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राजनीतिक सुस्ती : ओटीपी के युग में पते का प्रमाण मांगना, सौ करोड़ से अधिक भारतीयों की जीवन सुगमता की आकांक्षा

Tue, 03 May 2022 06:32 AM IST
Shankar Ayair शंकर अय्यर
Updated Tue, 03 May 2022 06:32 AM IST
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सार
वर्ष 2011 कीजनगणना बताती है कि 45 करोड़ से ज्यादा लोग उन जगहों पर नहीं रहते, जहां उनका जन्म हुआ। आंतरिक प्रवास जिलों के भीतर, राज्यों के भीतर और देश भर में हो सकता है। इसके अलावा दस करोड़ से ज्यादा लोग विभिन्न राज्यों में मौसमी प्रवास करते हैं। बचत करने, खर्च करने और पैसे भेजने के लिए उन्हें बैंकिंग सुविधा की जरूरत होती है।
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Political lethargy: In the era of OTP, asking for proof of address, more than 100 crore Indians aspire for ease of living
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : istock

विस्तार

सौ करोड़ से अधिक भारतीयों की जीवन सुगमता की आकांक्षा अक्सर राजनीतिक सुस्ती और प्रणालीगत उदासीनता के बीच फंसी पाई जाती है। शासन प्रभावी रूप से दो दुनियाओं के बीचफंसा हुआ है। एक डिजिटल प्रणाली है, जहां भारतीय 21वीं सदी के परिणामों का आनंद उठाते हैं और फिर तीसरी दुनिया का अनुभव है, जहां शासन अब भी औपनिवेशिक खुमार से उबर रहा है। इसका सटीक उदाहरण भारतीय पासपोर्ट बनवाने या उसका नवीनीकरण कराने की प्रक्रिया में प्रकट होता है। 



इस प्रक्रिया का पहला हिस्सा पहली दुनिया है, जिसका श्रेय टीसीएस द्वारा तैयार और विदेश मंत्रालय द्वारा सक्षम प्रणाली को जाता है। आवेदक ऑनलाइन एक फॉर्म भरता है। फिर उसे मिलने की एक तिथि मिलती है, जिस दिन वह केंद्र पर जाता है और जरूरी दस्तावेज सौंपता है। यदि सब कुछ ठीक रहा, तो एक पखवाड़े के भीतर उसे पासपोर्ट मिल जाता है। दूसरे चरण में 'पुलिस सत्यापन' प्रक्रिया के लिए उसे उत्तर-औपनिवेशिक दुनिया में लौटना पड़ता है। 


पहले से ही काम के बोझ से दबे पुलिस विभाग (जहां हर पांचवां पद खाली है) को हर वर्ष एक करोड़ से अधिक आवेदकों के पते और पिछले जीवन का सत्यापन करना पड़ता है। सत्यापन के लिए पुलिस विभाग या तो एक अधिकारी को आवेदक के घर भेजता है या उसे पुलिस स्टेशन में बुलाता है। कल्पना कीजिए कि आपको अपने पासपोर्ट का नवीनीकरण कराना है, पर आपने घर बदल लिया है! पासपोर्ट जारी करने वाला प्राधिकरण (केंद्रीय पासपोर्ट संगठन) दो दस्तावेज चाहता है-पहचान का प्रमाण और पते का प्रमाण। 

आप आधार कार्ड/ड्राइविंग लाइसेंस और बैंक स्टेटमेंट देते हैं। अब यह मानते हुए, कि पिछला जीवन स्पष्ट है, पुलिस विभाग को पहचान और पते के उन्हीं दस्तावेजों की जांच करने का काम सौंपा जाता है, जिन्हें जारी करने वाला प्राधिकारी पहले ही जांच चुका है। क्या अंतरविभागीय विश्वास इतना कमजोर है कि एक विभाग को वही काम दोहराना होगा, जो पहले ही हो चुका है? जाहिर है, कानून को पहचान सत्यापित करने के लिए सिस्टम की जरूरत होती है, ताकि कोई धोखाधड़ी से पासपोर्ट न ले रहा हो। 

पासपोर्ट प्राधिकरणप्रत्येक आवेदक के बायोमेट्रिक्स को पंजीकृत करता है। आधार पर एक  अरब से अधिक लोग पंजीकृत हैं। क्या ओटीपी के जमाने में तकनीक इसका समाधान नहीं हो सकती? यात्रा दस्तावेज पर पते का प्रकाशन समस्याएं बढ़ाता है। कई देशों (ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा और यहां तक कि इस्राइल) के पासपोर्ट पर घर का या कोई अन्य पता नहीं होता, जबकि कुछ केवल यात्रा दस्तावेज भेजने के लिए संपर्क पता चाहते हैं। इसलिए यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि भारतीय पासपोर्ट में आवासीय पता क्यों दिया जाना चाहिए। 

पता मांगने की यह लत केवल पासपोर्ट तक सीमित नहीं है-इसका असर नागरिकों को बुनियादी सेवाएं तक पाने के संघर्ष में दिखाई देता है। उदाहरण के लिए, बैंक में खाता खुलवाने के लिए भी पता देना होता है। तथ्य यह है कि ग्राहक अपना पैसा बैंक में जमा कर रहा है, इसलिए ग्राहक प्रमुख है और बैंक एजेंट है। रिजर्व बैंक के आंकड़े बता रहे हैं कि ज्यादातर बैंकिंग कार्य डिजिटल होते हैं, फिर भी बैंक सबूत के साथ जानना चाहते हैं कि आप कहां रहते हैं। 

सच है कि राष्ट्रीय कानूनों और अंतरराष्ट्रीय संधियों को देखते हुए बैंकों के लिए केवाईसी सुनिश्चित करना आवश्यक है। यह भी उतना ही सच है कि बैंक ग्राहकों की पहचान या तो आधार या सरकार द्वारा जारी दस्तावेज के जरिये करते हैं। तो ऐसे युग में, जब जगहें बदलना आम बात है, व्यवस्था इस पर जोर क्यों देती है कि ग्राहक घर बदलने पर हर बार पते का प्रमाण दे? सच्चाई यह है कि जहां-जहां अवसर और संभावनाएं होती हैं, भारतीय वहां-वहां जीवन और आजीविका की तलाश में जाते रहते हैं। 

वर्ष 2011 कीजनगणना बताती है कि 45 करोड़ से ज्यादा लोग उन जगहों पर नहीं रहते, जहां उनका जन्म हुआ। आंतरिक प्रवास जिलों के भीतर, राज्यों के भीतर और देश भर में हो सकता है। इसके अलावा दस करोड़ से ज्यादा लोग विभिन्न राज्यों में मौसमी प्रवास करते हैं। बचत करने, खर्च करने और पैसे भेजने के लिए उन्हें बैंकिंग सुविधा की जरूरत होती है। लेकिन जो लोग खाता खुलवाना चाहते हैं, उनसे पते का प्रमाण मांगा जाता है। सभी भारतीय नौकरी नहीं करना चाहते। 

छोटे शहरों के लोग उद्यमी बनना चाहते हैं। छोटे व्यवसाय स्थापित करने के लिए अक्सर उन्हें बैंकिंग सुविधा के लिए संघर्ष करना पड़ता है। सिस्टम आर्थिक जुड़ाव के लिए आधार और संचार पते को एक टेम्प्लेट के रूप में क्यों नहीं जोड़ सकता? पता मांगने की इस लत के कारण अन्य सेवाएं भी प्रभावित होती हैं, विशेष रूप से पंचायत, नगरपालिका और राज्य सरकार के विभागों द्वारा दी जाने वाली सेवाएं। यह देखते हुए, कि बहुत से भारतीय अपना घर लेने से पहले किराये में रहते हैं, नई वास्तविकता को स्वीकार करने में सरकार का क्या जाता है? 

उसे लोगों को सेवाओं तक पहुंचने में सक्षम बनाने के लिए एक व्यवस्थित समाधान के साथ आना चाहिए, चाहे वे कहीं भी रह रहे हों। 15 अगस्त, 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की थी कि स्वतंत्र भारत के लिए 'जीवन की सुगमता' अनिवार्य है और हम इस पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं और इसे आगे ले जाना चाहते हैं। ऐसा करने के लिए सरकार को अविश्वास की भावना खत्म करनी होगी। जीवन सुगमता की चर्चा इस सरकार ने कई बार की है। 

लेकिन प्रणालीगत सुस्ती सरकारी इरादे पर हावी रही, जिससे वादा हकीकत में नहीं बदल पाया। मुद्दा क्षमता को लेकर नहीं है। यह एक राजनीतिक अर्थव्यवस्था है, जिसने 1.3 अरब से अधिक लोगों को पहचान देने के लिए आधार स्थापित किया, एक महीने में 5.04 अरब लेन-देन दर्ज करने के लिए यूपीआई को मजबूत किया, टोल टैक्स वसूलने के लिए फास्टैग शुरू किया, लोगों को टीके की 200 करोड़ खुराक और डिजिटल प्रमाणपत्र दिया गया। 

सफलता की कहानियों में सबक होते हैं। शुरुआत एक सर्वेक्षण से करनी चाहिए कि सेवाओं तक पहुंच को कौन-सी चीज प्रभावित करती है। फिर नीति निर्माताओं और स्टार्ट-अप उद्यमियों की चुनौती होगी कि वे ऐसे समाधान लेकर आएं, जिसे आबादी का बड़ा हिस्सा पा सके। युवा व आधुनिक भारत और इसकी पुरातन शासन व्यवस्थाओं के बीच की खाई गहरी है। भारत निश्चित रूप से बेहतर कर सकता है।

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