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हमारे जासूस चारों तरफ फैले हैं

Thu, 26 Feb 2015 08:20 PM IST
सहीराम
सहीराम Updated Thu, 26 Feb 2015 08:20 PM IST
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Our spy is everywhere

जी, यह डायलॉग अंग्रेजों के जमाने के किसी जेलर का नहीं है। एक तो उस जमाने के जेलर बचे ही नहीं हैं, फिर जेलों में वैसे भी आजकल वीआईपी टाइप के कैदी आने लगे हैं। बेचारे अधिकारियों को उनकी सेवा से ही फुर्सत नहीं मिलती होगी, जासूसी क्या कराएंगे?

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पर यह डायलॉग किसी सीआईए के अधिकारी का भी नहीं है। एक जमाना था, जब बड़े नेता एक-दूसरे पर सीआईए का जासूस होने का आरोप लगाते थे। पर अब जब पूरा इंडिया अमेरिका बनना चाहता है, तो सीआईए की जरूरत ही कहां रह गई? उससे ज्यादा चर्चा तो आईएसआई की होती है। पर आईएसआई के लोग जासूसी से ज्यादा हिंसा में यकीन करते हैं। सो यह डायलॉग उनका भी नहीं हो सकता। फिर भारतीय खुफिया एजेंसियां तो वैसे ही बड़ी शरीफ होती हैं। हमारे यहां ताक-झांक वैसे ही खराब मैनर्स माने जाते हैं। इसलिए हमारी खुफिया एजेंसियां जासूसी नहीं करतीं। उनके बारे में हमेशा कहा जाता है कि हमारा खुफिया तंत्र फेल हो गया। पता नहीं, वह कभी पास भी होता है या नहीं।
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ऐसे में यह सवाल जायज था कि फिर यह डायलॉग है, तो किसका। अब पता चला कि यह डायलॉग तो कॉरपोरेट की तरफ से मारा जा रहा था। बड़ी-बड़ी कंपनियां डायलॉग मार रही थीं कि हमारे जासूस शास्त्री भवन में चारों तरफ फैले हैं-वे पेट्रोलियम मंत्रालय में हैं, वे कोयला मंत्रालय में हैं, वे ऊर्जा मंत्रालय में हैं। ऐसा कौन सा मंत्रालय है, जहां वे नहीं हैं?
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ऐसी कौन-सी फाइल है, जिस तक उनकी पहुंच नहीं। जिन फाइलों तक धूल भी न पहुंचे, दीमक भी न पहुंचे, चूहे भी न पहुंचे, वहां भी पहुंच जाते हैं हमारे जासूस। जो कागज मंत्रालय के सेक्रेटरी और मंत्री तक न देख पाए, वे कागज उनकी जेब में होते हैं। जिन नीतियों की जानकारी बड़े-बड़े नीति निर्माताओं को न हो, वे नीतियां जासूसों की जेब में होती हैं। अच्छी बात यह कि ये जासूस ज्यादा महंगे भी नहीं। ये कोई हाई प्रोफाइल भी नहीं। उनकी ट्रेनिंग पर भी बहुत ज्यादा खर्च भी नहीं करना पड़ता। इतने किफायती, ठोस व भरोसेमंद जासूस और कहां मिलेंगे?

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