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पर्यावरण: कहां गए रायपुर के तालाब, अनियोजित विकास ने खड़ा किया संकट

Sat, 27 May 2023 07:44 AM IST
Pankaj chaturvedi पंकज चतुर्वेदी
Updated Sat, 27 May 2023 07:44 AM IST
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सार
पहले रायपुर तालाबों की नगरी कहलाता था। राज्य बनते ही बहुत से घर, दफ्तर और सड़क की जरूरत महसूस हुई और तालाबोंं की बलि चढ़ने लगी।
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ponds disappearing in raipur chhattisgarh due to unplanned development
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में इस बार अप्रैल इतना गर्म नहीं था, लेकिन पानी की किल्लत चरम पर थी। यदि शहर की जल कुंडली देखें, तो चप्पे-चप्पे पर जल निधियों का जाल है, लेकिन नल रीते हैं और भूजल पाताल में। तीन साल पहले राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) में सुनवाई के समय सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार बताया गया कि शहर में कुल 227 तालाब हुआ करते थे, जिनमे से 53 सूख गए या भू-माफियाओं की भेंट चढ़ गए और 175 ही बाकी बचे। हाल ही में नगर निगम ने बताया है कि अब शहर में 109 तालाब ही बचे हैं यानी तीन साल में 66 तालाब लुप्त हो गए? लुप्त होने से पहले तालाब का क्षेत्रफल घटता है और फिर अचानक अस्तित्व खत्म हो जाता है।



छत्तीसगढ़ की राजधानी बनने से पहले रायपुर तालाबों की नगरी कहलाता था, पानी की न कभी नलों में कमी रहती थी और न आंखों में। राज्य बनते ही बहुत से घर, दफ्तर और सड़क की जरूरत महसूस हुई और देखते ही देखते ताल-तलैयों की बलि चढ़ने लगी। जीई रोड पर समानांतर तालाबों की एक शृंखला है, जिसकी खासियत है कि निचले हिस्से में बहने वाले पानी को यू-शेप  का तालाब बनाकर रोका गया है। ब्लॉक सिस्टम के तहत हांडी तालाब, कारी, धोबनी, घोडारी, आमा तालाब, रामकुंड, कर्बला और चौबे कालोनी के तालाब जुड़े हुए हैं। बूढ़ा तालाब व बंधवा के ओवर फ्लो का खारून नदी में मिलना एक विरली पुरानी तकनीक रही है। बेतरतीब निर्माण ने तालाबों के अंतर्संबंधों, नहरों और जल आवक रास्तों को ही अवरुद्ध नहीं किया, सूखे को भी दावत दी। रही-सही कसर लोगों की धार्मिक आयोजनों में बढ़ती रुचि ने पूरी कर दी। हर साल मूर्तियों का विसर्जन इन्हीं तालाबों में हो रहा है। प्लास्टर ऑफ पेरिस, रासायनिक रंग, प्लास्टिक के सजावटी सामान, अभ्रक, आर्सेनिक, थर्मोकोल आदि इन तालाबों को उथला, जहरीला व गंदला कर रहे हैं।


कहते हैं कि सन 1402 के आसपास राजा ब्रहृदेव ने रायपुर की स्थापना की थी और तभी बूढ़ा तालाब बना था। यह अन्य तालाबों से जुड़ा था, इसमें पानी लबालब होते ही महाराजबंध तालाब में पानी जाने लगता था और उसके आगे अन्य किसी में। आजादी के बाद तक 100 एकड़ में फैला महाराजबंध तालाब अब महज 33 एकड़ में सिमटकर रह गया है। सरकारी एजेंसियों ने भी इस पर सड़क बनाकर कब्जों को मान्यता दे दी।

बताया जाता है कि इस तालाब के किनारे से कोलकाता-मुंबई और जगन्नाथ पुरी जाने के रास्ते निकलते थे। बताते हैं कि एक बार पृथ्वीराज कपूर रायपुर आए थे, तो वह बूढ़ा तालाब को देखकर मंत्र-मुग्ध हो गए थे। वह जितने दिन भी यहां रहे, हर रोज यहां नहाने आते थे। लेकिन आज यह बदहाली का शिकार होकर रह गया है। अब इसका नाम भी विवेकानंद तालाब हो गया है। यही कहानी दीगर तालाबों की है। शहर के कई चर्चित तालाब देखते-देखते ओझल हो गए- रजबंधा तालाब की जगह पर आज चौरस मैदान है। सरजूबंधा को पुलिस लाइन लील गई, तो खंतो तालाब पर शक्तिनगर कॉलोनी बन गई। पचारी, नया तालाब और गोगांव ताल को उद्योग विभाग के हवाले कर दिया गया, तो ढाबा तालाब (कोटा) और डबरी तालाब (खमरडीह) पर कब्जे हो गए। ऐसे ही कंकाली ताल, ट्रस्ट तालाब, नारून तालाब आदि दसियों तालाबों पर या तो कब्जे हो गए या फिर वे सिकुड़ गए।

छत्तीसगढ़ में तालाब एक लोक परंपरा व सामाजिक दायित्व रहा है। यहां का लोनिया, सबरिया, बेलदार, रामनामी जैसे समाज पीढ़ियों से तालाब गढ़ते आए हैं। अंग्रेजी शासन के समय पड़े भीषण अकाल के दौरान खूब तालाब खुदवाए गए थे और ऐसे कई सौ तालाब पूरे अंचल में ‘लंकेटर तालाब’ के नाम से आज भी हैं। रायपुर का तेलीबांधा तालाब 1929-30 के पुराने राजस्व रिकॉर्ड में 35 एकड़ का था, लेकिन आज इसके आधे हिस्से में भी पानी नहीं है।

अब तो नया रायपुर बन रहा है, और इसे बनाने में न जाने कितने ताल-तलैया, जोहड़, नाले दफन हो गए हैं। यहां खूब चौड़ी सड़कें हैं, ऊंचे भवन हैं, सब कुछ चमक रहा है, लेकिन इस नई बसाहट के लिए पानी कहां से आएगा-यह बड़ा सवाल है।

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