{"_id":"f1e6a37c-2a85-11e2-9941-d4ae52bc57c2","slug":"political-game-of-petrochemical-products","type":"story","status":"publish","title_hn":"पेट्रो उत्पाद का सियासी खेल","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
पेट्रो उत्पाद का सियासी खेल
अरुण नेहरू
Updated Fri, 09 Nov 2012 09:25 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पचहत्तर प्रतिशत रिकॉर्ड मतदान के साथ हिमाचल प्रदेश विधानसभा का चुनाव संपन्न हो गया है, लेकिन मुझे हैरानी होगी, अगर चुनावी नतीजे में रसोई गैस सिलिंडर (एलपीजी) का हाथ हो। वहां कांटे की टक्कर थी और जीत का अंतर एक प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। अगर चुनावी नतीजा भाजपा के पक्ष में जाता है, तो साफ हो जाएगा कि एलपीजी ने ही कांग्रेस को हराया।
विज्ञापन
रसोई गैस सिलिंडर मामले में अगर सरकार राजनीतिक विवेक का इस्तेमाल करती है, तो उसका स्वागत है। उम्मीद है कि रियायती दर वाले सिलिंडरों की संख्या छह से बढ़ाकर नौ की जाएंगी, जैसी कि खबरें हैं। हम सभी जानते हैं कि रसोई गैस सिलिंडर की कीमत का प्रभाव हर घर पर पड़ता है, और सरकार के ताजा फैसले के बाद उसके प्रति हर गृहिणी का नजरिया नकारात्मक हो गया है। इसने घर के माहौल को तनावपूर्ण बना दिया है।
विज्ञापन
हालिया फेरबदल में जयपाल रेड्डी का मंत्रालय बदलने से मीडिया में उन्हें 'महात्मा' बनाने की जो मुहिम चली, वह आश्चर्यजनक ही थी, क्योंकि थोड़े दिनों पहले ही उन्होंने पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमत बढ़ाने की वकालत की थी, जिसके चलते हड़ताल हुई थी और एक लंबी अवधि के लिए संसद का कामकाज बाधित हुआ था।
विज्ञापन
मैं अब भी नहीं समझ पाया हूं कि पेट्रोलियम मंत्रालय और राज्य सरकारें पिछले एक दशक से पूरे देश भर में केरोसीन में मिलावट और रसोई गैस की कालाबाजारी रोकने के लिए छापा क्यों नहीं मार रहीं। सिलिंडरों में गैस भरने की जैसी कारगुजारी है, उसे देखते हुए छह से बढ़ाकर नौ सिलिंडर करने का अर्थ शुद्ध रूप से एक सिलिंडर की, और अगर छेड़छाड़ नहीं की गई, तो दो सिलिंडरों की बढ़ोतरी है।
मेरे खयाल से यूपीए-2 को अपना कार्यकाल पूरा करना चाहिए। वैसे भी जब अगले लोकसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच स्थिति स्पष्ट नहीं है, तो तृणमूल को छोड़कर कोई क्षेत्रीय पार्टी सरकार गिराना भला क्यों चाहेगी? इस बार मैंने अपने आकलन में थोड़ा-सा संशोधन किया है, जिसके अनुसार कांग्रेस एवं भाजपा, दोनों को 140-140 सीटें और क्षेत्रीय दलों को 250-260 सीटें मिल सकती हैं।
शुरुआती स्तर पर क्षेत्रीय दलों में गठबंधन बनाने के लिए सुगबुगाहट तो दिखती है, लेकिन हर छोटी पार्टी पहले यह देखना चाहेगी कि अगले 10 विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और भाजपा में से कौन आगे रहती है और उनके सीटों में कितने का अंतर होता है। ये क्षेत्रीय दल सरकार गठन के मामले में संघर्ष किए बिना मानेंगे नहीं, और 250-260 सीटों का मतलब कि 150 सांसदों के समूह का इकट्ठा होना अवास्तविक नहीं है। क्षेत्रीय दलों में कम से कम पांच ऐसे नेता हैं, जो प्रधानमंत्री पद की दावेदारी कर सकते हैं। कई क्षेत्रीय दल ऐसे भी हैं, जो सरकार गठन के मामले में राष्ट्रीय दलों के मुकाबले दूसरी क्षेत्रीय ताकतों को सहयोग देना चाहेंगे, क्योंकि वे राज्यों में एक दूसरे को चुनौती नहीं देंगे। लेकिन कौन कह सकता है कि कल क्या होगा!
आने वाले दिनों में हर राजनीतिक पार्टी को बदलाव के लिए तैयार रहना होगा। हालांकि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था जिस दबाव में है, उसे देखते हुए परिवर्तन भी आसान नहीं है। जब हम पार्टी के सांगठनिक ढांचे और निर्णय लेने की उसकी क्षमता में बदलाव की बात करते हैं, तो उस पर सकारात्मक एवं नकारात्मक, दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं होती हैं। मौजूदा हालात में हर बदलाव से न सिर्फ विवाद खड़ा होगा, बल्कि यह कांग्रेस और भाजपा में तुलनात्मक रूप से ज्यादा स्पष्ट नजर आएगा, क्योंकि उनमें परिवर्तन का असर एक या दो राज्यों तक ही सीमित नहीं रहेगा।
मैं चुनाव प्रचार अभियान से तब से जुड़ा हुआ हूं, जब मैं आठ वर्ष का था। वर्ष 1952 की तो मुझे याद नहीं, लेकिन 1957 की बात मुझे याद है कि जहां भी मुझे रेफ्रिजरेटर का ठंडा पानी पीने को मिलता था, मैं उस जगह का नाम नोट कर लेता था। मुझे अब भी सीतापुर में मिले केरोसीन से जलने वाले इलेक्ट्रोलक्स रेफ्रिजरेटर एवं छोटे आकार के पानी की बोतल याद है। रेफ्रिजरेटर को ताले में बंद करके रखा जाता था, क्योंकि उस जमाने में ठंडा पानी बहुत कीमती होता था।
उस समय कांग्रेस संसदीय चुनाव लड़ने वाले अपने उम्मीदवार को पांच हजार रुपये देती थी और चुनाव जीतने पर सांसद पांच वर्षों में वह राशि पार्टी को लौटा देता था! लेकिन हर दशक के साथ चीजें बदलती चली गईं। हालांकि 1985 से 1995 के दशक के बीच चुनावी खर्च में बढ़ोतरी बहुत ज्यादा नहीं हुई थी, लेकिन उसके बाद यह लगातार बढ़ता चला गया, और आज स्थिति यह है कि एक विधानसभा चुनाव में दो से तीन करोड़ रुपये खर्च होते हैं, जबकि लोकसभा चुनाव में दस करोड़ या उससे ज्यादा खर्च होते हैं।
जब तक व्यवस्था में सुधार नहीं होता और चुनावी खर्च पर अंकुश नहीं लगाया जाता, तब तक राजनीति में अपराध को खत्म नहीं किया जा सकता। हमारे देश में तीन दशकों तक बहुमत का शासन रहा है, और अब गठबंधन शासन के भी कमोबेश तीन दशक हो रहे हैं। लेकिन हम अब भी छोटे-छोटे समूहों में बंटे हुए हैं। आखिर ऐसी स्थिति क्यों है, जो प्रभावी शासन को असंभव बना देती है?