{"_id":"787441f49013c55900c1aa7e34453714","slug":"our-politics-is-away-from-culture-hindi","type":"story","status":"publish","title_hn":"संस्कृति से दूर हमारी राजनीति","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
संस्कृति से दूर हमारी राजनीति
परिचय दास
Updated Sun, 28 Jun 2015 04:30 PM IST
विज्ञापन
भारतीय राजनीति के समकालीन पहलू बड़े दिलचस्प हैं। एक तरफ वोट की ताकत में भरोसा बढ़ रहा है, दूसरी ओर, कई राज्यों में चरम अतिवाद के हिंसक रूप भी दिखाई पड़ रहे हैं। जनता धीरे-धीरे राजनीतिक चेतना ग्रहण करती जा रही है। पहले अपने प्रति किए जा रहे अन्याय पर वह वैसी प्रतिक्रिया नहीं देती थी, जैसी अब दे रही है।
विज्ञापन
अब के राजनीतिक वर्ग में पहले जैसी सांस्कृतिक दृष्टि का अभाव है। उन्हें साहित्य, संगीत, कलाओं, इतिहास, स्थापत्य आदि का ज्ञान कम ही है, रुचि भी नहीं। ये सब कुछ उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं है। उनके लिए वोट लेना तथा सिस्टम में बने रहना ज्यादा महत्वपूर्ण है। जबकि पहले के राजनेता व्यापक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध होते थे तथा उनका जनोन्मुख सांस्कृतिक सरोकार होता था। जय प्रकाश नारायण कविताएं लिखते थे, तो डॉ. राममनोहर लोहिया की पुस्तक, भारत माता, धरती माता और सांस्कृतिक भारत की व्याख्या करती है। यह पुस्तक राम, कृष्ण, शिव पर गहन दृष्टिपात करने के साथ-साथ भारत के इतिहास की व्याख्या का आधार समझाती है। आचार्य नरेंद्र देव अध्यात्म, धर्म, साहित्य की गहन व्याख्या करते हैं, तो डॉ. भीमराव अंबेडकर भारतीय समाजों के बद्धमूल सभ्यतागत प्रसंगों पर अपना प्रश्न खड़ा करते हैं। इतिहास को नेहरू अपने तरीके से देखते हैं, तो गांधी जीवन के सम्यक संदर्भों को बारीकी से देख लेते हैं। इसी तरह दीनदयाल उपाध्याय भारतीय भाषाओं के लिए संघर्ष की थ्योरी देते हैं।
विज्ञापन
लोकतांत्रिक व्यवस्था दुनिया की सबसे बेहतर प्रणाली मानी जाती है। चीन की अच्छी स्थिति व सामरिक हैसियत के बावजूद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वहां नहीं है। जिन सुल्तानों के मुल्क में तेल की बिक्री से भारी पैसा आया है, वहां की न्याय व्यवस्था मध्यकालीन है, जिसमें चौराहों पर पत्थर मारकर सजा दी जाती है। लेकिन अच्छा होने के बावजूद लोकतंत्र में कुछ कमियां बनी हुई हैं। जैसे, जाति उन्मूलन के बदले उसका मजबूत होते जाना। कई बार मंत्रिमंडल में एक या दो जाति के चालीस फीसदी से ज्यादा सदस्य दिखाई देते हैं। भागीदारी के नाम पर इसका औचित्य भी ठहराया जाता है। एक ही परिवार के लोग व्यवस्था पर कब्जा कर लेते हैं। लोकतंत्र में इससे भद्दी चीज और क्या हो सकती है? अब भावुक मुद्दे उतने कारगर सिद्ध होने वाले नहीं। आपको व्यावहारिक रूप से जनहित के कार्य करके दिखाने होंगे। जनता बिजली, सड़क, पानी, अन्न, रोजगार, शिक्षा, सुरक्षा, कानून-व्यवस्था, स्वच्छ वातावरण, राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास चाहती है। जो दल, सरकार या राजनीतिक दल इसकी बात करेगा, जनता उसे ही समर्थन देगी। सामान्य आदमी भी अब राजनीति को बहुत बारीकी से देख रहा है। वह देख रहा है कि गांव का परेशान किसान मजबूरी में आत्महत्या कर रहा है, जबकि कुछ ताकतवर लोग व्यवस्था का लाभ उठा रहे हैं।
विज्ञापन
बांध, पर्यावरण, प्रदूषण आदि के बारे में पहले जागरूकता नहीं थी। आज इस पर चर्चा है। गंगा-यमुना आदि नदियों की जो हालत है, उस पर जनता में रोष है। जनता देख रही है कि भाषा नीति लागू कर पाने में राजनीतिक नेतृत्व कितना ढुलमुल है। खेती को हतोत्साहित किया जा रहा है। जो कलाएं विलुप्त हो रही हैं, उन्हें बचाना चाहिए। संभव हो, तो राजनेताओं को सांस्कृतिक व कलात्मक प्रशिक्षण किया जाना चाहिए। तभी तो वे कला, इतिहास व साहित्य के लिए कुछ कर पाएंगे। धरती की गंध से उपजा नायक ही हमारा असली नायक होगा।