ओडिशा ट्रेन दुर्घटना: रेलवे सुरक्षा के लिए सबक है यह हादसा, फिर खुला पुराने सवालों का पिटारा
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विस्तार
ओडिशा के बालासोर जिले में शुक्रवार शाम को तीन ट्रेनों के टकराने से हुआ हादसा बेहद भयानक है। तीन ट्रेनों के टकराने की घटना तो दुर्लभ है ही, हाल के वर्षों में हमारे यहां रेल हादसे में हताहतों का आंकड़ा भी इतना नहीं रहा। दरअसल शुक्रवार की शाम करीब साढ़े छह बजे हावड़ा से चेन्नई जा रही शालीमार-चेन्नई सेंट्रल कोरोमंडल एक्सप्रेस बालासोर के पास बहनागा बाजार रेलवे स्टेशन से कुछ पहले बेपटरी हो गई और इसका इंजन आउटर पर एक मालगाड़ी पर चढ़ गया। कोरोमंडल एक्सप्रेस के पीछे वाले डब्बे तीसरे ट्रैक पर गिरे, जिससे उस पर तेजी से आ रही बंगलूरू-हावड़ा सुपर फास्ट एक्सप्रेस के कुछ डिब्बे पटरी से उतर गए। टक्कर इतनी भीषण थी कि रेल ट्रैक पर कई किलोमीटर तक पटरी गायब थी और टूटकर दूर जा गिरी थी, कुछ डब्बों से पहिये अलग हो चुके थे, तो कई डब्बे पिचक गए थे।
रेलवे ने इस भीषण दुर्घटना के कारण के बारे में अभी कुछ नहीं बताया है। सच्चाई तो जांच के बाद ही सामने आएगी, लेकिन फौरी तौर पर इस हादसे का कारण सिगनल फेल होना माना जा रहा है। बताया जाता है कि कोरोमंडल एक्सप्रेस को पहले ग्रीन सिग्नल दिया गया था, फिर सिग्नल अचानक लाल हो गया था। लेकिन तब तक एक्सप्रेस ट्रेन लूप लाइन में प्रवेश कर मालगाड़ी को टक्कर मारकर बेपटरी हो चुकी थी। उसी समय डाउन लाइन पर सुपर फास्ट ट्रेन आ चुकी थी, जिसके दो डब्बे पटरी से उतर गए।
हादसे के बाद से ही राहत और बचाव का कार्य जारी है और अनेक ट्रेनों को निरस्त करना पड़ा है। प्रधानमंत्री ने ट्रेन दुर्घटना से संबंधित एक उच्च स्तरीय बैठक की अध्यक्षता की, जबकि रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने दुर्घटना की जांच के आदेश दिए हैं। हादसा इतना भीषण है कि विदेशी राष्ट्र प्रमुखों ने इस पर अपनी संवेदनाएं जताई हैं। राहत और बचाव कार्य में एनडीआरएफ की टीमें उतरी हैं, अतिरिक्त बसों और ट्रेन कोचों का इंतजाम करने के अलावा वायुसेना ने हेलीकॉप्टर भी तैनात किए हैं।
चूंकि हमारे यहां रेल दुर्घटनाएं कम होती हैं, और उनमें भी इतनी मौतें नहीं होतीं, ऐसे में, यह हादसा और हताहतों का आंकड़ा स्तब्ध कर देने वाला है। लेकिन इसे भी समझना होगा कि यह दुर्घटना अकस्मात घटी है। दरअसल कोरोमंडल एक्सप्रेस के ड्राइवर के पास इतना समय ही नहीं था कि वह ट्रेन रोक सके। जिस रफ्तार से वह गाड़ी दौड़ रही थी, उसमें ड्राइवर की दृश्यता दो किलोमीटर की दूरी तक थी। और ऐसे में, गाड़ी रोकने के लिए उसके पास एक मिनट का समय भी नहीं था। और अगर ड्राइवर ने ब्रेक लगाया होगा, तो गाड़ी नहीं भी रुकी हो सकती है। एक्सप्रेस ट्रेन के ड्राइवर बेहद अनुभवी होते हैं और सतर्क रहते हैं। लेकिन उन्हें गाड़ी रोकने के लिए समय तो मिलना चाहिए। अगर आपके पास बेहद शानदार कार हो, लेकिन बेहद तेज गति में चलते हुए उसके सामने अगर दूसरी कार आ जाए, तो दुर्घटना शायद ही टाली जा सकती है। ओडिशा के बालासोर में हुआ रेल हादसा इसी तरह का है।
हां, इतनी मौतें नहीं होनी चाहिए थी। हम तो चाहते हैं कि रेल दुर्घटना में एक भी मौत न हो। हमारे पास दुनिया के उन्नत रेलवे कोच हैं और अद्यतन तकनीक भी है। जहां तक हादसे के बाद राहत प्रबंधन की बात है, तो भारतीय रेल के पास सौ-डेढ़ सौ साल पुरानी और बेहद चाक-चौबंद व्यवस्था है। वैसे भी हमारे पास रेल सुरक्षा की मजबूत प्रणाली है, जिसके तहत कर्मचारियों की टीम, जिनकी अलग-अलग बीट होती है, रेल पटरियों की लगातार सघन जांच करती है। इसके अलावा मॉक ड्रिल भी लगातार होती है, जिससे कि अगर कहीं दुर्घटना हो, तो तत्काल वहां तक पहुंचा जा सके और प्रभावितों के लिए चिकित्सा व्यवस्था मुहैया कराई जा सकी। वैसी स्थिति में तमाम कर्मचारियों को अपनी भूमिका के बारे में पता रहता है और रेलवे नेटवर्क के भीतर डॉक्टरों व अस्पतालों की सूची रहती है।
इसलिए ओडिशा में हुई ट्रेन दुर्घटना भीषण होते हुए भी राहत प्रबंधन के मामले में निश्चिंत रहना चाहिए कि प्रभावितों के लिए राहत और उनकी चिकित्सा की पूरी व्यवस्था होगी। रेल दुर्घटना के ऐसे मामलों में राहत कार्य कई बार बहुत आसान नहीं होता, क्योंकि ट्रैक के दोनों ओर गांव होते हैं। लेकिन अनेक बार ऐसे हादसों में प्रभावितों को ग्रामीणों की मदद ही सबसे पहले मिलती है, जैसे कि इस भीषण हादसे में भी देखा गया, जब गांववाले मदद के लिए सबसे पहले आए।
कहा यह जा रहा है कि जहां दुर्घटना हुई, उस रूट पर टक्कर-रोधी उपकरण (एंटी कॉलिसन डिवाइस) या कवच नहीं लगा है। सच्चाई जो भी हो, लेकिन यह भी वास्तविकता है कि इस हादसे के बाद रेलवे सुरक्षा अब सरकार की प्राथमिकता में भी होगी। याद रखना चाहिए कि रेलवे सुरक्षा के लिए वर्ष 2012 में अनिल काकोदकर की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की गई थी। उस कमेटी ने जो सिफारिशें की थी, उनमें रेल सुरक्षा के लिए पांच वर्षों की अवधि में एक लाख करोड़ रुपये का निवेश करने और रेलवे सुरक्षा प्राधिकरण का गठन करने की बात कही गई थी। उस कमेटी की सिफारिशें अभी तक लागू नहीं की गई हैं। लेकिन यह उम्मीद करनी चाहिए कि रेल परिवहन को आधुनिक बनाने के प्रयास में लगी केंद्र सरकार ऐसी पहल जरूर करेगी, जिससे देश का पूरा रेल नेटवर्क कवच के दायरे में आ सके। (अमर उजाला से बातचीत पर आधारित)
-लेखक रेलवे बोर्ड के पूर्व चेयरमैन हैं