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...और आदमी रोया

Sat, 06 Jul 2013 09:54 PM IST
संतोष कुमार तिवारी
संतोष कुमार तिवारी Updated Sat, 06 Jul 2013 09:54 PM IST
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poetry

संतोष कुमार तिवारी

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जो खत्म हो रहा है उसे दिखाने के अलावा इनकी कविताएं जो अच्छा होना चाहिए, उसकी तरफ भी इशारा करती हैं। रचनात्मक ताकत परिवेश से बटोरते हैं। नैनीताल में रहते हैं।


1
आपदा के बाद
कुछ बचे न बचे
बचते हैं
सीना फुलाए आंकड़े।

आला अधिकारी
थोड़े खेद के साथ
नुकसान का अनुमान
जान-माल की क्षति
समझाते हैं
आंकड़ों में।
2
सुहाग की देवी-गंगा
तुम्हारे बमणी गांव में
अब बची हैं सिर्फ विधवाएं।
बची हैं
मलबे में चंद सांसें
बचपन के सपने
नए-पुराने कपड़े सन्दूक में
आमा का चश्मा
माता
घर जमींदोज नहीं होता
ये सच है
घर के साथ-साथ
उम्मीदें तमाम
रूपहले अहसासों के पलछिन
दफन होते हैं बाकायदे।
अब कुछ विधवा स्त्रियों
और अनाथ बच्चों के साथ
पखारूंगा तुम्हारे चरण
रहूंगा यहीं, मरूंगा भी यहीं
तुम्हारी गोद में।
3
मेरे त्रिदेव
पानी
पहाड़ और
जंगल हैं
यह आपदा
त्रिदेव के संयुक्त
तिरस्कार का फल है।
4
गैंती, फावड़े और जेसीबी से
लहूलुहान बाबा केदारनाथ
कांप उठे
और बोले रोष में
अरे पागलों! कहीं और बनाओ
पांच सितारा होटल
कहीं और मनाओ हनीमून
पूंजीपतियों! अपने अड्डे बदलो
रसूखवालों! मुझे बख्शो।

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