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मृत्युदंड और एनकाउंटर से नहीं
Sun, 08 Dec 2019 07:11 PM IST
Raman Singh
तस्लीमा नसरीन
तस्लीमा नसरीन
Published by: Raman Singh
Updated Sun, 08 Dec 2019 07:11 PM IST
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दुष्कर्म के खिलाफ विरोध प्रदर्शन
- फोटो : a
हम क्या अपने दिल पर हाथ रखकर कह सकते हैं कि जितने लोग जेल में हैं, वे सब अपराधी हैं? जेल जाने वालों और यहां तक कि सजा पाने वालों में से भी कुछ लोग निरपराध होते हैं। गरीबी और असहायता के कारण बहुत लोग अच्छे वकील नहीं कर पाते। उनके हक में अदालती लड़ाई लड़ने वाला कोई नहीं होता। हमें यह सब कुछ पता है, लेकिन विषमता भरे समाज में यह सब देखने-सुनने के हम अभ्यस्त हो चुके हैं कि सबको न्याय नहीं मिलता। जबकि धनाढ्य और प्रभावशाली व्यक्ति कई बार अपराध करके भी बच जाते हैं।
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बांग्लादेश में पिछले कई वर्षों से यह चलन ही हो गया है कि पुलिस मादक पदार्थों का कारोबार करने वालों को उनके घर से उठाकर मार देती है और प्रेस को बताती है कि वे एनकाउंटर में मारे गए हैं। पुलिस जिन लोगों को पकड़ कर ले जाती है, क्या वे अपनी जेब में हथियार लेकर जाते हैं? पुलिस एनकाउंटर की सच्चाई के बारे में मुझे तब पता चला, जब एक बार मैंने ऐसे ही एक कारोबारी की पुलिस के जवानों के साथ बातचीत का वायरल हुआ वीडियो सोशल मीडिया पर देखा-सुना। दरअसल उस कारोबारी को उसकी बेटी बार-बार फोन कर रही थी कि वह कब लौटेंगे। एक बार पिता ने मोबाइल ऑन किया, पर वह जेब में ही रह गया। दूसरी तरफ से बेटी ने सुना कि पुलिस वाले उसके पिता को मार डालने की योजना बना रहे हैं। उसी दौरान उसने पिता के रोने और गोली चलने की आवाज सुनी। अगले दिन अखबारों में उस कारोबारी के पुलिस एनकाउंटर में मौत की खबर छपी थी।
ऐसा नहीं है कि सभी एनकाउंटर संदिग्ध ही होते हैं। आतंकवादियों को ज्यादातर मुठभेड़ों में ही मार डाला जाता है। लेकिन सरकार के शत्रुओं को या पुलिस के लिए असुविधाजनक कुछ लोगों को मादक पदार्थों का कारोबारी या आतंकवादी बताकर मार डाला जाता होगा। जिस बांग्लादेश में गणतंत्र की परवाह किसी को नहीं है, वहां ऐसा होना बहुत आश्चर्यजनक भी नहीं है। बांग्लादेश की तरह भारत में भी पुलिस एनकाउंटर की ऐसी घटनाएं कई बार चर्चा में आती हैं। ऐसा ही एक एनकाउंटर पिछले शुक्रवार को हैदराबाद में हुआ। वहां एक महिला डॉक्टर के साथ सामूहिक दुष्कर्म करने के बाद जलाकर मार डालने के चार आरोपियों को, जो पुलिस हिरासत में थे, पुलिस ने एनकाउंटर में मार डाला। क्यों? पुलिस का कहना है कि वे उनके हथियार छीनकर उन पर हमला करते हुए भाग रहे थे। ऐसा होता है, लेकिन हैदराबाद एनकाउंटर में पुलिस का तर्क प्रथम दृष्टया बहुत विश्वसनीय नहीं लगता। ऐसा प्रायः होता नहीं है कि आरोपियों को घटनास्थल पर अपराध की कड़ियां जोड़ने के लिए ले जाया जाए और साथ में पुलिस के पर्याप्त जवान न हों। और आरोपी अगर भाग ही रहे थे, तो ऐसी परिस्थितियों में उनके पैरों में गोली मारने का नियम है, सीने में नहीं। वे आरोपी थे, लिहाजा पहले अदालत में उनका दोष साबित होने दिया जाता, फिर अदालत को ही तय करने दिया जाता कि वह उन्हें मृत्युदंड देती है या आजीवन कारावास की सजा। अदालत के अलावा किसी को यह फैसला करने का अधिकार नहीं है। अगर पुलिस ही न्याय करने लगे, तो यह बहुत भीषण होगा। आजकल प्रायः ऐसे दृश्य देखने-सुनने में आते हैं कि सड़कों पर मामूली बात पर झगड़ते हुए कोई किसी की जान ले लेता है। यह बताता है कि हमारा समाज किस अराजकता की ओर बढ़ रहा है। लेकिन पुलिस द्वारा एनकाउंटर में मार डालना उससे भी भयावह है, क्योंकि निहत्थों की तुलना में हथियारों से लैस व्यक्तियों के पास हत्या करने की क्षमता ज्यादा है।
गहराई से देखें, तो पूरे उपमहाद्वीप में ही वास्तविक अर्थों में गणतंत्र नहीं है। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि इसकी उपेक्षा ही की जाए। चाहे किसी भी तरह हो, गणतंत्र को प्रासंगिक बनाए रखने के जतन करने ही होंगे। अगर गैर न्यायिक हत्याओं का सिलसिला शुरू हो जाए, तो यह गणतंत्र को ताक पर रख देने जैसा ही होगा। बल्कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए भी व्यापक नजरिया अख्तियार करने की जरूरत है। आजकल ऐसे अपराधों पर फांसी देने की मांग एक सुर में की जाने लगी है। लेकिन फांसी जैसी सख्त सजा से कोई समाज नहीं सुधरता। आंकड़ों के आईने में देखें, तो जिन देशों में मृत्युदंड वैध है, वहां अपराधों की दर अधिक है। दूसरी ओर, जिन देशों में मृत्युदंड पर रोक है, वहां अपराधों की दर कम है।
यह बार-बार प्रमाणित हो चुका है कि मृत्युदंड का भय दिखाकर लोगों को अपराध करने से रोका नहीं जा सकता। बलात्कारियों को फांसी देकर बलात्कार पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता। इसके बजाय पुरुषों को बिल्कुल शुरुआत से ही घर में, बाहर, बस में, ट्रेन में, मॉल में-सर्वत्र यही शिक्षा देनी होगी कि पुरुष और नारी के अधिकार बराबर हैं, और महिलाओं के मानवाधिकार का हनन करने का हक किसी को नहीं है। यह भी कि नारी को दुर्बल समझकर उसके साथ बलात्कार करना, उसका शारीरिक शोषण करना जघन्यतम अपराध है। अच्छी शिक्षा मिलने से ही मनुष्य जिम्मेदार नागरिक बन सकता है। भय दिखाकर मनुष्य को अपराध से विरत करने की कोशिश के बजाय सुशिक्षित कर लोगों को आदर्शवान नागरिक बनाने का प्रयास करना आवश्यक है। दरअसल समाज में पुरुषवर्चस्ववाद को इतने भीषण तरीके से बढ़ावा दिया गया है कि उदार समझे जाने वाले समाजों में भी नारी-विरोध और नारी विद्वेष को आज स्वाभाविक माना जाने लगा है, जो बहुत चिंतनीय है।
इस उपमहाद्वीप में आज जो लोग एनकाउंटर पर खुशी से उछल रहे हैं, क्या गारंटी है कि उनमें से कुछ लोगों को भविष्य में अपराधी होने के संदेह में गिरफ्तार नहीं किया जाएगा, या एनकाउंटर में खत्म नहीं कर दिया जाएगा? जो लोग दूसरों के साथ हुए अन्याय पर ताली पीटते हैं, वे भूल जाते हैं कि भविष्य में उनके साथ अन्याय होने पर भी ताली पीटने वालों की संख्या कोई कम नहीं होगी।