फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Politics of information in india

भारत में सूचना की राजनीति : महत्वपूर्ण सवाल है कि सूचना क्या है और यह कैसे पैदा होती है?

Fri, 09 Aug 2019 12:43 AM IST
संजय चक्रवर्ती संजय चक्रवर्ती
संजय चक्रवर्ती Published by: संजय चक्रवर्ती Updated Fri, 09 Aug 2019 12:43 AM IST
विज्ञापन
Politics of information in india
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : a

अपनी हालिया प्रकाशित पुस्तक-द ट्रुथ अबाउट अस : द पॉलिटिक्स ऑफ इन्फॉर्मेशन फ्रॉम मनु टू मोदी- में मैंने यह दर्शाया है कि पिछली दो शताब्दी से ज्यादा समय से भारत के सामाजिक सत्य कैसे बनते आए हैं, कि कैसे यह आकार लेता है और इसके राजनीतिक एवं सामाजिक परिणाम क्या हैं। किसी भी समाज के 'सत्य' का निर्माण सूचनाओं के बुनियादी तत्वों के संगठन से होता है। सूचना का संचयन और संगठन 'सत्य' बन जाता है। अब यहां महत्वपूर्ण सवाल है कि सूचना क्या है। यह कैसे पैदा होती है?


loader

अपनी हालिया प्रकाशित पुस्तक-द ट्रुथ अबाउट अस : द पॉलिटिक्स ऑफ इन्फॉर्मेशन फ्रॉम मनु टू मोदी- में मैंने यह दर्शाया है कि पिछली दो शताब्दी से ज्यादा समय से भारत के सामाजिक सत्य कैसे बनते आए हैं, कि कैसे यह आकार लेता है और इसके राजनीतिक एवं सामाजिक परिणाम क्या हैं। किसी भी समाज के 'सत्य' का निर्माण सूचनाओं के बुनियादी तत्वों के संगठन से होता है। सूचना का संचयन और संगठन 'सत्य' बन जाता है। अब यहां महत्वपूर्ण सवाल है कि सूचना क्या है। यह कैसे पैदा होती है?

सही जानकारी के रूप में क्या स्वीकार किया जाता है, किनके द्वारा और क्यों? ये महत्वपूर्ण सवाल सूचना की राजनीति के मूल आधार हैं, जिनमें सत्ता के लोगों की पसंद, कि क्या सूचना है और क्या नहीं, सूचनाओं को समूहों में वर्गीकृत करना, श्रेणियों को भरने के लिए गणना और जिन्हें श्रेणीबद्ध किया गया है, उनसे संचार शामिल होते हैं। इन विकल्पों में से प्रत्येक महत्वपूर्ण है, वर्गीकरण सबसे ज्यादा परिणामदायी है। प्रत्येक चरण पर प्रत्येक विकल्प एक अलग सामाजिक स्थिति के लिए एक अलग रास्ता बनाता है।

भारत की सामाजिक पहचान का मौजूदा विस्तार (यानी कि धर्मों, जातियों और जनजातियों का विस्तार) ऐसे विकल्पों की शृंखला का नतीजा है, जिन्हें सत्ताधारी लोगों ने विभिन्न समय पर चुना है। भारत की सामाजिक सच्चाई के नाम पर हमारे सामने जो कुछ हैं, वे वस्तुनिष्ठ नहीं, बल्कि विषयनिष्ठ हैं। इसे जटिलता को सरल करने और उन लोगों के हितों की सेवा के लिए बनाया गया था, जिन्होंने सत्य रचा। सूचना की राजनीति को तीन मूल तत्व आकार देते हैं- सत्ता, प्रौद्योगिकी और सरलीकरण।

इनमें सत्ता सबसे महत्वपूर्ण है। सत्ता किसके पास है, कितनी है, वह अपनी पसंद को वास्तविकता के रूप में किस प्रभावी तरीके से स्थापित कर सकता है, अपनी पसंद बनाते समय इसके बारे में वह कितना जानता और विश्वास करता है, अपनी पसंद के जरिये वह क्या हासिल करना चाहता है, उसके हित क्या हैं, आदि इस संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण सवाल हैं। 'सूचना ही शक्ति है' एक घिसी-पिटी बात है। सूचना क्या है, यह तय करने की क्षमता, उन्हें वर्गीकृत करना और उनके नाम देना ही सच्ची शक्ति है।  

जाति से लेकर राष्ट्रीयता तक और आपराधिकता से लेकर मानसिक क्षमता तक- हर ठप्पा सत्ता में बैठे लोगों द्वारा चुने जाने का परिणाम है, जो उन लोगों पर नियंत्रण और वर्चस्व रखते हैं, जिन पर उन्होंने ठप्पा लगाया है। मसलन, भारत की जनजातीय (आदिवासी) आबादी को हिंदू के रूप में वर्गीकृत करना एक चुनाव है। इसे जनजातीय लोगों ने खुद नहीं गढ़ा है, बल्कि श्रेणी बनाने वाले लोगों द्वारा ऐसा किया गया है।

गौर कीजिए कि यह कितना समस्याग्रस्त है। यदि 'जाति' हिंदू समाज की सर्वव्यापी और केंद्रीय विशेषता है, तो भारत के ये आदिवासी हिंदू कैसे हो गए? जब भारत के आदिवासियों को 19वीं सदी के उत्तरार्ध और 20 वीं सदी के प्रारंभ में 'हिंदू' की श्रेणी में रखा गया था, तो उनके बीच कोई ब्राह्मण या क्षत्रिय नहीं था और न ही जाति बहिष्कृत। संस्कृत को हिंदुत्व की संपर्क भाषा माना जाता है, जिसकी आदिवासी समाज में मौजूदगी नहीं थी। वे अलग देवी-देवता की पूजा करते थे, और उनका खानपान अलग था। तो फिर किस चीज ने उन्हें हिंदू बना दिया?

सूचना प्रौद्योगिकी का स्तर भी सूचना गढ़ने, उसके प्रबंधन और उसकी राजनीति के लिए महत्वपूर्ण है। प्रत्येक सूचना का चुनाव एक विशिष्ट तकनीकी दायरे में होता है जो कुछ चीजों को होने देता है और दूसरों को नहीं। नई सूचना प्रौद्योगिकी सूचना की मात्रा और उन लोगों की संख्या, दोनों का विस्तार करती हैं, जो इसे हासिल कर सकते हैं। वह केंद्रित शक्ति को कमजोर करती है, भले ही वह नई सामाजिक संरचना और सामाजिक समस्याएं पैदा करे।

भारत में जब सूचनाएं कछ हस्तलिखित पोथियों में मौजूद थीं, तब कुछ सुविधाजनक सूचनाएं और उनके व्याख्याकार सूचना निर्माण की प्रक्रिया में प्रमुख हो गए। मेरा मानना है कि इसी तरह हिंदू धर्म बना। लेकिन सूचना प्रौद्योगिकी बाद में कम से कम दो क्रांतियों का साक्षी बनी। प्रिटिंग प्रेस आया, जिसने ज्यादा लोगों और समूहों को सूचनाओं के निर्माण और उसे प्राप्त करने में सक्षम बनाया। प्रिंटिंग प्रेस भारतीय विचार और राजनीतिक संगठन के गठन और विकास की कुंजी बन गया।

इसने सीधे तौर पर दो प्रमुख ताकतों का नेतृत्व किया-उपनिवेश-विरोधी राष्ट्रवाद (तिलक, राय, गांधी, बोस और नेहरू का) तथा हिंदू एकीकरण (सावरकर, गोलवलकर और दीनदयाल उपाध्याय का)। पिछले करीब ढाई दशक से भारत और विश्व डिजिटल और मोबाइल प्रौद्योगिकी द्वारा संचालित एक नई सूचना क्रांति से गुजर रहे हैं। प्रचुर जानकारी और गलत सूचनाओं के इस दौर में प्रौद्योगिकी महत्वपूर्ण हो गयी है, जिसे लोग जानते और मानते हैं।

सूचना के निर्माण और प्रबंधन को मैंने साधारण जानकारी के सिद्धांत के रूप में प्रतिपादित किया है। यह इस स्वयंसिद्ध तथ्य पर आधारित है कि हर जगह के सभी लोग जटिल सूचनाओं पर सरल सूचना को तवज्जो देते हैं। सरल जानकारी को वरीयता देने की बात हमारे दिमाग से उत्पन्न होती है। जानकारी का सरल रूप दोहरा रूप लिए होता है (भोजन या जहर, दोस्त या दुश्मन, पक्ष या विपक्ष) और यह श्रेणियों व आख्यानों पर आधारित होता है।

सरल जानकारी को प्राथमिकता व्यक्तिगत या संस्थागत, दोनों तरह से मिलती है। इन सरलीकरणों से निश्चित रूप से रोजमर्रा के भेदभाव और असमानताएं पैदा होती हैं, और युद्ध व नरसंहार जैसे बड़े पैमाने पर हिंसा को भी उचित ठहराया जा सकता है। ये सरल स्टीरियोटाइप और पूर्वाग्रह रोजमर्रा के व्यवहार से जुड़ जाते हैं। वे विभिन्न व्यावहारिक तरीकों से हमारे बारे में सच्चाई बन जाते हैं।

सरल जानकारी का सिद्धांत यह समझने के लिए महत्वपूर्ण है कि कैसे ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने भारत की तत्कालीन सामाजिक संरचना के बारे में कल्पना कर ली थी कि वे पहले भी अस्तित्व में थी। यह भारत में सच के बारे में दो मुख्य दावों- हिंदू एकरूपतावाद और बहुलतावादियों-के बारे में जानने के लिए भी महत्वपूर्ण है, जो इन दिनों आपस में जूझ रहे हैं।      

-लेखक टेंपल यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed