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तब और अब
विपिन जैन
Updated Sat, 25 Oct 2014 07:24 PM IST
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कुछ गिनी-चुनी चीजें ही
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हुआ करती थीं हमारे पास
सिर्फ जरूरत भर की चीजें
नहीं रहता था बच्चों के पास
ढेर खेल-खिलौनों का
हमारी मध्यवर्गीय जरूरतें
बड़ी नहीं थी चादर से
जूते-चप्पल, किताबें, कपड़े
जो रहती थीं किसी के पास
काम आ जाती थीं दूसरे
छोटे भाई-बहनों के
या कभी-कभी पड़ोसियों के
मांगकर काम चला लिया जाता था
नहीं होती थीं चीजें जल्द ही
बेकार, फालतू, रद्दी
बचपन के लिए नहीं थे इतने
मॉल-बाजार लुभावने
खुश रहा करते थे हम
अभावों और कमियों में भी
आज इच्छाओं के ढेर पर
बैठे हुए हम
ढूंढते रहते हैं अपना बचपन।