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बेवजह का टकराव

Tue, 12 Aug 2014 07:38 PM IST
एम वीरप्पा मोइली
एम वीरप्पा मोइली Updated Tue, 12 Aug 2014 07:38 PM IST
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Unnecessary confrontation

कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया पर नियंत्रण को लेकर होने वाले विवाद की जड़ें उस केस तक जाती हैं, जो 'फर्स्ट जजेज' मामले के नाम से चर्चित है। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश पी एन भगवती की अध्यक्षता में कार्यपालिका के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा था, 'भारत के मुख्य न्यायाधीश, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और सर्वोच्च व उच्च न्यायालय के दूसरे सभी न्यायाधीशों को सांविधानिक दर्जा मिला हुआ है, और केंद्र सरकार को यह अधिकार है कि इनमें से वह जिससे जरूरी समझे, सलाह ले सकती है। साफ है कि इनकी भूमिका पूरी तरह से सलाहकारी है। और ऐसी नियुक्तियों के मद्देनजर अंतिम शक्ति एकमात्र केंद्र सरकार के हाथ में है।'

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हालांकि 1993 के 'सेकंड जजेज' मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले को पलट दिया। इस समय मुख्य न्यायाधीश्ा थे, जे एस वर्मा। जस्टिस वर्मा के मुताबिक उच्चतर न्यायिक नियुक्तियों के संदर्भ में कार्यपालिका भारत के मुख्य न्यायाधीश की राय को तरजीह देती है। इसी आधार पर उन्होंने फैसला सुनाया, 'ऐसी नियुक्तियों के लिए सहभागी परामर्शदायी प्रक्रिया होनी चाहिए, जिसमें कार्यपालिका की भूमिका भारत के मुख्य न्यायाधीश के कार्यों पर नजर रखने की हो, ताकि सांविधानिक उदे्श्यों को पूरा किया जा सके।' हालांकि बाद में जस्टिस वर्मा ने अपने इस फैसले की पुनर्समीक्षा की, फिर भी उनके इस फैसले ने उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली की नींव डाल दी।
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मगर इस प्रणाली को व्यवस्थित रूप 'थर्ड जजेज' मामले में मिला, जब देश के मुख्य न्यायाधीश थे, एस पी भरूचा। उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्तियों के संदर्भ में इस फैसले में कहा गया, 'भारत के मुख्य न्यायाधीश की सलाह का कॉलेजियम में सबसे ज्यादा महत्व होगा, हालांकि उच्च न्यायालय के दूसरे न्यायाधीशों और सर्वोच्च न्यायालय के उन न्यायाधीशों से भी सलाह ली जाएगी, जो संबंधित उच्च न्यायालय से जुड़े मामलों के विशेषज्ञ हों।' गौरतलब है कि इस फैसले ने न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया से कार्यपालिका को पूरी तरह बाहर कर दिया। जस्टिस भरूचा ने इस संदर्भ में घोषणा की, 'संस्थागत परामर्श पर काम करने वाला देश का मुख्य न्यायाधीश ही न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बरकरार रखने का सबसे पुख्ता और सुरक्षित जरिया हो सकता है।'
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न्यायपालिका की स्वतंत्रता के दो अर्थ हैं। पहला, न्यायपालिका और न्यायाधीशों से जुड़े किसी भी मामले में विधायिका, कार्यपालिका राजनीतिक दलों और दूसरे शक्तिशाली निजी हितों का कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। और दूसरा, कोई भी न्यायाधीश बगैर किसी दबाव के अपना फैसला सुनाने के लिए स्वतंत्र होगा। दरअसल सिर्फ कहने के लिए न्यायपालिका का स्वतंत्र होना काफी नहीं है, बल्कि ऐसा महसूस भी होना चाहिए। इसी संदर्भ में एम एन वेंकटचेलैय्या की अध्यक्षता वाले आयोग ने न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए एक राष्ट्रीय न्यायिक आयोग के गठन की सिफारिश की थी, जिसमें कार्यपालिका और न्यायपालिका की प्रभावी सहभागिता हो। वहीं दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग की भी राय थी कि उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति को राजनीति से परे होना चाहिए, और इसमें कार्यपालिका, विधायिका और मुख्य न्यायाधीश की पूरी सहभागिता होनी चाहिए।

हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एक सांविधानिक संशोधन विधेयक के जरिये राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन पर मोहर लगाई है। उम्मीद की जा रही है कि इससे न्यायाधीशों की नियुक्ति-प्रक्रिया में बड़ा बदलाव आएगा, और इसमें न्यायपालिका व कार्यपालिका को वीटो करने की बराबर की शक्ति होगी। इस छह सदस्यीय आयोग में देश के मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश, केंद्रीय कानून मंत्री और दो अन्य प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल होंगे। इन प्रतिष्ठित व्यक्तियों का चुनाव एक समिति करेगी, जिसमें प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश, विपक्ष के नेता या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता शामिल होंगे। इनमें से एक व्यक्ति अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, महिला वर्ग या अल्पसंख्यक समुदाय से होगा।

दरअसल संविधान के आधारभूत लक्षणों को सुरक्षित रखने के लिए न्यायपालिका की स्वतंत्रता बेहद जरूरी है। केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामले, जिसमें संविधान के आधारभूत लक्षणों की व्याख्या की गई थी, के तहत भी संसद को संविधान में संशोधन करने की पूरी ताकत दी गई है। मगर फिर भी न्यायालय की सलाह लिए बगैर न्यायिक नियुक्ति आयोग का गठन न सिर्फ न्यायपालिका की नाराजगी का सबब बन सकता है, बल्कि इससे एक सांविधानिक संकट भी पैदा हो सकता है। गौरतलब है कि कौन-सा कानून संविधान का उल्लंघन करता है, इसका निर्धारण करने का दायित्व केशवानंद भारती मामले के तहत न्यायपालिका का ही है।


इस पर आम सहमति है कि जिस न्यायिक नियुक्ति आयोग की बात हो रही है, वह कॉलेजियम प्रणाली को प्रतिस्थापित करने में मददगार साबित होगा। और इसके तहत न्यायपालिका की स्वतंत्रता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा, और न ही कार्यपालिका को अतिरिक्त शक्ति मिलेगी। मगर जिस तरह से जल्दबाजी में एनडीए सरकार यह विधेयक लेकर सामने लाई है, उसमें कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच तमाम विवादों की आशंका पैदा हो गई है। ऐसे फैसले से पहले अगर न्यायपालिका को भरोसे में ले लिया जाता, तो नाहक विवाद से बचा जा सकता था। हालांकि न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच वार्ता के दरवाजे खोलने में अभी देर नहीं हुई है। फिर यह भी समझना होगा कि संविधान की रक्षा करने का अंतिम दायित्व तो न्यायपालिका का ही है।

(लेखक पिछली यूपीए सरकार में विधि मंत्री थे)

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