फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Political game of Tamilnadu

तमिलनाडु का सियासी खेल

Tue, 14 Feb 2017 07:33 PM IST
आर राजगोपालन
आर राजगोपालन Updated Tue, 14 Feb 2017 07:33 PM IST
विज्ञापन
Political game of Tamilnadu
शशिकला

सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को जैसे ही शशिकला से संबंधित अपना बहुप्रतीक्षित फैसला सुनाया, ओ पन्नीरसेलवम की पहली प्रतिक्रिया थी, धर्मम् वेलम यानी धर्म की विजय हुई! अदालत ने आय से अधिक संपत्ति के मामले में शशिकला को चार साल की सजा सुनाई है, जिससे वह मुख्यमंत्री पद की दौड़ से बाहर हो गई हैं, मगर अपने समर्थकों के साथ मिलकर उन्होंने जो दांव चला है, उससे वहां राजनीतिक टकराव और बढ़ेगा। तमिलनाडु की राजनीतिक अनिश्चितता से वहां के राजनीतिक भविष्य पर तो असर पड़ेगा ही, राष्ट्रीय राजनीति भी प्रभावित होगी।

विज्ञापन


विगत विधानसभा चुनाव में अन्नाद्रमुक को मिले भारी बहुमत से राज्य की राजनीतिक स्थिति स्थिर थी। लेकिन जयललिता की मौत के बाद उपजी परिस्थितियों को देखते हुए सवाल उठता है कि तमिलनाडु की व्यापक तस्वीर कैसी होगी। अन्नाद्रमुक का भविष्य क्या होगा? और 2019 में राज्य की राजनीतिक स्थिति क्या होगी? राजनीति को थोड़ी देर के लिए अलग कर दें, तो सवाल उठता है कि बार-बार की कलह और तमिलनाडु के प्रशासन और सरकार के भविष्य को लेकर अनिश्चितता को देखते हुए राज्य के औद्योगिक क्षेत्र, वित्तीय क्षेत्र के विकास का क्या होगा? सितंबर, 2016 से ही राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति चरमराई हुई है। प्रशासन, पुलिस, कानून-व्यवस्था और यहां तक कि राजनीति में भी ठहराव आ गया है। दूसरी तरफ करुणानिधि के नेतृत्व वाला प्रमुख विपक्षी दल द्रमुक भी मजबूत स्थिति में नहीं है। करुणानिधि की उम्र 95 वर्ष हो गई है और उनका स्वास्थ्य अच्छा नहीं चल रहा है और न ही राजनीति। द्रमुक भी परिवार आधारित पार्टी है, जो बहुत से आंतरिक विरोधाभासों का शिकार है। पार्टी पर अभी एम के स्टालिन का नियंत्रण है, पर करुणानिधि की बेटी कनिमोझी, जो राज्यसभा सांसद हैं, अपने भाई स्टालिन के साथ नहीं हैं। तो यह हाल है मुख्य विपक्षी पार्टी का।
विज्ञापन


जयललिता के निधन के दो महीने बाद तक अन्नाद्रमुक के कार्यकर्ता शशिकला से दूरी बनाए हुए थे। हालांकि विधायक उनके साथ बने रहे। शशिकला के पास अन्नाद्रमुक का भारी संचित धन है और उनकी अपनी संपत्ति भी अतुल्य है।
विज्ञापन
विज्ञापन


शीर्ष अदालत ने शशिकला को हिरासत में लेने का निर्देश दिया है, ताकि उन्हें मिली चार साल की जेल की सजा पर अमल हो। कर्नाटक हाई कोर्ट के बरी किए जाने के फैसले को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आय से अधिक 66.65 करोड़ रुपये मूल्य की संपत्ति जमा करने के आपराधिक मामले में पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता, शशिकला नटराजन, इला वर्सी और वीएन सुधाकरण के खिलाफ सजा बरकरार रखी। इस फैसले से पूरे तमिलनाडु ने राहत की सांस ली है।

शशिकला ने राज्य में शासन करने के लिए अपने परिवार को थोप दिया था। लोग न केवल भ्रष्टाचार के खिलाफ थे, बल्कि शशिकला के परिजनों के रवैये के भी खिलाफ थे। शशिकला ने तमिलनाडु में बहुत-सी बेनामी संपत्ति अर्जित की है। यह लोगों की नजरों में चमक रहा था। जाहिर है, इसे शुरू में नजरंदाज कर दिया गया, क्योंकि जयललिता का व्यक्तित्व इतना विशाल था कि सभी नकारात्मक कारक दब जाते थे। जयललिता की मृत्यु के बाद शशिकला लोगों की नाराजगी के केंद्र में थीं।

अब जरा अन्नाद्रमुक के आंतरिक संघर्ष की भी थोड़ी चर्चा जरूरी है। जो नेता अभी शशिकला का विरोध कर रहे हैं, उन्हें जयललिता के निजी बंगले पर उनकी मृत्यु के बाद शशिकला द्वारा कब्जा जमाने से ईर्ष्या हो रही है। अन्नाद्रमुक के असंतुष्टों ने जयललिता के निजी बंगले को राष्ट्रीय स्मारक बनाने के लिए एक हस्ताक्षर अभियान चलाया। दूसरे शब्दों में कहें, तो ओ पन्नीरसेलवम चाहते हैं कि शशिकला को जयललिता के बंगले में नहीं रहना चाहिए।

लोग यह भी आरोप लगाते हैं कि शशिकला ने जयललिता को उचित चिकित्सीय उपचार उपलब्ध नहीं कराने दिया। चूंकि शशिकला निजी तौर पर जयललिता की देखभाल करती थीं, इसलिए ओ पन्नीरसेलवम चाहते हैं कि वर्तमान न्यायाधीश के नेतृत्व में जयललिता की मौत की पड़ताल के लिए जांच आयोग बैठे।

बहरहाल सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद वीडियोग्राफर से राजनीति के शीर्ष पर पहुंचीं शशिकला के मुख्यमंत्री बनने का सपना तो टूट ही गया है, लेकिन उनके समर्थक विधायकों ने जहां एक तरफ पलानीसामी को अपना नया नेता चुन लिया, वहीं शशिकला का विरोध करने वाले ओ पन्नीरसेलवम को पार्टी से निष्कासित कर दिया।

सवाल यह भी है कि इस फैसले का राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से क्या मतलब है। स्पष्ट है कि अन्नाद्रमुक में फूट पड़ गई है, जिससे निश्चित रूप से भाजपा और नरेंद्र मोदी को मदद मिल सकती है। इसी वर्ष आगामी जुलाई में राष्ट्रपति का चुनाव होने वाला है। राज्य की हालत कमजोर है। लोकसभा में अन्नाद्रमुक के 37 सांसद हैं और वह ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के बाद तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है। अन्नाद्रमुक के नेताओं के पास आवाज नहीं है। इसका कारण क्या है? इसका जवाब यह है कि लोकसभा में भाजपा के पास पूर्ण बहुमत है और उसे अन्नाद्रमुक के समर्थन की जरूरत नहीं है।

तो क्या राज्य की स्थिति में आगे सुधार होगा? इस समय सत्तारूढ़ पार्टी अन्नाद्रमुक तो कमजोर है ही, मुख्य विपक्षी पार्टी द्रमुक भी विभाजित है। अन्य किसी भी राजनीतिक पार्टी की राज्य में गहरी पैठ नहीं है, चाहे वह भाजपा हो या कांग्रेस। हां, राज्य में जातिगत संघर्ष अवश्य है। हर राजनीतिक पार्टी किसी न किसी खास समुदाय और जाति को आगे करना चाहती है। जिला स्तरीय दलों की संख्या काफी है। वे लोकप्रिय जनादेश और वोट में सेंध लगाते हैं।


तमिलनाडु का भविष्य निश्चित रूप से निराशाजनक है। सी राजगोपालाचारी, सी एन अन्नादुरई, के कामराज जैसे नेता अब राज्य में नहीं हैं। राज्य की मौजूदा बदहाली का यह भी एक कारण है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed