फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Panchayati raj system becoming violent

हिंसक होती पंचायती व्यवस्था

Thu, 24 Sep 2015 08:00 PM IST
सुभाष चंद्र कुशवाहा
सुभाष चंद्र कुशवाहा Updated Thu, 24 Sep 2015 08:00 PM IST
विज्ञापन
Panchayati raj system becoming violent

उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों के चुनाव होने वाले हैं और विगत दो महीनों से प्रधानों, पूर्व प्रधानों, प्रधान पतियों, संभावित उम्मीदवारों आदि की हत्याएं देखी जा रही हैं। विगत कुछ वर्षों से ऐसी हत्याओं में लगातार तेजी आई है। पंचायती राज व्यवस्था ने ग्रामीण समाज की सरलता और बंधुत्व भावना को नष्ट कर दिया है। उत्तर प्रदेश की 52,000 ग्रामसभाओं के लगभग नब्बे प्रतिशत गांवों में प्रधानी के विगत चुनाव के बाद आपसी दुश्मनी बढ़ी है। हरियाणा में पूर्व प्रधान की हत्या में एक समय परिवहन मंत्री तक का नाम आया था। ग्राम सभाओं के पास पहुंच रही विभिन्न योजनाओं की धनराशि और उसकी बंदरबांट ने सत्ता और पैसे की प्रतिद्वंद्विता से आपराधिक मामलों को बढ़ाया है। उत्तर प्रदेश में विगत छह महीनों में हुई कुल हत्याओं में गंवई अपराध का हिस्सा लगभग 80 प्रतिशत के बराबर है।

विज्ञापन


बेशक गांवों में उत्पीड़न या अपराध पहले भी होते थे, मगर तब निम्न जातियों के उत्पीड़न के अधिकांश मामले कमोबेश एकतरफा होते थे। शिक्षा, राजनीतिक जागरूकता और सत्ता में हिस्सेदारी ने जहां प्रतिद्वंद्विता बढ़ाई, वहीं गांव के सामाजिक ताने-बाने को तोड़ा भी। आपसी टकराव बढ़े और अनुदानों, सरकारी योजनाओं की लूट के लालच ने ग्रामीणों के मनोभावों को दुरूह, लोभी, चाटुकार और हिंसक बनाना शुरू किया। ठेका, कमीशन गांवों में पहुंचा, तो कब्जा और कबीलाई संस्कृति को फिर ऊपर उठने का मौका मिला। खाप पंचायतें बलवती हुईं। गांव के मुखिया की पहचान बाहुबली के रूप में होने लगी। फर्जी जॉब कार्ड बनने लगे। बिना काम का पैसा बटोरा गया। मनरेगा, मिड डे मील ने प्रधानों को करोड़पति तक बना डाला। पार्टियों ने प्रधानों के सहारे वोट बैंक जुटाना शुरू किया, तो प्रधानों का महत्व चुनावी ठेकेदार जैसा हो गया। सत्ता के संसर्ग से उनके पास असलहे पहुंचे। गांवों की बेरोजगार पीढ़ी ने ऐसे अपराधियों से हाथ मिलाया और शराब तथा गोश्त की दावतों के सहारे गांवों को गुंडागर्दी से जकड़ लिया। अब गांवों के शादी-ब्याह, तीज-त्योहार, मेले, हाट-बाजार हर जगह लंपट युवाओं का कब्जा है। यह अकारण नहीं कि पंचायत चुनाव में जो लोग खड़े हो रहे हैं, उनमें से 90 प्रतिशत 50 से कम उम्र के हैं। बुजुर्गो ने खुद को वर्तमान पंचायती व्यवस्था से अलग कर लिया है।
विज्ञापन

 
यही देखकर विगत पंचायत चुनाव के समय उत्तर प्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग ने अपराधियों को चुनाव में भाग लेने से रोकने की विफल कोशिश की थी। चूंकि कानून के अनुसार अपराधी वही माना जाता है, जिसके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हों, ऐसे में, प्रधानी के चुनावों में आपराधिक पृष्ठभूमि की पहचान टेढ़ी खीर जान पड़ती है। गांवों की सामाजिक संरचना सामंती पृष्ठभूमि पर आधारित रही है। वहां बाहुबलियों के खिलाफ आपराधिक मामले सामान्यतया पंजीकृत ही नहीं होते। वक्त का तकाजा है कि पंचायती राज व्यवस्था की प्रक्रिया और गांवों के विकास के मानकों को नए सिरे से परिभाषित किया जाए। लूट की जिस संस्कृति को ऊपर से लेकर गांवों तक पहुंचाया जा रहा है, वह गांवों को अशांत कर रहा है। बेहतर होगा कि गांव में पहुंच रहे पैसे की बंदरबांट रोकने की मुकम्मल व्यवस्था की जाए, ताकि मार-काट बंद हो।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed