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नई सरकार के सामने पुरानी समस्याएं

Mon, 22 Sep 2014 12:02 AM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Mon, 22 Sep 2014 12:02 AM IST
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Old problems in front of new government

कांग्रेस मुक्त भारत था नरेंद्र मोदी का नारा, जिस पर अमल हो गया है। लेकिन दशकों लंबे कांग्रेसी राज ने इतना बेहाल करके छोड़ा है इस देश को कि परिवर्तन के रास्ते में कठिनाइयां ही हैं। प्रधानमंत्री को समय लगेगा समझने में कि कितनी समस्याएं उन्हें विरासत में मिली हैं, ये कितनी गंभीर हैं और कितना कठिन है इनका समाधान।

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कुछ समस्याएं ऐसी हैं, जो देश में कदम रखते ही दिख जाती हैं। टूटी-पुरानी सड़कें, बदसूरत शहर, गंदगी हर जगह और बिजली-पानी जैसी बुनियादी जरूरतों का अभाव। कुछ समस्याएं ऐसी हैं, जो पहली नजर में नहीं दिखतीं, पर गंभीर हैं। सबसे गंभीर समस्या है, शिक्षा की। जो बच्चे पढ़ लेते हैं स्कूलों में, उनकी पढ़ाई इतनी बेकार होती है कि न वे अपने देश के इतिहास के बारे में सीखते हैं कुछ, न उसकी प्राचीन सभ्यता का इल्म लेकर निकलते हैं स्कूलों से, न ही किसी भाषा को अच्छी तरह बोलना सीखते हैं।
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कांग्रेस की शिक्षा नीति ऐसी रही है, जिसके तहत ज्यादातर सरकारी स्कूलों में शिक्षक नहीं होते या पढ़ाई नहीं होती। सो गरीब मां-बाप भी अपने बच्चों को अंग्रेजी मीडियम स्कूलों में भेजना पसंद करते हैं। मगर पढ़ाने वाले भी इतनी कम अंग्रेजी जानते हैं कि पढ़ाएंगे क्या? अमीर भारतीय बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में ही पढ़ाते हैं।
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कांग्रेस के राज में साहित्य अकादेमी, हिंदी अकादमी और उर्दू अकादमी जैसी संस्थाओं में लाखों-करोड़ों रुपये निवेश किए गए। पर सब बेकार गया। बेकार न गया होता, तो आज उत्तर भारत के स्कूलों में पढ़ाने को मिलतीं तमिल, बांग्ला और मलयालम लेखकों-कवियों की किताबें, और दक्षिण भारत में पढ़ाए जाते गालिब, मीर और फैज के कलाम।

भारतीय भाषाओं को जिंदा रखने में सरकारी संस्थान नाकाम रही हैं। जबकि कुछ लोग निजी तौर पर वे काम कर रहे हैं, जो सरकारी संस्थाएं नहीं कर पाई हैं। पिछले हफ्ते मेरी मुलाकात संजीव सराफ से हुई। उन्हें कुछ साल पहले उर्दू से मोहब्बत इतनी हो गई कि अपना कारोबार छोड़कर उर्दू के लिए काम करना शुरू कर दिया। उनकी मेहनत का फल यह है कि आज दुनिया की सबसे बड़ी ऑनलाइन उर्दू लाइब्रेरी बन चुकी है। इसका नाम है रेख्ता.कॉम, जहां आप पढ़ सकते हैं, उर्दू के तमाम मशहूर शायरों के कलाम। अगर आपको उर्दू का कोई शब्द समझ में नहीं आए, तो आप इस पर क्लिक कर फौरन जान सकते हैं हिंदी या अंग्रेजी में इसका मतलब।

सराफ साहिब का अगला लक्ष्य है, उर्दू शायरों की गजलों को किताबों के रूप में छपवाना। वह जमा कर रहे हैं उर्दू की पुरानी किताबें। सराफ अपने पैसों से वह काम कर रहे हैं, जो सरकारी संस्थाएं वर्षों बाद भी नहीं कर पाई हैं। बावजूद इसके कि केंद्र उर्दू को बचाने के लिए साठ करोड़ रुपये खर्च करता है सालाना।


सराफ साहिब से मिलकर मैं खुश भी हुई और उदास भी। उदास इसलिए कि यही काम हर भारतीय भाषा के लिए अगर नहीं किया जाएगा शीघ्र ही, तो देश की अगली पीढ़ी अनपढ़ बन जाएगी। सिर्फ मानव संसाधन विकास मंत्रालय के तहत हो सकता है यह काम, लेकिन इसके लिए चाहिए ऐसा मंत्री, जो कांग्रेस की पुरानी सोच से मुक्त हो। अभी तक स्मृति ईरानी ने यह मुक्ति नहीं पाई है, सो उलझी रही हैं छोटे-छोटे झगड़ों में। इनसे वह निकलेंगी, तो शायद देख पाएंगी कि वह भारतीय शिक्षा में ऐतिहासिक परिवर्तन ला सकती हैं।

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