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जनतंत्र में सुनने-सुनाने के खुलते रास्ते
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भारत का लोकतंत्र
- फोटो : iStock
आजादी के बाद भारतीय जनतंत्र के बनते इतिहास को याद करें, तो लगता है कि बीती सदी के 80 के दशक के पूर्व केंद्रीय मंत्रिगण नीति निर्माण में शामिल तो रहते थे, पर उन्हें जनता के बीच मीडिया के विभिन्न माध्यमों द्वारा व्याख्यायित नहीं करते थे, कभी-कभार अखबारों, रेडियो एवं चुनावी भाषणों में उनका जिक्र कर देते थे।
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जैसे, बाबू जगजीवन राम ने अस्पृश्यता के विरुद्ध बने अनेक कानूनों की कभी वकालत नहीं की, कभी-कभी भाषण में उनकी चर्चा वह कर देते थे। तब मीडिया का इतना विस्तार भी नहीं हुआ था। सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक चैनल तो थे ही नहीं। अखबार छपते थे और रेडियों पर खबरें आती थीं। प्रोफेसर नुरूल हसन, जॉर्ज फर्नांडीज, मधु लिमये, राम सुभग सिंह जैसे ज्ञानी मंत्री भी अपनी नीतियों पर विस्तार से अपनी पार्टी के प्रकाशनों एवं सभाओं में तो बोलते थे, पर राष्ट्रीय मीडिया में नीतियों की ब्रीफिंग एवं न्यूज कवरेज ही आती थी।
बीती सदी के 90 के बाद के दशक में कुछ मंत्रियों ने अपने विभाग की नीतियों की मीडिया, अखबारों एवं चैनलों में हल्की वकालत प्रारंभ की। मनमोहन सिंह की सरकार में पी चिदंबरम, जयराम रमेश, शशि थरूर जैसे मंत्रियों ने अपने विभागों की नीतियों एवं कार्यों को अखबारों एवं टीवी चैनलों के माध्यमों से व्याख्यायित किया एवं जनता में उन्हें प्रसारित करने का प्रयास किया। वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद स्वयं प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया एवं इलेक्ट्रॉनिक चैनलों के माध्यम से अपनी नीतियों एवं योजनाओं के बारे में लोगों को बताया। सूत्रों की मानें, तो उन्होंने मंत्रियों को भी अपनी नीतियों एवं योजनाओं को मीडिया के विविध माध्यमों से लोगों तक पहुंचाने के लिए प्रेरित किया।
उनके दूसरे कार्यकाल में इस प्रक्रिया में तेजी आई। अनेक मंत्रियों ने अपने विभाग की योजनाओं के विभागीय विज्ञापनों के साथ ही अखबारों में लेख लिखकर, टीवी चैनलों के कार्यक्रमों में भाग लेकर, फेसबुक, ट्विटर तथा अनेक सोशल साइट्स के माध्यम से व्याख्यायित करने की कोशिश की। कोई इसे प्रचार कह सकता है, तो कोई इसे नीतियों को फैलाकर जनतंत्र को सहभागी बनाने की प्रक्रिया के रूप में भी देख सकता है। पश्चिमी लोकतंत्र में यह आम है। भारत में बीती सदी के 90 के दशक के बाद इसमें तेजी आई।
तब मीडिया का विस्तार हुआ, भूमंडलीकरण के तेज होने के बाद लोकतांत्रिक व्यवहार में एक-दूसरे से सीखना, सिखाना बढ़ा, जनता में शिक्षा बढ़ी और जनतांत्रिक चेतना भी बलवती हुई। भाजपा में रमेश पोखरियाल निशंक, नरेंद्र सिंह तोमर, प्रकाश जावडेकर जैसे मंत्री अपने विभागों की नीतियों के बारे में मीडिया में लिखते-बोलते रहते हैं। नई शिक्षा नीति के आने के बाद शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से इसे जनता के बीच प्रसारित करने के प्रयास किए।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण एवं उनके अधिकारी भी इस मोर्चे पर सक्रिय दिखते हैं। विदेश मंत्रालय के मंत्री एवं अधिकारियों को समय-समय पर अपनी नीतियों को लेकर राष्ट्र से संवाद तो करना ही पड़ता है। जनता में बढ़ रही जनतांत्रिक चेतना एवं उससे उपज रहे प्रश्न, नीति निर्माताओं को अपने पक्ष को समझाने एवं स्पष्ट करने के लिए प्रेरित करती है। भारतीय जनतंत्र को सहभागी जनतंत्र में बदलने के लिए भी यह आवश्यक प्रक्रिया है। फिर नीतियों के प्रसार से सत्तारूढ़ दल की राजनीतिक शक्ति में भी वृद्धि होती है।
आज आप किसी भी मंत्री को ट्वीट से अपनी राय भेज सकते हैं। ये राय पहुंचने के बाद नीति निर्माण को कितना प्रभावित करती हैं, इस पर अध्ययन होना बाकी है। पर इतना तय है कि यह प्रक्रिया भारतीय जनतंत्र को सहभागी बनाने की दिशा में आगे बढ़ने का सूचक है। चाहे कोई भी दल सरकार में रहे, 1990 के बाद भारतीय जनतंत्र के चरित्र में हो रहे परिवर्तन जनतंत्र के आगे बढ़ने के ही संकेत हैं। मीडिया, सोशल साइट्स एवं जन दबाव की सीमाओं के बावजूद जनतंत्र में सुनने-सुनाने के रास्ते खुलते ही जाएंगे। भविष्य में जनता एवं राजनीतिक नेतृत्व, दोनों को और ज्यादा संवादी होना ही पड़ेगा।