फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   politics on hours of work

काम के घंटों पर राजनीति

Thu, 21 Feb 2013 09:28 PM IST
उमेश चतुर्वेदी
उमेश चतुर्वेदी Updated Thu, 21 Feb 2013 09:28 PM IST
विज्ञापन
politics on hours of work

अगर हफ्ते में सिर्फ चार दिन ही काम करना पड़े और बाकी तीन दिनों तक छुट्टी हो तो कैसा रहे? कॉर्पोरेटीकरण के दौर में ऐसे विचारों को विकास विरोधी ही माना जाएगा। लेकिन अफ्रीकी देश जांबिया के राष्ट्रपति याहिया जामेह ने सरकारी कर्मचारियों के लिए चार दिन के दफ्तर का आदेश जारी किया है।

विज्ञापन


विपक्ष विकास विरोधी बताकर इस कदम का विरोध कर रहा है। राष्ट्रपति का तर्क है कि सप्ताह के छह दिनों तक काम करने वाले लोग अपनी क्षमता से काम नहीं करते हैं। इसलिए हफ्ते में सिर्फ चार दिन ही अगर लोगों को रोजाना आठ घंटे के बजाय दस घंटे काम करना पड़े, तो लोगों की उत्पादकता बढ़ेगी।
विज्ञापन


लोग सामाजिक कार्यों में हिस्सा ले सकेंगे, खेती और बागवानी कर सकेंगे और नमाज पढ़ सकेंगे। राष्ट्रपति का यह तर्क ही विपक्षियों पर भारी पड़ रहा है। बहरहाल किसी विकासशील देश में ऐसा प्रयोग पहली बार हो रहा है, लिहाजा इसके नतीजे आने बाकी हैं। लेकिन इस बहाने कॉर्पोरेटीकरण के दौर में काम से उपजे तनावों ने ध्यान जरूर खींचा है।
विज्ञापन
विज्ञापन


भारतीय समाज में पहले खेती (व्यापक अर्थों में अपने काम को) सर्वोत्तम माना जाता था। उसमें जरूरत के मुताबिक मेहनत की जाती थी। काम के घंटे बांधने का चलन यूरोप में हुई औद्योगिक क्रांति के बाद आया। औद्योगिक क्रांति के दिनों में तो मजदूर महीने में छुट्टी के लिए तरस जाते थे। यह तो शुक्र है उन्नीसवीं सदी के मजदूर आंदोलन का, जब काम के घंटे सीमित किए जाने लगे और मजदूरों को छुट्टियां दी जाने लगीं।

चूंकि उन दिनों  पूरी दुनिया में यूरोपीय देशों का ही आधिपत्य था, लिहाजा यूरोप से उठी यह बयार पूरी दुनिया में लागू हो गई। इससे काम में अनुशासन तो आया, लेकिन इसने मानसिक तनाव से भी परिचित कराया। आज काम के घंटे और खुद को साबित करने का दबाव इतना ज्यादा है कि हर दूसरा व्यक्ति मानसिक तनाव का शिकार है।

अवसाद के रोगियों में इजाफा भी विकासशील दुनिया में हो रहा है, जिसमें भारत भी शामिल है। भारत जब आजाद हुआ था, तब तमाम मोर्चों पर बहुत ज्यादा काम करना था। लिहाजा पंडित नेहरू ने नारा दिया था- आराम हराम है। लेकिन सवाल यह है कि क्या बिना आराम के मानवीय स्वास्थ्य के साथ इंसाफ किया जा सकता है।
 स्वास्थ्य विज्ञानी भी बेहतर स्वास्थ्य के लिए मेहनत के साथ आराम की जरूरत पर बल देते हैं। जब तक भारत में उदारीकरण नहीं था, श्रम कानून दूसरे थे। तब तक हर मजदूर के लिए काम के घंटे नियत थे और उनके अधिकार भी सुरक्षित थे। लेकिन कॉर्पोरेटीकरण और उदारीकरण के दौर में अब ये चीजें, खासकर निचले तबके के कर्मचारियों के लिए सीमित हो गई हैं।

हायर और फायर की अमेरिकी अवधारणा से प्रेरित नए श्रम कानूनों ने देश में उत्पादकता भले ही बढ़ाई हो, पर मानवीय संवेदनाओं के साथ जमकर अन्याय किया है। आज हर दूसरा नागरिक समय की कमी का रोना रो रहा है। महानगरों में तो उसके सामाजिक सरोकार बेहद सीमित हो गए हैं। 2004 में तो एक बहस ही चली थी कि आखिर देश में छुट्टियां इतनी हो ही क्यों। दरअसल हमने कॉर्पोरेटीकरण की अवधारणा यूरोप और अमेरिका से ले तो ली, लेकिन उन देशों में लागू सामाजिक सुरक्षा दायित्वों का लेशमात्र भी हमने स्वीकार नहीं किया।

जहां तक हफ्ते में चार दिन काम का सवाल है, तो ठीक इसी रूप में तो नहीं, लेकिन काम के लचीले घंटों के तौर पर दुनिया भर की आईटी कंपनियों में लागू हो चुका है। यूरोप और अमेरिका की कई कंपनियां तो अपने घरों से ही लोगों को काम करने की छूट दे रही हैं। उनका तर्क है कि इससे उनकी लागत कम होती है, मसलन ऑफिस में खर्च होने वाली बिजली, ऑफिस का किराया और चाय-पानी जैसे खर्च बच जाते हैं।


लैसेस्टर यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान विशेषज्ञ कैरी कूपर्स का कहना है कि यह एक किस्म की बेवकूफी ही है कि लोग सुबह आठ बजे से शाम के सात बजे तक दफ्तर में बैठे रहें। तकनीक बदल गई है, लिहाजा हमें काम के घंटों में लचीलापन लाने के बारे में सोचना चाहिए और लोगों को खुलकर काम करने की आजादी देनी चाहिए। अब देखना यह है कि क्या लैरी के विचारों को दुनिया मान्यता दे पाती है!

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed