सवालों से सीधे टकराने वाला चला गया

श्यौराज सिंह बेचैन Updated Thu, 21 Nov 2013 08:49 PM IST
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Om prakash valmiki obituary

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ओमप्रकाश वाल्मीकि विगत 17 नवंबर को हमसे दूर चले गए। 30 जून, 1950 को उत्तर प्रदेश के बरला गांव (मुजफ्फरनगर) में जन्मे ओमप्रकाश ने साहित्य की दुनिया में अपनी वाल्मीकि पहचान के साथ प्रवेश किया था। उनकी अभिव्यक्ति जिस भी माध्यम में, यानी कविता-कहानी-आत्मकथा आदि में रही, स्वानुभूति से भरी हुई थी। आत्मपरकता उनकी अधिकांश कविताओं में थी। ‘मैं’ या ‘तुम’ सीधे सवाल उठाती कविताएं हैं।
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वाल्मीकि जिस कविता से प्रसिद्ध हुए वह है, ठाकुर का कुआं। इस कविता की आखिरी पंक्तियों में वह लिखते हैं- हल की मूठ पर रखी हथेली अपनी/ फसल ठाकुर की/ कुआं ठाकुर का, पानी ठाकुर का/ खेती-खलिहान ठाकुर के/ गली-मोहल्ले ठाकुर के/ फिर अपना क्या? गांव? शहर? देश?देश! उनकी आरंभिक कविताएं आर कमल ने कानपुर से प्रकाशित निर्णायक भीम में प्रकाशित की थीं। उनकी कविताओं का अभी पूरी तरह मूल्यांकन होना बाकी है। दिल्ली में प्रकाशित एक हिंदी दैनिक में उन्होंने कविता लिखी कि तुम्हारे रचे शब्द तुम्हें डसेंगे सांप बनकर, गंगा के किनारे कोई बट वृक्ष ढूंढ लो/ कहीं अकाल मृत्यु के बाद भयभीत आत्मा भटकते-भटकते/ किसी कुत्ते या सूअर की देह में प्रवेश न कर जाए/ या फिर पुनर्जन्म की लालसा में किसी डोम या चूहड़े के घर पैदा न हो जाए/ चूहड़े या डोम की आत्मा ब्रह्म का अंश क्यों नहीं है? मैं नहीं जानता, शायद आप जानते हों। ऐसे कवि की अंतिम विदाई कर्मकांडों और पुनर्जन्म की आकांक्षा के साथ नहीं होनी चाहिए थी।
अपने समाज को लेकर लिखी गई कहानियां और आत्मकथात्मक लेखन में यथार्थपरक प्रामाणिकता है। सदियों का संताप कविता संग्रह से उन्होंने साहित्य का सफर शुरू किया। उनकी रचनाएं अंग्रेजी सहित कई भारतीय भाषाओं में अनुदित हुईं। हालांकि कथा-पत्रिकाओं के दरवाजों पर वाल्मीकि की दस्तक देर तक लगी; वर्षों तक दरवाजे नहीं खुले, पर हंस का दरवाजा खुलने के बाद कई और दरवाजे खुले। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने मराठी दलित लेखकों का आत्मकथात्मक साहित्य देखा-पढ़ा और तय किया कि उन्हें भी आत्मकथा लिखनी चाहिए।
इसके बाद उन्होंने जूठन शीर्षक से अपनी आत्मकथा लिखी, जिसके अंश और उनकी अन्य रचनाएं एनसीईआरटी सहित कई विश्वविद्यालयों की पाठ्य पुस्तकों में पढ़ाई जा रही हैं। जूठन दिल्ली विश्वविद्यालय के एमए हिंदी में भी पढ़ाई जा रही थी, लेकिन खेद है कि वर्तमान सत्र में इसे हटा लिया गया है। शिक्षा के अलावा दलितों की मुक्ति का कोई मार्ग आज भी नहीं है और तब भी नहीं था, जब वाल्मीकि जी ने शिक्षा के दरवाजे में प्रवेश किया था। इतना ही नहीं, वाल्मीकि जी यह हमेशा मानते रहे कि लेखकीय निर्माण में पुस्तकालयों की बड़ी भूमिका होती है। किताबें दलितों के घरों का बेशकीमती खजाना हैं।

जूठन चर्चित होने के बाद उन्हें जयश्री, परिवेश, कथाक्रम, न्यू इंडिया बुक पुरस्कार और साहित्यभूषण सम्मान मिले। वह यह भी कहते रहे कि साहित्य अकादेमी सम्मान की दलितों में शुरुआत मैं ही करूंगा, पर ऐसा नहीं हो सका।

उन्होंने शुरुआत दलित कविता से की थी, मगर वह मूलतः कथाकार थे। उन्हें आलोचना में खींचने वालों ने उनके काम में बाधा डाली। उनका ध्यान मराठी कविता, मराठी आत्मकथा और अंबेडकर परवर्ती दलित साहित्य पर टिका हुआ था। हिंदी दलित साहित्य का इतिहास या शोधानुशासन का उन्हें आभास नहीं था। यहां तक कि उपजातियों के प्रसंग में भी उन्हें कई गलतफहमियों ने घेर लिया था। मराठी हिंदी के मामले में वह गैरदलितों जैसा भी सोचने लगे थे। इन सबके बावजूद उन्हें नए-पुराने सब लेखकों ने असीम आदर दिया। उनके काम को देखने और समझने-समझाने-मूल्यांकन करने के कई पक्ष सामने आए। उनके पास अपने समाज के अनछुए अनुभव थे, जिन्हें केवल वही लिख सकते थे। आत्मकथा के बाद के पच्चीस वर्षों की कथा- दूसरा भाग लिखे बगैर उनका जाना, दलित साहित्य की अपूरणीय क्षति का घटित हो जाना है। वाल्मीकि जी को अब इस रूप में याद किया जाए ताकि दलित समूह/ वर्ग के लेखकों को काम के आधार पर अत्यधिक सहयोग और सम्मान मिले।
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