हमारे विशेषज्ञों में एक भी ऐसा नहीं था, जो कहता कि कुछ शताब्दी पहले तक भारत की आबादी  विश्व में सबसे अधिक रही है। उसका बड़ा कारण यह था कि भारत में कृषि उत्पादक क्षेत्र सबसे अधिक है। अमेरिका, रूस या चीन का भौगोलिक क्षेत्र हमसे बहुत बड़ा है, पर हमारे पास उनसे अधिक उपजाऊ भूमि है। पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका हमारे बराबर आ पाया है, पर जल्दी ही फिर हम उससे आगे निकलने वाले हैं।

पिछली लगभग एक शताब्दी में जो वैज्ञानिक प्रगति हुई है, उससे यह भ्रामक धारणा फैली है कि जनसंख्या को योजनापूर्वक कम या अधिक किया जा सकता है। इसी धारणा के आधार पर प्रजनन को नियंत्रित करने या बढ़ाने वाली नीतियां बनती रही हैं। यूरोप या जापान की जनसंख्या वृद्धि थम गई है। सब कोशिशों के बाद भी वे उसे बढ़ा नहीं पा रहे। चीन ने अपनी जनसंख्या रोकने के लिए अपने यहां बहुत सख्ती से एक बच्चा प्रति परिवार का नियम लागू करने की कोशिश की, पर वह अपनी जनसंख्या वृद्धि नियंत्रित करने में सफल नहीं हो पाया। इतिहास में भारत के बाद सबसे अधिक आबादी चीन की रही है और अब कमोबेश वही स्थिति आती जा रही है। पिछले पांच सौ वर्ष में विश्व की जनसंख्या में जो असंतुलन आया था, वह पिछले पचास वर्ष में काफी दूर हो चुका है और आने वाले पचास वर्ष में लगभग पूरी तरह दूर हो जाएगा। 

हमें यूरोपीय विशेषज्ञों के आधार पर जनसंख्या को देशों और महाद्वीपों के आधार पर देखने की आदत पड़ गई है। पर जनसंख्या में वृद्धि की दिशा और उससे बनते-बदलते शक्ति संतुलन को समझने के लिए जातियों के आधार पर आकलन करना अधिक उपयोगी होगा। पिछले पचास वर्ष में विश्व में भारतीय मूल के लोगों की संख्या सबसे अधिक हो गई है। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश की सम्मिलित जनसंख्या एक अरब 71 करोड़ के आसपास है। भारत के बाद सबसे बड़ी आबादी यूरोपीय मूल के लोगों की है।

यूरोप संसार के भू-भाग का 6.7 प्रतिशत ही है। पर पिछले पांच सौ वर्षों में उन्होंने अमेरिकी महाद्वीप और आस्ट्रेलिया पर कब्जा कर अपने अधीन भू-भाग को बढ़ाकर 38 प्रतिशत कर लिया। पांच सौ वर्ष पहले उनकी आबादी विश्व की कुल आबादी का करीब 12 प्रतिशत थी। 19वीं शताब्दी के अंत तक वह 38 प्रतिशत हो गई थी। पिछले पचास वर्ष में घटकर वह अब 20-22 प्रतिशत के आसपास रह गई है। आज यूरोपीय मूल के लोगों की संख्या एक अरब 50-55 करोड़ है। उसके बाद चीन है, जिसकी आबादी एक अरब 40 करोड़ के आसपास है। 

विश्व की आबादी में सबसे बड़ा असंतुलन यूरोपीय लोगों के कारण ही आया था। जब 15वीं शताब्दी के अंत में वे अमेरिकी महाद्वीप में पहुंचे थे, तो उसकी आबादी दस करोड़ के आसपास थी। यूरोपीय लोगों ने आग्नेयास्त्र विकसित कर लिए थे, जिसके बल पर 50 वर्ष में ही उन्होंने अमेरिकी महाद्वीप की मूल 90 प्रतिशत आबादी समाप्त कर दी। आज खुद अमेरिकी विशेषज्ञ उसे मानव इतिहास के सबसे बड़े नरसंहार की संज्ञा देते हैं। अट्ठारहवीं सदी तक यूरोपीय मूल की आधी से अधिक आबादी यूरोप के बाहर रह रही थी। पर आर्थिक विकास और अप्राकृतिक जीवन ने उनकी आबादी को बढ़ने से रोक दिया। आज सबसे तेजी से अफ्रीका की जनसंख्या बढ़ रही है। यह वृद्धि दर कायम रही, तो इस शताब्दी के उत्तरार्द्ध में वे विश्व की सबसे बड़ी जाति होंगे। हो सकता है, उनका जन प्लावन अमेरिका और यूरोप का स्वरूप भी बदल दे।

आज अमेरिका संसार की सबसे बड़ी सामरिक शक्ति है और यूरोपीय मूल के लोग संसार की सबसे समृद्ध जाति हैं। पर पिछले 60-70 वर्ष में प्रकृति ने विश्व के जन-भूगोल को जिस तेजी से बदला है, आने वाले समय में उसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। यह आवश्यक नहीं कि आने वाले समय में सारा जोर औद्योगिक वस्तुओं के उत्पादन और उपभोग पर ही रहे। पिछली एक शताब्दी के आर्थिक विकास ने जो प्राकृतिक असंतुलन पैदा किया है, उससे ऊर्जा के अधिक संतुलित साधनों का आग्रह बढ़ सकता है। इससे रहन-सहन का स्वरूप बदलने की प्रेरणा भी मिल सकती है।


भविष्य में विश्व शक्तियां फिर से किसी महायुद्ध की ओर न बढ़ीं, तो भी दुनिया बड़े परिवर्तनों की ओर बढ़ेगी। द्वितीय महायुद्ध के बाद यूरोप और अमेरिका जिस तरह के औद्योगिक उपभोग की ओर बढ़े, वह अब तक शेष दुनिया के लिए मानक बना रहा है। पर यूरोप-अमेरिकी लोगों की आर्थिक समृद्धि में अब एक ठहराव आ गया दिखता है। आने वाले समय में अच्छे जीवन के मानक यूरोप-अमेरिकी अनुकरण से तय नहीं होंगे। 

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