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पाकिस्तान: आसान नहीं होगी शहबाज की राह, सेना की 'पटकथा' पर चलकर कैसे आएगा लोकतंत्र

Thu, 15 Feb 2024 06:59 AM IST
K S Tomar केएस तोमर
Updated Thu, 15 Feb 2024 06:59 AM IST
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सार
तमाम आरोपों-प्रत्यारोपों और कशमकश के बाद बात शहबाज शरीफ पर आकर रुकी है। लेकिन जिस तरह से सेना द्वारा लिखी पटकथा पर चुनाव हुए हैं और अब सरकार बन रही है, उसमें पाकिस्तान के लिए चुनौतियां कम होती नहीं दिख रही हैं। देखना होगा कि वहां लोकतंत्र किस हद तक काम कर पाता है।
 
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Pakistan new government updates Shehbaz Sharif PM Challenges to save democracy economic crisis
Shehbaz Sharif with Nawaz Sharif - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन के प्रसिद्ध उद्धरण के संशोधित संस्करण के मुताबिक, इतिहास खुद को दोहराता है, लेकिन तुकबंदी के इस जमाने में  पाकिस्तानी चुनावों के नतीजों के लिए यह रूढ़िवादी तरीके से सच होता है, जो शहबाज शरीफ को पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनाने के लिए साफ किए गए रास्ते से स्पष्ट है। सेना ने 'चयन' की प्रक्रिया के माध्यम से चाक-चौबंद रणनीति को अंजाम दिया है।



पाकिस्तान में आम चुनाव, 2024 के नतीजे नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल (एन) की सफलता सुनिश्चित करने के लिए सर्वशक्तिशाली सेना द्वारा लिखी गई पटकथा है, जो 2018 के चुनाव में इमरान खान को प्रधानमंत्री के पद पर बैठाने के लिए की गई कवायद जैसी ही है। सेना की सर्वोच्चता और लोगों की मानसिकता के कारण उस मुल्क में कोई भी शहबाज के चयन पर सवाल नहीं उठाएगा, जहां परोक्ष रूप से दशकों तक और सीधे तौर पर 33 वर्षों तक सेना द्वारा शासन का इतिहास रहा है।


यह भी एक भ्रम ही था कि शेष अवधि में मुल्क में लोकतंत्र बहाल हो गया था, क्योंकि घरेलू और विदेशी मामलों में पूरी तरह से सेना का वर्चस्व था। चयनित प्रधानमंत्रियों ने हमेशा सेना के इशारे पर कठपुतलियों की तरह काम किया। अब स्थिति स्पष्ट हो गई है और पाकिस्तान के चुनावी नतीजे संकटग्रस्त मुल्क के लोगों के अलावा पूरी दुनिया की अपेक्षाओं और अनुमानों के अनुरूप हैं।

तीन बार प्रधानमंत्री रहे नवाज शरीफ ने अनिश्चित और अस्थिर राजनीतिक परिदृश्य के बीच आश्चर्यजनक ढंग से अपने छोटे भाई शहबाज शरीफ को प्रधानमंत्री, जो उन्हें छद्म रूप से शासन चलाने में सक्षम बनाएगा और अपनी बेटी मरियम नवाज को पंजाब की मुख्यमंत्री पद के लिए नामित किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि नवाज शरीफ ने एक तीर से दो शिकार करने की कोशिश की है, जिससे पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के सरकार में शामिल होने की संभावना बनी रहेगी, क्योंकि पीपीपी अध्यक्ष बिलावल भुट्टो ने पीएमएल (एन) सरकार को बाहर से समर्थन देने की घोषणा की है।

बिलावल अपने पिता आसिफ अली जरदारी को राष्ट्रपति बनवाने के लिए सौदेबाजी कर सकते हैं, जिससे समीकरण बदल सकते हैं। दूसरा, इससे उनकी बेटी और पीएमएल (एन) की सूचना सचिव मरियम नवाज के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रांत पंजाब का मुख्यमंत्री बनने की राह प्रशस्त होगी। गठबंधन सरकार में पीएमएल (एन), पीपीपी, एमक्यूएम, पीएमएल-क्यू, बीएपी इत्यादि दल शामिल होंगे, जिससे 265 सदस्यों वाले सदन में गठबंधन का संख्याबल 152 हो जाएगा, जो 133 के बहुमत के आंकड़े से ज्यादा है। मनोनीत सदस्यों को जोड़ने के बाद गठबंधन का संख्याबल 169 हो जाएगा।

लेकिन शहबाज शरीफ के लिए सरकार चलाना एक बड़ी चुनौती होगी। सबसे पहले उन्हें मुल्क के बदहाल आर्थिक संकट से निपटना होगा, जो भविष्य में कभी भी ध्वस्त हो सकता है और उसका हश्र श्रीलंका जैसा होने की आशंका है। कई वर्षों से राजनीतिक उथल-पुथल से गुजरते पाकिस्तान के लोगों को स्थिर सरकार की उम्मीद है, जो सेना के समर्थन के चलते कुछ हद को वास्तविकता बन सकती है, जिन्होंने मुल्क का नेतृत्व करने के लिए नवाज शरीफ के माध्यम से शहबाज को चुना है।

तीसरा, अफगानिस्तान से होने वाली आतंकी कार्रवाइयों पर नियंत्रण पाना शहबाज सरकार के लिए मुश्किल होगा, जो प्रतिबंधित तहरीक-ए तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) को समर्थन देता है। अब लोग नई सरकार से उम्मीद करेंगे कि वह बढ़ते आतंकी हमलों पर लगाम लगाएगी, जिसके चलते 2023 में कथित तौर पर 1,500 से अधिक लोग मारे गए हैं।

चूंकि पर्दे के पीछे से नवाज शरीफ ही सरकार चलाएंगे, इसलिए उम्मीद की जा सकती है कि वह भारत सहित अन्य पड़ोसियों के साथ संबंधों को बेहतर बनाने के लिए ठोस प्रयास कर सकते हैं, जिसका उल्लेख उन्होंने अपने विजय भाषण में किया था। प्रधानमंत्री मोदी के नवाज शरीफ के साथ अच्छे संबंध रहे हैं, जिन्होंने वर्ष 2015 में अचानक लाहौर का दौरा करके उन्हें जन्मदिन की बधाई दी थी। उससे पहले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी पाकिस्तान का दौरा किया था, जिन्हें इस्लामाबाद के साथ संबंधों में नरमी लाने का श्रेय दिया जाता है। कूटनीतिक सिद्धांतों के अनुसार, भले ही दोनों देशों के बीच शत्रुता की भावना प्रबल हो, पर बातचीत जारी रहनी चाहिए। अगर पाकिस्तान ईमानदारी दिखाए और कश्मीर की जिद छोड़ दे, तो भारत फिर से बातचीत शुरू कर सकता है।

हालांकि मोदी की पाकिस्तान यात्रा से वहां की सेना खुश नहीं थी। लेकिन अब स्थिति अलग है। अब सेना और नवाज एक साथ हैं। लेकिन सेना की खुफिया एजेंसी आईएसआई को कश्मीर में हिंसा में शामिल आतंकवादियों का समर्थन करने की अपनी नीति छोड़नी होगी। नवाज से उम्मीद रहेगी कि वह कश्मीर को छोड़कर आर्थिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करें, जो उनके भाई शहबाज के लिए मार्गदर्शक सिद्धांतों के रूप में कार्य कर सकता है।

इसके अलावा, नए प्रधानमंत्री को पाकिस्तान की शरणार्थी नीति की धज्जियां उड़ाने वाले तालिबान से भी रिश्ते सुधारने होंगे। पाकिस्तान ने जबरन 3,75,000 अफगानियों को निष्कासित कर दिया है और उनमें से 20,000 को निर्वासित कर दिया है, जिससे तालिबान शासन नाराज हो गया और उसने पाकिस्तान पर हमला कर दिया। फिलहाल दोनों देशों के रिश्ते बहुत खराब हैं।

इसमें शायद ही किसी को संदेह होगा कि पाकिस्तान में इस बार चुनाव निष्पक्ष नहीं था, क्योंकि एक मजबूत दावेदार और लोकप्रिय नेता इमरान खान को सुनियोजित साजिश के तहत चुनावी प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया था। इमरान के वफादारों का कहना है कि नवाज शरीफ को सफलता दिलाने में सेना ने प्रमुख भूमिका निभाई, जिन्होंने छद्म ढंग से शासन चलाने के लिए अपने भाई का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए आगे बढ़ाया। इमरान खान को चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहरा कर जेल में डाल दिया गया, जिससे उनकी पार्टी पीटीआई दिशाहीन हो गई। चुनाव आयोग ने उनकी पार्टी का चुनाव चिह्न बल्ला भी छीन लिया।

विश्लेषकों का मानना है कि सही मायनों में तो नहीं, लेकिन पाकिस्तान में कहने को लोकतंत्र बचा हुआ है, जो भारत के लिए एक अच्छा संकेत है, क्योंकि पड़ोस में शांति हमेशा सकारात्मक माहौल बनाती है।

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