फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Payal after Rohit

रोहित के बाद पायल : मां-बाप को आश्वासन दिया कि वह जिंदगी भर अपने भाई का भी ध्यान रखेगी

Fri, 07 Jun 2019 02:11 AM IST
Raman Singh सुभाषिनी सहगल अली
सुभाषिनी सहगल अली Published by: Raman Singh Updated Fri, 07 Jun 2019 02:11 AM IST
विज्ञापन
Payal after Rohit
पायल तडवी (फाइल फोटो) - फोटो : social media

रोहित वेमूला की याद फिर ताजा हो गई। मुंबई के नायर अस्पताल में तैनात डॉ पायल तड़वी ने 22 मई को फांसी लगाकर अपनी जान दे दी। चार साल पहले, केंद्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद के होनहार छात्र रोहित वेमूला ने भी ऐसा ही किया था। दोनों ने ही मरने से पहले लिखे गए पत्रों में कहा कि अपने जन्म के कारण ही उन्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ रहा था। जिस जाति में उनका जन्म हुआ था, वह उनके उत्पीड़न और फिर उनकी मौत का सबब बनकर रही।


loader

रोहित वेमूला की याद फिर ताजा हो गई। मुंबई के नायर अस्पताल में तैनात डॉ पायल तड़वी ने 22 मई को फांसी लगाकर अपनी जान दे दी। चार साल पहले, केंद्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद के होनहार छात्र रोहित वेमूला ने भी ऐसा ही किया था। दोनों ने ही मरने से पहले लिखे गए पत्रों में कहा कि अपने जन्म के कारण ही उन्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ रहा था। जिस जाति में उनका जन्म हुआ था, वह उनके उत्पीड़न और फिर उनकी मौत का सबब बनकर रही।

पायल तड़वी महाराष्ट्र के जलगांव जिले की मुस्लिम भील आदिवासी थी। उसका समुदाय बहुत ही छोटा –कुछ लाख लोगों का है। इनमें शिक्षा का बहुत अभाव है और वे दिहाड़ी का काम करके ही अपना पेट पालते हैं। पायल की मां, आबेदा जिला परिषद के कार्यालय में काम करती है। उसका बाप, सलीम, मजदूरी करता है और उसे महीने में कुछ ही दिनों के लिए काम मिलता है। पायल का बड़ा भाई विकलांग पैदा हुआ था। वह शुरू से पढ़ने में तेज थी और उसने तय कर लिया कि वह डॉक्टर बनेगी। अपने मां-बाप को उसने आश्वासन दिया कि वह जिंदगी भर अपने भाई का भी ध्यान रखेगी।

पायल डॉक्टर बन गई और उसने अपने आखिरी साल में अपने गांव के पास के अस्पताल में काम किया। चूंकि वह खुद आदिवासी थी और उनकी भाषा जानती थी, बड़ी संख्या में आदिवासी महिलाओं ने अस्पताल आना शुरू कर दिया और उनको बहुत फायदा भी हुआ। इसी बीच, पायल की शादी उसके ही समुदाय के डॉक्टर हसन से हुई। दोनों का सपना था कि सरकारी अस्पताल में जितने दिन उनके लिए काम करना आवश्यक है, उसे करने के बाद वे गांव लौटकर अस्पताल खोलेंगे।

पायल को मुंबई के नायर अस्पताल में काम पर लगाया गया। वहां उसे हॉस्टल में ही एक अन्य महिला डॉक्टर के साथ कमरा मिला। कई महीनों तक वह जमीन पर सोती थी और दूसरी महिला पलंग पर सोती थी। इस तरह का दुर्व्यवहार उसके साथ बढ़ता गया। तीन महिला डॉक्टरों ने उसे लगातार परेशान किया। उसकी जाति को लेकर वे टिप्पणियां करतीं, उसे बेहूदे मैसेज फोन पर भेजती और उसके काम की हमेशा आलोचना करती।

पायल को आरक्षण का फायदा जरूर मिला था, लेकिन आजकल आरक्षित और अनारक्षित छात्रों के बीच केवल पांच फीसदी का ही अंतर रह गया है। पायल का उत्पीड़न बढ़ता गया। उसकी आत्मनिर्भरता घटने लगी, उसकी हंसी भी बंद होने लगी। उसने विभागाध्यक्ष से शिकायत की, तो उन्होंने भी कोई कार्रवाई नहीं की। अंत में हारकर पायल ने फांसी से लटक कर जान दे दी।

रोहित वेमुला की तरह। इस घटना के खिलाफ काफी विरोध प्रदर्शन हुए। पायल का उत्पीड़न करने वाली तीन डॉक्टरों को एससी/एसटी कानून के अंतर्गत गिरफ्तार करने की मांग उठाई गई। शुरू में आना-कानी होती रही, लेकिन जब विरोध तेज हुआ, तो सरकार को कार्रवाई करनी पड़ी।

इस तरह की घटनाएं घटती हैं, तो दो तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलती हैं। एक तरफ तो लोग जाति व्यवस्था में निहित अन्याय और दुर्व्यवहार को समाप्त करने की बात करते हैं। दूसरी ओर, बहुत ही अजीब प्रतिक्रिया देखने को मिलती है। एक तरह की सोच के बहुत सारे लोग एक साथ चिल्ला-चिल्लाकर यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि पायल की आत्महत्या जैसी वीभत्स घटना का जाति-द्वेष से कोई संबंध ही नहीं है।

जो लोग वर्णव्यवस्था की आलोचना करते हैं, उन्हें वे देशद्रोही, धर्मद्रोही और समाज को तोड़ने वाले के रूप में कोसते हैं। रोहित वेमुला के जीने के अधिकार के साथ, उसकी पहचान भी छीन ली गई थी। डॉ आंबेडकर ने बहुत पहले कहा था कि अगर हमारे समाज का प्रभावशाली हिस्सा अपनी अमानवीय सोच को पहचानकर उसे बदलने के लिए प्रेरित नहीं होगा, तो फिर पूरा समाज अमानवीय ही कहलाएगा और हममें से कोई भी सभ्य होने का दावा नहीं कर पाएगा।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed