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ओबामा के 'मन की बात'

थॉमस एल फ्रीडमैन Updated Mon, 06 Apr 2015 08:09 PM IST
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Obama doctrine

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यह वाकया 1996 के सितंबर महीने का है, जब मैं ईरान की यात्रा पर था। उस यात्रा की जो घटना मुझे सबसे ज्यादा याद रही, वह यह थी कि मैं जिस होटल में ठहरा था, उसकी लॉबी में दरवाजे के ऊपर अमेरिका के प्रति विरोध जताता एक चिह्न अंकित था। हैरत की बात यह थी कि वह चिह्न किसी बैनर पर नहीं, बल्कि दीवाल पर टाइल के जरिये उकेरा गया था। उसे देखकर मुझे लगा कि यह तो आसानी से निकलने वाला नहीं है। मगर उस घटना के तकरीबन बीस वर्ष बाद ओबामा प्रशासन और ईरान के बीच हुए ड्राफ्ट समझौते ने उस चिह्न को धुंधला होते देखने का बेहतरीन मौका दिया है। इससे अमेरिका और ईरान के बीच के कड़वाहट भरे रिश्तों में नर्मी लाने में भी मदद मिल सकती है, जिसने बीते 36 वर्षों से पूरे क्षेत्र में तनाव व्याप्त कर रखा है। हालांकि यह मौका अमेरिका, इस्राइल और हमारे सुन्नी अरब सहयोगियों के लिए एक जोखिम भी अपने साथ लाया है। दरअसल, इस समझौते की बदौलत ईरान आखिरकार परमाणु हथियार संपन्न देश बन सकता है।
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स्विट्जरलैंड में पिछले हफ्ते ईरान के साथ हुए ड्राफ्ट समझौते में अमेरिका किस तरह इन जोखिमों और अवसरों में संतुलन बहाल करने की कोशिश कर रहा है, इस सिलसिले में अपनी योजना पर चर्चा करने के लिए राष्ट्रपति ओबामा ने बीते शनिवार को ओवल ऑफिस में मुझे आमंत्रित किया। इस दौरान उनकी जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित किया, उसे मैंने नाम दिया, 'ओबामा डॉक्ट्रिन' यानी ओबामा सिद्धांत। दरअसल, यह सिद्धांत तब सामने आया, जब मैंने उनसे पूछा कि म्यांमार, क्यूबा और अब ईरान, इन तीनों ही देशों को लेकर लंबे समय से चली आ रही अमेरिका की पृथकतावादी नीति को बदलने के फैसले के पीछे आखिर उनकी सोच क्या है।


ओबामा ने बताया कि इन तीनों देशों के मद्देनजर प्रतिबंधों और पृथक करने की अंतहीन नीति के बजाय बुनियादी रणनीतिक जरूरतों पर चर्चा के साथ-साथ वार्ता को लगातार जारी रखने की नीति अमेरिका के लिए ज्यादा मुफीद साबित हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि बेहद ताकतवर अमेरिका को खुद पर भरोसा करना होगा, ताकि वह नई संभावनाओं का पता लगाने के लिए कुछ सुविचारित जोखिम ले सके। ईरान के साथ कूटनीतिक समझौते की कोशिश इसी तरह का प्रयास है, जिसमें ईरान को कुछ परमाणु सहूलियतें जरूर मुहैया होंगी, लेकिन जिससे परमाणु बम बनाने की उसकी क्षमता को कम से कम दस वर्ष पीछे धकेला जा सकेगा।

बकौल ओबामा, 'हमारे पास पर्याप्त ताकत है कि हम खुद को जोखिम में डाले बगैर ऐसे प्रयोग कर सकते हैं। यही सच है, जिसे लोग समझ नहीं रहे।' वह आगे कहते हैं, 'अब क्यूबा को ही लें। अगर हम लगातार वार्ता के जरिये क्यूबाई लोगों के लिए बेहतर संभावनाएं तलाश रहे हैं, तो इसमें हमें कोई खतरा नहीं है। क्यूबा एक छोटा-सा मुल्क है, जो हमारी सुरक्षा के लिए चुनौती बन ही नहीं सकता। हां, अगर प्रयोग के नतीजे अनुकूल नहीं रहे, तो हम नीतियों को बदल भी सकते हैं। यही बात ईरान पर भी लागू होती है। क्यूबा की तुलना में यह निस्संदेह बड़ा देश है। यह खतरनाक देश भी है, जो ऐसी गतिविधियों में लिप्त रहा है, जिनसे अमेरिकी नागरिकों को अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ा था। मगर यह भी सच है कि जहां ईरान का रक्षा बजट 30 अरब डॉलर का है, वहीं हमारा बजट 600 अरब डॉलर के करीब है। खुद ईरान जानता है कि वह हमसे नहीं लड़ सकता। ओबामा डॉक्ट्रिन यह कहता है कि हम लगातार वार्ता करेंगे, मगर अपनी क्षमताओं के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे।

मैंने अमेरिकी राष्ट्रपति को इतने भावुक और व्यक्तिगत लहजे में अपनी बात कहते कभी नहीं देखा। ओबामा का कहना था, 'इस्राइल एक ताकतवर लोकतंत्र है। हममें काफी समानताएं हैं। हममें खून और परिवार से जुड़े रिश्ते हैं। ये चीजें अमेरिका और इस्राइल के संबंधों को खास बनाती हैं। ऐसे में, हमारे लिए जरूरी है कि हम अपने-अपने देशों में होने वाली बहसों को निष्पक्षता और आदर के साथ देखें।'

ओबामा कहते हैं, 'इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू जो कह रहे हैं, उसकी मैं इज्जत करता हूं। वह कहते हैं कि इस्राइल के सामने जोखिम ज्यादा हैं, इसलिए वह इस तरह के प्रयोग नहीं कर सकता। मैं इससे पूरी तरह सहमत हूं। मैं इस्राइल की इस धारणा को भी समझता हूं कि यहूदियों के दर्दनाक इतिहास को देखते हुए वह अपनी सुरक्षा के लिए पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर नहीं रह सकता। मगर मैं इस्राइल से यह जरूर कहूंगा कि मैं यह सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हूं कि वह न केवल अपनी सैन्य क्षमता को बरकरार रखते हुए भविष्य में उस पर होने वाले किसी भी हमले को रोक सके। इसके अलावा मैं ईरान समेत दूसरे सभी देशों से भी ऐसी ही प्रतिबद्धताएं चाहता हूं कि अगर इस्राइल पर हमला होगा, तो वे सभी उसके साथ खड़े होंगे। गर ऐसा हो गया, तो यह ईरान के समझौते की शक्ल में मिलने वाले बेहतरीन अवसर का फायदा उठाने के लिए पर्याप्त होगा। साथ ही, इससे परमाणु मुद्दे के अलावा दूसरे मुद्दों पर बातचीत शुरू करने का अवसर भी मिल सकेगा।'

ओबामा आगे कहते हैं, 'मैं इस्राइल के लोगों से यही कहना चाहूंगा कि हमारे द्वारा अपनाए गए कूटनीतिक रास्ते के सिवाय ईरान को परमाणु हथियार पाने से रोकने का कोई दूसरा तरीका नहीं है।' जब मैंने उनसे पूछा कि क्या आप इस्राइल के साथ रिश्तों को निजी तौर पर ले रहे हैं, तो उन्होंने कहा, 'यह सुनना, कि अमेरिकी प्रशासन को इस्राइली हितों का ख्याल नहीं है, निजी तौर पर मेरे लिए काफी मुश्किल है।' रही बात ईरान के साथ हुए समझौते की, तो वह कहते हैं कि अभी समझौता पूरा नहीं हुआ है। ईरान और अमेरिका में भी इसको लेकर अभी काफी राजनीतिक गतिरोधों का सामना करना बाकी है।

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