विकास की वर्णमाला से बाहर
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बीते 23 दिसंबर को किसान दिवस के अवसर पर प्रगतिशील किसानों से रूबरू होने का अवसर मिला। हमारे यहां व्यापार और उद्योग को उद्यम माना जाता है, लेकिन कृषि उद्यम नहीं है। परिणाम यह होता है कि कृषि उद्यमियों के लिए प्रगतिशील और उद्यमशीलता के रास्ते नहीं खुलते। गांव आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हो पा रहे हैं। कारण? कारण बहुत से हैं। बैंक ग्राम्य विकास के इंजन हैं, लेकिन पूंजी किसान के साथ नहीं खड़ी हुई। ऋण दिलाना सरकारी काम मान लिया गया है। कृषि, पशुपालन और बागवानी से संबंधित ऋण के आवेदकों का हमारे ग्रामीण परिवेश में अभाव-सा हो गया है। एंटरप्रेन्योर्स यानी उद्यमकर्ता वर्ग है ही नहीं। बैंकों के कर्ज का बड़ा हिस्सा फसल ऋण है। यह स्थिर है। इसमें कोई गति नहीं होती। किसानों को उम्मीद रहती है कि कोई न कोई सरकार इसे माफ कर देगी। यह बेचारगी देश के एकमात्र किसान नेता रहे चौधरी चरण सिंह जी के ग्रामीण सशक्तिकरण के विचार के विपरीत है।
हमारे ग्रामीण युवकों में स्वरोजगार, स्वनिर्भरता की सोच अभी तक विकसित नहीं हो सकी है। सरकारी नौकरी चाहे चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की ही हो, मुख्य लक्ष्य बनी हुई है। दरअसल सरकारी नौकरी की यह सुविधा अंग्रेजों की देन है। गांव का कोई आदमी कलेक्टरेट में चपरासी भी हो गया, तो दस-बीस को सिफारिश से कहीं न कहीं लगवा ही देता था। इस सिफारिशी तंत्र ने ग्रामीण नौजवानों से स्वरोजगार एवं कर्मठता में गर्व का एहसास छीन लिया। जो शिक्षा दी गई, वह घाघ की एक कहावत उत्तम खेती, मध्यम बान, निषिद्ध चाकरी, भीख समान तक सीमित रहीं। कृषि, स्वरोजगार में गौरव-आत्मसम्मान जैसी कोई बात नहीं बताई गई। मैथिलीशरण गुप्त ने भी कहीं कहा है कि शिक्षे, तुम्हारा नाश हो, तू नौकरी के हित बनी। सरकारी नौकरी ही ग्रामीण भारत का सबसे बड़ा स्वप्न है।
आजादी के बाद हमारी सरकारों ने यह रवैया अपना लिया कि ट्यूबवेल, सड़क, नहर, बिजली अर्थात विकास के समस्त साधन हम ले आएंगे, तुम्हें कुछ नहीं करना है। जनसहभागिता का कोई वातावरण नहीं बनाया गया। स्वनिर्भरता की शिक्षा नहीं मिली। आगे सब्सिडी आधारित योजनाओं ने ग्रामीण भारत के नवयुवकों का आत्मविश्वास समाप्त-सा कर दिया। वह उद्यम की राह छोड़कर मकान, पेंशन और हैंडपंपों के लिए प्रधानों तथा अधिकारियों के चक्कर काटने लगा। यह देश आजादी के प्रारंभिक दौर में सरकारी नौकरियों का मोह छोड़कर आर्थिक स्वनिर्भरता, स्वरोजगार की दिशा में बढ़ सकता था, पर ऐसा हुआ नहीं। वे ब्रिटिश राज के हैंगओवर के दिन थे। राजा-जमींदार-सामंत, नेता हो गए। उनका राजयोग बरकरार रहा। देश को बदलने की शुरुआत हुई ही नहीं। ऐसे में ग्रामीण भारत के नौजवानों की परवाह कौन करता! उन्हें न कोई दिशा मिली, न शिक्षा। उन्हें यह भी शिक्षा नहीं मिली कि किस प्रकार सिर्फ दो एकड़ जमीन में वे सफलतापूर्वक अपना जीवनयापन कर सकते हैं। ब्यूरोक्रेसी, राजनीतिक नेतृत्व ने कभी भी उस वर्ग को प्रश्रय नहीं दिया, जो कर्मठ, समृद्ध, सफल ग्रामीण भारत के सपने देखता।
इसलिए जब बैंक अधिकारीगण की बैठक में उनसे यह सवाल पूछा गया कि श्रावस्ती के आर्थिक विकास की योजना क्या है, तो किसी को कोई जवाब नहीं सूझा। हां, मुख्य विकास अधिकारी के पास संचालित शासकीय योजनाओं का विवरण था कि कितने ग्रामीण आवास बने हैं, कितनी पेंशन बंट रही है, मनरेगा में क्या हो रहा है। बैंकर्स के पास दिए गए ऋणों का विवरण था, पर आर्थिक विकास? ऐसा कोई अभिलेख नहीं था। अगला सवाल, कितने बेरोजगार हैं हमारे यहां, ये समस्त सरकारी योजनाएं, बैंक ऋण कुल कितने रोजगार सृजित कर पा रहे हैं। इसका भी उत्तर हमारे पास नहीं था।
उत्पादन के चार माध्यम हैं। श्रम, पूंजी, भूमि और एंटरप्रेन्योर अर्थात उद्यमकर्ता। श्रम व भूमि बहुतायत है। पूंजी बैंकों में है। लेकिन कर्ता? कर्ता है ही नहीं। जो है भी, वह दिशाभ्रम का शिकार है। विकास में सबसे बड़ी भूमिका पूंजी अर्थात बैंकों की बनती है, लेकिन बैंक हाशिए पर हैं। वे ग्रामीण भारत के विकास में अपनी भूमिका ही चिह्नित नहीं कर पाए हैं। अरबों की निष्प्रयोज्य पूंजी क्यों विकास के उन क्षेत्रों को चिह्नित नहीं कर पाती, जहां उनका उपयोग होना है? आप उत्पादन के सबसे महत्वपूर्ण साधन हैं। क्यों आप जनपदों के युवकों को एंटरप्रेन्योरशिप की शिक्षा नहीं देते?
आर्थिक विकास एक गंभीर प्रक्रिया है। विकास के नारों और आर्थिक विकास में फर्क होता है। अपने यहां मैक्रो अर्थव्यवस्था पर तो बहुत काम हुआ है, लेकिन जहां तक आर्थिक विकास के माइक्रो स्तर का प्रश्न है, हम सब्सिडी आधारित व्यवस्था पर निर्भर होते जा रहे हैं। चूंकि जनपद स्तर पर आर्थिक विकास की सोच नहीं बनी, इसलिए बैंकों व श्रम विभाग को यह दायित्व ही नहीं दिया गया। बैंकों की नीतियां केंद्र सरकार से निर्धारित होती हैं। गांवों के आर्थिक विकास में उन्हें मुख्य भूमिका दी ही नहीं गई। हमने शायद मान लिया था कि वैश्य समाज ही व्यवसाय, व्यापार, उद्योग का सदैव कर्ता बना रहेगा, इसलिए ग्रामीण युवकों को एंटरप्रेन्योरशिप की शिक्षा की जरूरत ही नहीं है। हम क्यों जापान, जर्मनी, ताइवान और कोरिया जैसे कठिन श्रम करने वाले देश नहीं बने? ये ऐसे आधारभूत सवाल थे, जो पहली पंचवर्षीय योजना में पूछे जाने चाहिए थे। ग्रामीण भारत को आर्थिक विकास की धुरी बनना था। हमने पूंजी की शक्ति का उपयोग नहीं किया और नवयुवकों को उद्यमशीलता की प्रेरणा नहीं दी। उन्हें सरकारी नौकरियों की सोच से आगे निकलना नहीं सिखाया। उन्हें यह बताने में हम चूक गए कि सरकारें सहयोगी व मार्गदर्शक भूमिका में हैं। अपने भविष्य की जिम्मेदारी उनके अपने कंधों पर है।
लेखक, भारतीय प्रशासनिक सेवा के सदस्य हैं