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नारों से आगे निकलने का वक्त

Mon, 29 Dec 2014 12:13 AM IST
पत्रलेखा चटर्जी
पत्रलेखा चटर्जी Updated Mon, 29 Dec 2014 12:13 AM IST
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क्रिसमस की शाम को 35 वर्ष का एक बेघरबार व्यक्ति देश की राजधानी का दिल कहे जाने वाले कनॉट प्लेस में मृत पाया गया। इस शख्स का नाम हमें नहीं मालूम, इसके पास अपना घर भी नहीं था। ऐसे में, कड़ाके की सर्दी झेल पाना इसके लिए मुमकिन नहीं हो पाया। एक बेघरबार व्यक्ति के ऐसे दर्दनाक अंत को जल्द ही भुला दिया जाएगा। वैसे भी आजकल गैर हिंदुओं की घर वापसी की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनी हुई हैं।

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धर्म जागरण समिति ने जब से अलीगढ़ में मुसलमानों और ईसाइयों को हिंदू धर्म में लाने की अपनी योजना का खुलासा किया है, उत्तर प्रदेश पर सबकी निगाह है।उनकी यह योजना फिलहाल स्थगित है, मगर अलीगढ़ में हर चर्च के बाहर भारी पुलिस बल तैनात है।देश के दूसरे हिस्सों की बात करें, तो पिछले हफ्ते के दौरान विश्व हिंदू परिषद ने केरल के कोट्टायम में 60 से ज्यादा ईसाइयों की हिंदू धर्म में वापसी करवाने का दावा किया है। दूसरी ओर बिहार के गया में कम से कम 40 महादलित परिवारों ने ईसाई धर्म अपनाया है।
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देश के जिन हिस्सों में ये धर्म प्रचारक सक्रिय हैं, वहां की विकास की दशा से हर कोई परिचित है। नया वर्ष दस्तक दे रहा है। ऐसे में, हमें अपनी सोच को बड़ा करते हुए यह देखना होगा कि धर्म प्रचार और धर्मांतरण का यह जहरीला कुचक्र देश को और हमें किस दिशा में ले जा रहा है। सवाल यह है कि क्या सामाजिक स्थायित्व के बगैर कोई आर्थिक विकास मुमकिन है। हर कोई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस विचार से सहमत है कि विकास और सुशासन, बस यही दो रास्ते हैं। अगर धर्मांतरण जैसे मुद्दों का इन दोनों से कोई सरोकार नहीं है, और ऐसे मुद्दे विकास और सुशासन, दोनों के लिए घातक हैं, तो आखिर इसको रोकने के लिए कुछ क्यों नहीं किया जा रहा? क्या घर वापसी ही देश की पहली प्राथमिकता बन गई है? इससे जरूरी क्या यह नहीं होना चाहिए कि देश की ऊर्जा यह सुनिश्चित करने में खर्च हो कि हर व्यक्ति के पास रहने के लिए घर हो?
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2015 की स्वागत बेला में हमें और सजग रहना होगा, खासकर उन नारों के प्रति, जिन्हें हम सुनते हैं।इसमें संदेह नहीं कि नारे आकर्षित करते हैं, और लोकलुभावन नारे गढ़ने में एनडीए सरकार का प्रदर्शन अब तक अच्छा रहा है। 'अच्छे दिन', 'अब की बार', 'मेक इन इंडिया', 'स्वच्छ भारत' और अब 'सुशासन' के नारे ने जनता के एक विशाल तबके को अपने साथ जोड़ा है। मगर अब समय आ गया है कि नारों से परे जाकर कुछ करके दिखाने का।

फिलहाल देश की आबोहवा में दो शब्द गूंज रहे हैं- विकास और सुशासन। हालांकि अलग-अलग लोगों के लिए इनके अर्थ में फर्क होता है। गौरतलब है कि रोजगार सृजन और आय वृद्धि के लिए अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के क्रम में कठिन फैसले लेने पड़ते हैं। मगर सुशासन का मतलब ही है कि विकल्पों और दुविधाओं को लेकर पारदर्शी रवैया अपनाया जाए।

गौरतलब है कि देश में स्वास्थ्य बजट में कटौती को लेकर भी विवाद चल रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी मीडिया के सामने अपनी डफली अपना राग वाला रवैया अपनाए हुए हैं। कुछ कटौती की बात स्वीकार रहे हैं, तो कुछ नकार रहे हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य पर व्यय के मामले में दुनिया में भारत का स्थान सबसे नीचे है। यह ऐसा क्षेत्र है, जिसमें सरकार को आगे आना ही होगा। इस संदर्भ में दुनिया का कोई भी देश बड़े सरकारी निवेश के बगैर आगे नहीं बढ़ सका है। निजी अस्पताल अच्छी सुविधाएं दे सकते हैं, मगर उन्हें जो उनका खर्च झेल सकें। फिर उनका क्या, जो गरीब हैं, या ऐसी सुविधाओं के अभाव वाली जगहों पर रहते हैं।


सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) के ताजा आंकड़े के मुताबिक देश में शिशु मृत्यु दर (एक हजार जन्मे बच्चों में एक वर्ष से कम उम्र में होने वाली बच्चों की मौतें) 2008 में 53 से घटकर 2013 में 40 पर पहुंच गई। मगर इसके बावजूद पैदा होने वाले हर पच्चीस भारतीय बच्चों में से एक बच्चा जन्म लेने के एक वर्ष के भीतर ही दम तोड़ देता है। साफ है कि सरकार को सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाना चाहिए। अगर स्वास्थ्य और पूरे सामाजिक क्षेत्र के लिए पैसे की कमी इस वजह से हो रही है कि पिछला आवंटन अब तक खर्च नहीं किया जा सका है, तो केंद्र और राज्य सरकारों से ऐसा होने की वजह पूछी जानी चाहिए, और इस पर भी विचार होना चाहिए कि आवंटित संसाधनों के कुशल उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए क्या किया जा रहा है? ये विकास और सुशासन के सवाल हैं। ये वे सवाल हैं, जिन पर फोकस होना चाहिए। उम्मीद की जानी चाहिए कि 2015 ऐसा वर्ष साबित हो, जिसमें बदलाव केवल भाषणों में नहीं, जमीनी स्तर पर भी दिखे।

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