अब आगे का रास्ता
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एग्जिट पोल जितने ठिठक रहे थे, भाजपा के भीतरी हलकों में उतनी ठिठक नहीं थी। यह कल रात का किस्सा है। कुछ बड़े लोग मानकर चल रहे थे कि ‘कुंभाराम’ को ‘कुंभकरण’और ‘बीएसएनल’ को ‘बीएचइएल’ पुकारने वाले लीडर के बहाने संतोष से सोया नहीं जा सकता। वाड्रा-मिशेल-नेशनल हेराल्ड और राफेल तो छोटे-छोटे पत्थर हैं, कभी यहां गिरे-कभी वहां! असल चीज यह है कि मौजूदा मुख्यमंत्री से ‘बोरियत’, ‘थकान’ या ‘चिढ़’ कितनी है। क्या छत्तीसगढ़ में रमन सिंह का चेहरा देखकर सब ‘थक’ गए हैं? क्या मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह से ‘बोर’ हो गए हैं या राजस्थान में वसुंधरा राजे से ‘विरक्ति’ हो गई है। सुबह नतीजे आने शुरू हुए, तो देखा कि राजस्थान में कांग्रेस को अपेक्षित ‘क्लीन स्वीप’ तो नहीं मिल रहा, मगर ‘नोटा’ का प्रतिशत कांग्रेस और भाजपा के वोट प्रतिशत में अंतर से करीब-करीब तिगुना आया है। इसका मतलब क्या है? करीब साढ़े चार लाख से ज्यादा चिढ़े हुए लोग नोटा पर चले गए? उन्हें बस वही सीएम दुबारा नहीं चाहिए था। साफ है कि यह बड़ा निर्णायक प्रतिशत है, जो समीकरण बदल सकता था। इसी में इन नतीजों की चाबी छिपी है।
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यह देखने की चीज है कि लुटियन के विशेषज्ञ भी मानते दिख रहे हैं कि मोदी की रैलियों ने आखिर में कुछ ‘रिकवरी’ करवाई, वर्ना वे पिछले महीने तो बिला शक साफ कह रहे थे कि यह सरकार सिरे से गई। जाहिर है, फिर भी वैसी नहीं गई है, जैसी कभी कांग्रेस गई थी। यानी यह ‘वह’ नहीं है, जो ‘वही’ हो। छत्तीसगढ़ में रुपये का सेर चावल देने वाले रमन सिंह के लिए सब मानते थे कि अजीत जोगी कांग्रेस के वोट काटकर मदद कर देंगे, पर लगता है कि उन्होंने भाजपा के ही वोट काटे। बचे शिवराज, तो ‘मामाजी’ की परेशानी, कांग्रेस के साझा अभियान से ज्यादा अपने सिपहसालारों की थी। स्थानीय अहंकार ने जब घंटियां बजानी शुरू की, तो आरती के सुर कब बदले, पता ही नहीं चला।
अब मोदी बनाम कांग्रेस! 2014 के बाद, 2019 से पहले, पहली बार कांग्रेस भाजपा से सीधे मुकाबले में खड़ी थी। ये वो क्षेत्र हैं, जहां से अस्सी से ज्यादा सदस्य संसद में पहुंचते हैं। आंध्र के विभाजन के बाद तेलंगाना का यह पहला चुनाव था। वहां तो टीआरएस ने कांग्रेस, चंद्रबाबू और भाजपा तीनों को रास्ता दिखा दिया है। ओवैसी का तो कहना ही क्या! और मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट की जीत ने, नॉर्थ ईस्ट का रुख साफ कर दिया है। सभी जानते हैं कि राज्य के क्षत्रपों में जीतते हुए गठबंधन के साथ रहने का इतिहास है। लोगों को फारूक अब्दुल्ला से लेकर चंद्रबाबू तक की तस्वीरें याद हैं। अब कनिमोई के हाथों से केजरीवाल शॉल पहनना शुरू हो गए हैं। कुछ नेता तो मौसम वैज्ञानिक हैं, जो किसी की भी सरकार हो, मंत्री होते हैं। सारा माहौल यह बनना है कि यह मोदी के ‘अजेय’ मॉडल में बड़े धक्के की शुरुआत है। मोदी की पार्टी में अपनी मुश्किलें हैं, संभवतः उतनी ही जितनी कि पार्टी के बाहर। वे जनता में अपनी व्यक्तिगत अपील से आडवाणी के सार्वजनिक विरोध के बावजूद प्रधानमंत्री पद के दावेदार घोषित हुए थे। उन्होंने चमत्कारिक ढंग से पहली बार पूर्ण बहुमत की दक्षिणपंथी सरकार बनाने में कामयाबी पाई। मगर उनके चमत्कार से दबी बहुत-सी दुखी आत्माएं हैं, जो उन्हें अपदस्थ देखना चाहती हैं। लेकिन यही वह वजह भी है, जिसके चलते वर्षों से एक लॉबी मानती है कि उनकी पराजय में ‘मानवीयता’ का उत्कर्ष छुपा है। मुश्किल यही है कि उनके विचार का कर्नाटक, राजस्थान या मध्य प्रदेश कहीं भी, अभी असली बहुमत वाला बहुमत नहीं है। मोदी अपने तरीकों से यह कैसे अपने पक्ष में कर पाते हैं, इसी चमत्कार की उम्मीद भक्त कर सकते हैं।
सवाल यह है कि मोदी के केदारनाथ और राहुल के कैलास मानसरोवर में 2019 के लिए क्या छिपा है? ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ जरूरी है, यह मानकर कांग्रेस ने भी वही धज अपना ली है। कहीं राहुलजी की जनेऊ नजर आती है, कहीं गोत्र। कभी कमलनाथ मंजीरे बजाते दिखते हैं, कभी अमीन कागजी मंदिर में छप्पन भोग की झांकी करवाते हैं। इस तरह हिंदुत्व की परिक्रमा तो पूरी हो गई, जातियों का युद्ध और मुसलमानों का बैंक, दोनों अपने-अपने हिसाब से आ गए। रही जीएसटी और नोटबंदी, तो उसे आर्थिक बौद्धिकों के युद्ध के लिए छोड़ दिया जाएगा। किसान, बीफ, सांप्रदायिकता वगैरह तो राजनीतिक ब्याह के गीत हैं। लेकिन ऊर्जित पटेल का इस्तीफा, सीबीआई की अंदरूनी खींच-तान, सुप्रीम कोर्ट के जजों की तनातनी की पुरानी फिल्में मिलाकर एक ऐसा माहौल तैयार होगा कि ‘हिंदू अधिपति’, ‘जन नायक’ और ‘बदलाव के प्रतीक’ के कवच में सेंध लगती दिखाई देगी। यह ‘परसेप्शन’ ही अपने आप में मोदी के लिए बड़ी चुनौती है।
अब सिर्फ राम मंदिर नहीं, जातियों के पुनर्ध्रुवीकरण का एक नया खेल दोनों ओर से शुरू होगा, जो वैचारिक धुंध का विस्तार करेगा, ताकि भ्रष्टाचार के पुराने मामलों को राजनीतिक बताकर खारिज करने वाले वाक्युद्ध किए जा सकें। जो हिंदू-मुसलमान की बात करते हैं, उन्हें समझ लेना चाहिए कि कांग्रेस तेलंगाना में मुसलमानों के लिए अलग फंड का वायदा कर रही थी, ठीक उसी वक्त दूसरे राज्य में गांव-गांव गौशालाएं खोलने का गीत गा रही थी। यह ‘हिंदू मध्यमार्ग’ का मजा है, जिससे आजकल राजनीतिक पार्टियां अपने आप को किराने की दुकान में तब्दील किए रहती है - जहां हल्दी से लेकर एसिड तक सब मिलता है। किसान, बेरोजगार, समता आदि तो खेल-खिलौने हैं। एक दिलचस्प चीज जाते-जाते आपसे बांटी जा सकती है। तीन राज्यों छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान के बारह नेताओं ने दो महीनों के भीतर कुल 5,774 ट्वीट किए। दोनों पार्टियों के नेताओं के आधे ट्वीट सिर्फ चुनावी बतकहियों पर थे, जिनमें या तो अपने लीडर को ऊपर बताना था या दूसरों के लीडर को नीचे। किसानों की तकलीफों के नाम पर मध्यप्रदेश में बस पांच फीसदी (भाजपा) और 14 फीसदी (कांग्रेस) के ट्वीट थे, छत्तीसगढ़ में यह प्रतिशत एक फीसदी (भाजपा) और सात फीसदी (कांग्रेस) रहा। कांग्रेस की मुसीबत दो नेताओं की थी। मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह ने राहुल के अलावा किसी का नाम ही नहीं लिया।
तो यह झांकी, नौटंकी, बाजीगरी, खेल, अंततः एक नैतिक-महाभारत में तब्दील करने का समय शुरू हो चुका है। निश्चित ही यह भाजपा के लिए चिंता का समय है। कांग्रेस को लाखों ‘नोटा’ के जाने का नहीं, मोदी के करिश्मे में संभावित सूराखों पर भरोसा है। मोदी नोट करें, इन तीन राज्यों के भरोसे अब वह ‘यूपीए’ के पुराने दिनों का जाजम बिछाना चाहती है। और शायद वह यह भी जानती है कि देश में अभी ममता और मायावती भी हैं।