फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Now need to freedom in thinking

अब चाहिए सोच में आजादी

Fri, 15 Aug 2014 11:52 AM IST
केतन मेहता
केतन मेहता Updated Fri, 15 Aug 2014 11:52 AM IST
विज्ञापन
Now need to freedom in thinking

हमने लंबी लड़ाई के बाद 67 साल पहले देश की राजनीतिक आजादी हासिल की थी। आजादी के बाद अब तक हम कई राजनीतिक-सामाजिक घटनाओं के गवाह बने, जिन्होंने देश और समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मुझे लगता है कि आगे हमारे सामने मानसिक रूप से आजाद होने की चुनौती है। आजादी के कुछ वर्षों में ही हमने समझ लिया था कि केवल चुनींदा लोग आजादी का फायदा उठा पा रहे हैं।

विज्ञापन


आर्थिक लगाम गिने-चुने लोगों के हाथों में है। वे शोषण कर रहे हैं। हमने अर्थव्यवस्था को गति देने, रोजगार के अवसर पैदा करने और दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए अर्थव्यवस्था के दरवाजे खोले। इसके बाद तकनीकी क्रांति का दौर आया, जिसने सूचना क्रांति को जन्म दिया और देश-समाज का हुलिया बदलने लगा। ऐसे समय में एक नई युवा पीढ़ी आई, जो इस दौर में पैदा हुई, पली और बढ़ी। यह हमारा भविष्य है। अतः वक्त आ चुका है कि हम अपने मस्तिष्क और सोच को भी खोलें। उन्हें पुराने खयालात से आजाद करें। नई दुनिया के साथ आगे बढ़ें।
विज्ञापन


बढ़ते वक्त और बदलते सामाजिक परिदृश्य के बीच हम देख सकते हैं कि हमने अपने भीतर कई ऐसी बातों को दबाकर रखा है, जो काफी पहले खत्म हो जानी चाहिए थी। हमारे बीच कई मुद्दों को लेकर तीखी असहिष्णुता है। कठिनाई यह है कि हम आगे तो बढ़ना चाहते हैं, लेकिन हमारी नजरें पीछे हैं। पीछे देखकर आगे कैसे बढ़ा जा सकेगा? दुनिया जिस तरह से ग्लोबल हो चुकी है, जिस तरह से सीमाएं धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जा रही हैं, उसे देखते हुए जरूरी है कि हम भविष्य पर नजर रखकर आगे बढ़ें। सदियों की गुलामी और बरसों के पिछड़ेपन के बाद इस देश को संसार के नक्शे में ‘महान राष्ट्र’ का दर्जा दिलाने का समय आ चुका है। यह आसान लक्ष्य नहीं है।
विज्ञापन
विज्ञापन


बदलाव की जो हवा चल रही है, वह बेहद चुनौतीपूर्ण है। कई अच्छी बातें आएंगी, तो कई ऐसी भी, जो आपकी संस्कृति और परंपरा के सामने चुनौतियां खड़ी करेंगी। इन चुनौतियों से पार पाकर ही विकास की राह पर बढ़ा जा सकता है। चुनौतियों का सामना किए बगैर विकास होगा भी कैसे? विकास के सामने चुनौतियां शाश्वत सत्य हैं। विकास एक प्रक्रिया से गुजर कर ही संभव हो सकता है। दुनिया में चुनौतियों का कोई ‘परफेक्ट’ हल नहीं है। रास्ते निकालने पड़ते हैं। इसलिए हमें अब एक ‘उदार मस्तिष्क’ की तरह सोचना होगा।

परिवर्तन के इस समय में समाज की चुनौतियां भी बदली हैं। जब मैंने सरदार पटेल फिल्म बनाई थी, तो उसके केंद्र में यह विचार था कि हमें किस तरह की आजादी चाहिए, उसका लक्ष्य क्या होगा? हमारा देश विविधताओं से भरा है। अलग-अलग रंग-रूप-भाषा और राजनीतिक विचारधारा। यह बहुरंगी चरित्र ही हमारी विशेषता है और हमें इसे खोना नहीं चाहिए। यही विविधता हमारी ताकत भी है। यह विविधता हमारा अतीत है और भविष्य भी। इसे हम कैसे संजोकर रख पाते हैं, यह भी एक चुनौती है। हमें एक समाज के रूप में खुद को नए सिरे से देखना होगा और हर तरह की हीन भावना को मन से निकालना होगा। हमें अपनी ताकत पर भरोसा करना होगा। आत्मविश्वास जगाना होगा, तभी हम ताकतवर देश के रूप में दुनिया के सामने खड़े रह सकेंगे।

हमें अपनी ताकत के रूप में यह भी याद रखना होगा कि हमारी आबादी का पचास प्रतिशत महिलाएं हैं। सदियों तक समाज ने उन्हें आजादी से वंचित रखा। लेकिन आर्थिक उदारीकरण के दौर में वे तेजी से बाहर आईं और आत्मनिर्भर बनी हैं। वे अब आर्थिक-सामाजिक मुख्यधारा में हैं और खुद अपने भाग्य की नियंता हैं। वे अपनी आजादी की मांग कर रही हैं। आप उन्हें लेकर दोहरा रवैया नहीं अपना सकते। उनके विरुद्ध जो अपराध बढ़ रहे हैं, वह यौन कुंठाओं का नतीजा हैं।

मेरी फिल्मों में महिलाएं आपको सदा मजबूत नजर आएंगी। मिर्च मसाला और माया मेमसाब से लेकर आने वाली फिल्म रंग रसिया तक में। मैं गांधीवादी परिवार में जन्मा हूं। मेरे माता-पिता आजादी की लड़ाई में शामिल थे। मेरी मां बहुत सशक्त महिला थीं। सिनेमा मेरे लिए संवाद और शिक्षा का बेहद अहम माध्यम है। आजादी के बाद इसने ही हिंदी के विस्तार में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह अलग-अलग पीढ़ियों को कदम से कदम मिलाकर, साथ लेकर चला है। इसने ही हर दौर में नई पीढ़ी को सपने देखना सिखाया है।


देश और समाज के रूप में हमें अपने अतीत को खूब ढंग से जानना-समझना चाहिए, क्योंकि हम इतिहास नहीं जानेंगे, तो वर्तमान को भी नहीं समझ सकेंगे। ऐसे में अपने भविष्य को सही आकार दे पाना कठिन होगा। अतीत को जानना हमारे विकास का अहम हिस्सा है। अगर अतीत को नहीं जानेंगे, तो बार-बार गलतियां दोहराते रहेंगे। मुझे लगता है कि हम अपने इतिहास को समझ नहीं पा रहे हैं। इतिहास को समझना आसान नहीं है, इसलिए फिर कहूंगा कि हमें अपने मस्तिष्क को आजाद करने की जरूरत है।

(लेखक चर्चित फिल्मकार हैं)

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed