Opinion: जीवंत सभ्यता के खंडहर, विलुप्त होने के कगार पर घुमंतू लोक गायन परंपरा
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विस्तार
घुमंतू लोक गायन परंपरा काल के गाल में समा रही है। सदियों तक हमारी संस्कृति को रचने वाली तथा समाज को त्याग, बलिदान व प्रेम का पाठ पढ़ाने वाली घुमंतू लोक गायन परंपरा आज विलुप्त होने के कगार पर है। वे जीवंत सभ्यता के खंडहर बनते जा रहे हैं, जहां केवल दीवार शेष बची है। उनके समक्ष पहचान के दस्तावेजों से लेकर बहुत सारे संकट हैं। हमारी सभ्यता को गढ़ने, उसे दिशा देने का काम इसी घुमंतू लोक गायन परंपरा ने किया है। आज भी ग्रामीण भारत इसी परंपरा से संचालित होता है। यह परंपरा हमारे समाज को ऊर्जा देती है, जीवंत बनाती है। यह किसी भी अन्य परंपरा का विरोधी कतई नहीं है। घुमंतू लोक गायन परंपरा पूरे हिंदुस्तान में फैली हुई है, जो अलग-अलग किरदारों और विषयों को अपने अंदर संजोए हुए है। कोई लोकगीतों में है, तो कोई किस्सा-कहानियों में किसी को गाथा गान से बताते हैं, तो किसी का आधार दोहे और मुहावरे हैं।
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के हरबोला, उतर प्रदेश के मुस्लिम जोगी, हरियाणा के जंगम साधु, राजस्थान, मालवा और गुजरात के भोपा, सुदूर दक्षिण में कर्नाटक के चित्रकथि, महाराष्ट्र के गोंदली, असम में अहोम राज के समय के इतिहास को गाने वाले लोग इसी परंपरा से जुड़े हैं। इन समुदायों की जीवन-शैली, भाषा, परंपरा, विषय-वस्तु भले ही अलग हों, किंतु इनमें कुछ समानताएं भी हैं। जैसे कि भोपा भले ही राजस्थान का हो, वह गुजरात से लेकर मालवा और हरियाणा के क्षेत्र तक में घूमता है। गोंदली भले ही महाराष्ट्र का हो, उसके गोंदल करने का क्षेत्र मध्य प्रदेश से लेकर कर्नाटक तक फैला है। हरबोला लोग बुंदेलखंड से उठकर मालवा होते हुए बिहार की सीमा छूते हुए छत्तीसगढ़ तक जाते हैं। उत्तर प्रदेश के मुस्लिम जोगी उत्तराखंड, हिमाचल, हरियाणा और राजस्थान में घूमते हैं, तो कुछ दक्षिण भारत की यात्रा करते हैं।
वडार लोग ओडिशा, झारखंड को जोड़ने का काम करते हैं। मौखिक गायन की विषय-वस्तु भी विविधता से भरी है, जो हमारी सामूहिक स्मृतियों को गढ़ती है। ये धर्म और जाति के भेद से मुक्त हैं। मुस्लिम साधु हैं। फकीर मुस्लिम हैं। गोंदली और भोपा कुल देवी को मानते हैं। जंगम हिंदू हैं। कुछ सिख धर्म को मानने वाले हैं। जंगम हरियाणवी में गाता है, तो भोपा मारवाड़ी के साथ गुजराती और मालवी में गाता है। हरबोला, बुंदेली के साथ-साथ छत्तीसगढ़ी में गाता है। गोंदली मराठी में गाते हैं। भले ही ये लोग अक्षर ज्ञान नहीं जानते, किंतु एक-एक समुदाय पांच-पांच भाषाएं बोलता है। गोंदली मराठी के अलावा, मालवा, हिंदी, गुजराती, तमिल और तेलुगू भी बोल लेता है।
पंडवानी गायन में छत्तीसगढ़ की तीजन बाई से हम परिचित हैं। राजस्थान की मनबरी भोपी को जानते हैं। मालवा, राजस्थान, गुजरात में फिरने वाले कावड़िया भाट में स्त्री-पुरुष के साथ बूढ़े भी रहते हैं। भोपा और भोपी के साथ बच्चे भी भाग लेते हैं। ये लोग इतिहास की अलग जीवंत व्याख्या हमारे सामने रखते हैं। ये स्थानीय योद्धाओं, समाज सुधारकों की गाथा गाकर हमारी स्मृतियों को जिंदा करते हैं। मध्य प्रदेश में सिंगा जी को गाएंगे, लक्ष्मीबाई के बारे में बताएंगे। महाराष्ट्र में शिवाजी को गाएंगे। भोपा, पाबूजी राठौड़ को गाएंगे, मालवा वाले भोपा देवनारायण को गाएंगे। जंगम साधु कलयुग की कथा कहेंगे। हरबोला श्रवण कुमार की कथा गाएंगे, गंगा जी की आरती करेंगे। कर्नाटक में चित्रकथि का काम करेंगे, तो मध्य प्रदेश में इतिहासकार का काम करेंगे। हरियाणा के लोक भजन गाएंगे।
इस घुमंतू लोक गायन परंपरा में इस्तेमाल होने वाले लोक-साज भी अलग-अलग हैं। भोपा के पास रावण हत्था है, तो जंगम जोगी के पास टल्ली है। मुस्लिम जोगी के पास सारंगी है। सभी को बजाने का तरीका भले ही अलग हो, किंतु सब में मिठास और सुकून है। यह संगीत समाज को सकारात्मकता देता है। हमारे यहां त्रासदी है कि हम पांच भाषा जानने वाले, उसे रोजाना बरतने वाले लोगों को अनपढ़ कहते हैं। आजादी से पहले गांधी और टैगोर ने इस तरफ इशारा किया था और इस क्षेत्र में कार्य भी किया था। आजाद भारत में यह कार्य नहीं हुआ। इक्का-दुक्का लोगों ने इस ओर कार्य किया, जिसमे गांधी से प्रभावित धर्मपाल, अनिल सदगोपाल का प्रयास भी शामिल है।
हमारे समाज और संस्कृति का विकास पश्चिम के मॉडल से अलग ढंग से हुआ है। हमारे यहां स्मृतियों को गढ़ने में यात्राओं, लोक साजों, जोगियों, संन्यासियों, लोक गाथाओं, लोक गीतों, कथाओं, किस्सों और कहानियों का योगदान रहा है। पूरी दुनिया में लेखन का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। भारत में तो पुस्तक छापने का इतिहास मात्र चार सौ पैंसठ वर्ष पुराना है, जबकि मौखिक ज्ञान की परंपरा तो सभ्यता के साथ से ही चली आ रही है। नई शिक्षा नीति, 2020 में भी मात्र यह कहा गया है कि देशज ज्ञान को बढ़ावा दिया जाएगा। किंतु देशज ज्ञान क्या है, यह सवाल अनसुलझा है।
इस पर सरकार का कोई रुख स्पष्ट नहीं है। इसकी न कोई विषय वस्तु हमारे पास है और न इसे पढ़ाने वाले लोग। सरकारी स्कूल और कॉलेज की हालत तो पहले ही खराब है। इन समुदायों के समक्ष बहुत से संकट हैं, लेकिन हमारे सामने कुछ ज्यादा गहरे सवाल हैं, जिनका जवाब तलाशना बहुत आवश्यक है। सदियों तक समाज में प्रेम, त्याग और ज्ञान की अलख जगाने वाले ये समुदाय क्या हमारे सामाजिक फलक से मिट जाएंगे? क्या अब इस घुमंतू लोक गायन परंपरा का कोई स्थान नहीं रहेगा? यदि स्थान है, तो कहां?
- लेखक यूनिवर्सिटी ऑफ हैडलबर्ग, जर्मनी में स्कॉलर हैं।