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Opinion: उम्मीद की किरण, सत्ता-विरोधी लहर को चुनौती

Sun, 11 Dec 2022 06:37 AM IST
Palaniappan Chidambram पी. चिदंबरम
Updated Sun, 11 Dec 2022 06:37 AM IST
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सार
बीजद प्रमुख नवीन पटनायक ने ओडिशा में 2000 से लगातार पांच विधानसभा चुनाव जीते हैं। लेकिन सबसे दर्शनीय और निरुत्साहित करने वाली जीत निश्चित रूप से भाजपा की है।
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Opinion: A ray of hope, a challenge to the anti-incumbency wave
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

अतीत के अनेक चुनावों में सत्ता-विरोधी लहर को पार्टी की गर्दन पर बोझ की तरह समझा जाता था। वर्ष 1967 में जब कांग्रेस के वर्चस्ववाद का दौर खत्म हुआ और कई राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों के हाथों कांग्रेस की हार हुई, तब गैरकांग्रेसी पार्टियां सत्ता में आईं। जबकि केंद्र में गैरकांग्रेसी सरकार वर्ष 1977 में आई। राज्यों में वैकल्पिक सरकारों की शुरुआत केरल से हुई। 1990 के दशक से हम राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु में वैकल्पिक सरकारें देख रहे हैं।



सत्ता-विरोधी लहर को चुनौती
अलबत्ता ऐसे एकाधिक कद्दावर नेताओं का उदाहरण हमारे सामने है, जिन्होंने सत्ता-विरोधी लहर को चुनौती दी। यानी उन पर सत्ता-विरोधी लहर का असर नहीं होता था। अन्नाद्रमुक नेता एमजी रामचंद्रन ने 1977 से 1987-यानी अपनी मृत्यु तक तमिलनाडु में लगातार तीन विधानसभा चुनाव जीते। अन्नाद्रमुक ने फिर लगातार तीन बार 2011, 2016 और 2021 में विधानसभा चुनाव जीता। बीजद प्रमुख नवीन पटनायक ने ओडिशा में 2000 से लगातार पांच विधानसभा चुनाव जीते हैं। लेकिन सबसे दर्शनीय और निरुत्साहित करने वाली जीत निश्चित रूप से भाजपा की है, जो गुजरात में लगातार  सात विधानसभा चुनाव जीत चुकी है, और वर्ष 2002 से भाजपा यह उपलब्धि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, पहले मुख्यमंत्री और फिर पार्टी के निर्विवाद सबसे बड़े नेता के तौर पर- हासिल करती आ रही है। ऐसा लगता है कि कुछ स्थितियों में, और कुछ खास नेताओं के लिए सत्ता में होना कमजोरी के बजाय उनकी ताकत साबित हुआ है। राजनीतिक विश्लेषकों, सामाजिक मनोवैज्ञानियों और चुनाव विश्लेषकों को इस प्रवृत्ति पर सावधानीपूर्वक शोध करना चाहिए।


इस मामले में मेरा सरसरी विश्लेषण यह है-
1. पांच साल तक सत्ता में रहने वाली पार्टियां चुनाव में खर्च करने के लिए अकूत मात्रा में धन इकट्ठा कर लेती हैं। यह अपेक्षाकृत नई प्रवृत्ति है। के कामराज, एस निजलिंगप्पा, के ब्रह्मानंद रेड्डी, ईएमएस नंबूदिरीपाद, हितेंद्र देसाई, वाई वी चव्हाण, मोहनलाल सुखाड़िया या ज्योति बसु जैसे दिग्गज जब सत्ता में थे, तब इस प्रवृत्ति के बारे में सुना भी नहीं गया था। 2. सत्ता में रहने वाली पार्टियां नौकरशाही, खासकर पुलिस बल, का राजनीतिकरण करने से नहीं हिचकतीं। दूसरे किसी भी राज्य की तुलना में गुजरात और उत्तर प्रदेश में यह प्रवृत्ति सबसे ज्यादा देखी जा सकती है। हाल ही में उत्तर प्रदेश के रामपुर विधानसभा के उपचुनाव में लगभग 32 फीसदी वोटिंग हुई, पर उसी राज्य के खतौली में 56 प्रतिशत मतदान हुआ। जबकि मैनपुरी लोकसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में करीब 53 फीसदी वोटिंग हुई। समाजवादी पार्टी का आरोप है कि पुलिस की सक्रिय भूमिका के कारण ही रामपुर में वोटिंग इतनी कम हुई।

तकनीक और ताकत का जोड़
3. चतुर और दूरदर्शी राजनीतिक पार्टियों ने अपने संगठन को मजबूत और आधुनिक बनाने के लिए तकनीक का प्रयोग किया है। भाजपा और कुछ दूसरी पार्टियां बूथ कमेटियां बनाने में सफल हुई हैं, ताकि मतदान के दिन चुनाव प्रबंधन किया जा सके। भाजपा तो मतदाता सूची के हर पन्ने का प्रबंधन करती है, ताकि प्रत्येक मतदाता को चुनावी बूथ तक लाया जा सके। 

4. जिन सत्तारूढ़ पार्टियों का शक्तिशाली संगठन है, वे अपने संगठन को बाहुबलियों के जरिये भी मजबूत करते हैं। चुनाव से पहले दूसरी पार्टियों के मौजूदा विधायकों और कुख्यात बाहुबलियों को सत्तारूढ़ पार्टी में आने के लिए बहलाया जाता है। पैसा तो इसमें बड़ी भूमिका निभाता ही है। लेकिन पैसे से भी ज्यादा घोटालों आदि में चल रही जांच से बचाने या अभयदान देने की गारंटी भी नेताओं के दलबदल की एक बड़ी वजह है। घोटालों में फंसा नेता अगर पाला बदल कर सत्तारूढ़ पार्टी में जाता है, तो उसके खिलाफ चल रही जांच अचानक बंद हो जाती है। 

5. सत्तारूढ़ पार्टी पिछले कुछ वर्षों से धर्म का इस्तेमाल ध्रुवीकरण के औजार के रूप में कर रही है। ऐसा कहीं खुले रूप में और निर्लज्ज तरीके से किया जाता है, तो कहीं बारीक रूप से। उदाहरण के लिए, भाजपा ने गुजरात में 2012, 2017 और 2022  के विधानसभा चुनावों में, और उत्तर प्रदेश में 2022 के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम समुदाय के किसी व्यक्ति को टिकट नहीं  दिया, जबकि गुजरात और उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वहां की आबादी के क्रमश: 9.7 और 20 प्रतिशत हैं। मुस्लिम समुदाय को टिकट न देने से दूसरे समुदाय में संदेश जाता है और इससे ध्रुवीकरण को मजबूती मिलती है।

6. सत्ताधारी पार्टी के कामकाज की विफलता चुनाव प्रचार के शोर-गुल में न सिर्फ गुम हो जाती है, बल्कि भयभीत और चापलूस मीडिया सत्ताधारी पार्टी के कामकाज को बहुत शानदार तरीके से पेश करता है। स्वतंत्र मीडिया अब अतीत की बात है। वस्तुत: सभी मीडिया समूह (टेलीविजन और समाचारपत्र) कॉरपोरेट स्वामित्व वाले और उन्हीं के द्वारा नियंत्रित हैं। सोशल मीडिया तुलनात्मक रूप से आजाद जरूर है, लेकिन वहां फेक न्यूज, फेक वीडियोज, ट्रोल आदि का बोलबाला है।

विजेता हार सकते हैं
मेरा मानना है कि इन सबके अलावा हर राज्य के समाज में अलग-अलग चीजें हैं, जो वहां के लिए विशिष्ट हैं। मेरे मुताबिक, गुजरात और उत्तर प्रदेश में विचित्र किस्म की शांति और खामोशी पसर गई है। क्या यह वही खामोशी है, जिसके बारे में जॉन एफ कैनेडी ने कहा था, 'कब्र जैसी शांति और गुलामों जैसा सन्नाटा?' मुझे उम्मीद है कि ऐसा नहीं होगा। असहमति में उठे स्वरों को सरकार दबाती है, जबकि मीडिया इसका जिक्र ही नहीं करता। अगर मौजूदा प्रवृत्ति हमारे समाज को एक रहस्यमय शांति और खामोशी की ओर ले जाए, तो इसका मतलब यह होगा कि भारत सांविधानिक लोकतंत्र से चुनावी लोकतंत्र की ओर तेजी से बढ़ रहा है। हाल में संपन्न हुए चुनाव विजेता और पराजित, दोनों के लिए सबक हैं। आम सबक यह है कि विजेता के पास मजबूत संगठन, प्रतिबद्ध कैडर के अलावा सफल चुनावी
अभियान और कुशल प्रबंधन है। गुजरात में भाजपा के पास ये चारों चीजें थीं, जिनके कारण उन पर सत्ता-विरोधी लहर का कोई असर ही नहीं हुआ। दूसरी तरफ,  हिमाचल प्रदेश के विधानसभा और दिल्ली नगर निगम के चुनावों में सत्तारूढ़ भाजपा को चुनौती देने वाली कांग्रेस और आप के पास भी ये चारों चीजें थीं। इस कारण दोनों जगह भाजपा को सत्ता-विरोधी लहर का नुकसान झेलना पड़ा। तीन जगह हुए तीन चुनावों में तीन राजनीतिक पार्टियों की जीत निराशा के गहन अंधेरे में आशा की किरण की तरह है।

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