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लज्जा नहीं आती, भय होता है

Fri, 28 Aug 2015 08:06 PM IST
तस्लीमा नसरीन
तस्लीमा नसरीन Updated Fri, 28 Aug 2015 08:06 PM IST
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Not ashamed, its fear

सभ्य दुनिया में नास्तिक, ब्लॉगर और मुक्त मन का होना गौरव का विषय है। लोग उनकी श्रद्धा करते हैं, उन्हें प्यार करते हैं। जिन्हें लोग जानते हैं, उन्हें देखने के लिए भीड़ इकट्ठा होती है, उनका ऑटोग्राफ लेने के लिए मारामारी होती है। लेकिन पृथ्वी की बर्बर जगहों में नास्तिक, ब्लॉगर और मुक्त मन वालों की कदर नहीं है। असभ्य लोगों का मानना है कि जो आदमी प्रगतिशील है, जो ब्लॉग लिखता है, जो स्वतंत्र चिंतन में विश्वास करता है, वह नास्तिक है। ऐसे लोगों का यह भी मानना है कि नास्तिकों की हत्या करने से अच्छा काम और कुछ नहीं हो सकता।

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ऐसे लोगों को सभ्य बनाने का उपाय क्या है? इन्हें सभ्य बनाने के लिए ही करीब तीस साल पहले मैंने लिखना शुरू किया था। लेकिन तीन दशक बाद देखती हूं कि ये और असभ्य हो गए हैं। सिर्फ मेरी कोशिशों से तो पूरे देश (बांग्लादेश) को बदलना संभव नहीं है। अगर और भी लेखक इस संदर्भ में आवाज उठाते, अगर राजनेता कुछ बोलते, यदि सरकारें कुछ कदम उठातीं, तो स्वतंत्र चेतना के लोग शायद बांग्लादेश को बदलने में सक्षम होते। कब आजाद हुआ था अपना देश! क्या सोचकर आजाद हुआ था और आज यह किस मोड़ पर आकर खड़ा है!
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प्रधानमंत्री शेख हसीना और उनके बेटे साजीब अहमद वाजेद ने, जो सूचना और प्रसारण तकनीक मामलों में प्रधानमंत्री के सलाहकार हैं, साफ कह दिया है कि वे नास्तिकों के पक्ष में सार्वजनिक तौर पर खड़े नहीं होंगे। ऐसे में सवाल उठता है कि नास्तिक भी तो बांग्लादेश के ही नागरिक हैं; उनके साथ खड़े नहीं होंगे, तो किनके साथ खड़े होंगे। जवाब सीधा है। वे आस्तिकों के पक्ष में खड़े होंगे। नास्तिकों से सभी एक दूरी बनाकर रहना चाहते हैं। यहां तक कि वह सरकार भी पक्षपात कर रही है, जिसका दायित्व है धर्म, वर्ण, लिंग, भाषा, अंचल आदि की दीवारों को दरकिनार कर देश के सभी नागरिकों को एक तरह समझना।
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बांग्लादेश में निशाना बन रहे अल्पसंख्यक तर्कवादियों के बगल में सरकार खड़ी नहीं होगी। उन निर्दोर्षों की हत्या कर दिए जाने के बाद भी सरकार नहीं कहेगी कि हत्या करना अन्याय है। हत्यारों को सजा मिले, इस मामले में भी वह प्रतिबद्धता नहीं जताएगी। कोई संजीदगी नहीं दिखाएगी। दूसरे हत्याकांडों के संदर्भ में, जैसे कि पेट्रोल बम से कुछ लोगों की जिस तरह हत्या की गई, तो शेख हसीना ने तत्काल प्रतिक्रिया दी। एक हत्याकांड की वह आलोचना करेंगी, मगर दूसरे की नहीं। कितना भयंकर है यह देश। नास्तिकों के साथ उनका संपर्क है, हसीना यह प्रचारित नहीं होने देना चाहतीं। दरअसल उन्हें डर लगता है कि इस तरह की कोशिशों से कट्टरवादियों के वोट कहीं हाथ से निकल न जाएं।
बांग्लादेश सचमुच का लोकतांत्रिक राष्ट्र नहीं है। सच्चे लोकतांत्रिक राष्ट्रों का कोई धर्म नहीं होता। जबकि बांग्लादेश का एक राष्ट्रीय धर्म है। जब तक यह राष्ट्रीय धर्म विदा नहीं होता, जब तक नास्तिक शब्द आस्तिक शब्द जैसा जनमानस में घुल-मिल नहीं जाता, तब तक बांग्लादेश को सचमुच का लोकतांत्रिक राष्ट्र नहीं कहा जा सकता।

तर्कवादी ब्लॉगरों की हत्याओं पर टिप्पणी न करने के शेख हसीना के बेटे के फैसले पर लेखक-अध्यापक मोहम्मद जफर इकबाल ने यह कहा है कि सरकार का यह रुख कट्टरवादियों के लिए हरी झंडी है। जफर इकबाल ने गलत नहीं कहा है। लेकिन अवामी लीग ने कट्टरवादियों को साथ लेकर उनके खिलाफ सिलहट शहर में जुलूस निकालना शुरू कर दिया है। सुनने में यह भी आया है कि अवामी लीग के कुछ नेता चटगांव में अमीर शरीफ के पास से हिफाजत की दुआ लेने नियमित रूप से जाते हैं। इन सब पर सहसा यकीन नहीं होता। अब भी अवामी लीग को लोग सेक्यूलर राजनीतिक पार्टी के तौर पर जानते हैं। वे अब भी मानते हैं कि कट्टरवादियों के खिलाफ बांग्लादेश में यही एक राजनीतिक दल है। लेकिन जो सच्चाई सामने है, उसे देखते हुए लगता है कि अवामी लीग, बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी में कोई अंतर नहीं है।

आजकल मुझे लगता है कि अपने देश के प्रति उम्मीद जताने के लिए कुछ नहीं है। तमाम राजनीतिक दल बांग्लादेश को एक कट्टर इस्लामी और आतंकवादियों का देश बनाएंगे, और जनता चुपचाप यह विनाश देखती रहेगी। हालांकि सभी लोग इसे विनाश मानते हैं, ऐसा भी नहीं है। समाज में कट्टरता जिस तरह बढ़ रही है, उससे लगता है कि ज्यादातर लोग बांग्लादेश को दारूल इस्लाम बनाना चाहते हैं। बांग्लादेश में जो बुद्धिजीवी, विज्ञान पर भरोसा करने वाले, धर्ममुक्त और मानवतावादी हैं, जिन्होंने अन्याय और अराजकता के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस दिखाया है, उन्हें बेहद सुनियोजित ढंग से एक-एक कर मार डाला गया है। इन बर्बर हत्यारों को कभी सजा नहीं मिलेगी। कारण ये कट्टरवादियों और राजनेताओं के अपने आदमी हैं।


बांग्लादेश को एक समय दुनिया के लोग एक ऐसे देश के रूप में जानते थे, जहां हर साल भीषण बाढ़ आती थी। मगर अब वे बांग्लादेश को एक ऐसे मुल्क के रूप में जान रहे हैं, जहां हर महीने धर्म के विरोधियों की हत्या होती है। पहली त्रासदी प्राकृतिक थी। दूसरी त्रासदी मनुष्य निर्मित है। बांग्लादेश का नया परिचय उसके पुराने परिचय से भयंकर है। यह ज्यादा बर्बर और वीभत्स है। मनुष्य की धार्मिक आस्था का दुरुपयोग कर चुनाव जीतने के हथकंडे पर अगर रोक नहीं लगाई गई, तो राजपथ और अनेक प्रतिभाशाली लोगों का खून बहेगा। एक समय शेख मुजीबुर रहमान ने उस पाक सेना से देश को बचाने की अपील की थी, जिसने बांग्लादेश के बुद्धिजीवियों की सामूहिक हत्या की थी। आज उन्हीं शेख मुजीबुर की बेटी शेख हसीना के अनुग्रह पर पल रही बांग्लादेश की सेना बुद्धिजीवियों की हत्या कर रही है। शेख मुजीब सैन्य तानाशाही के खिलाफ उठ खड़े हुए थे, जबकि शेख हसीना सैनिकों के समर्थन में हैं। ऐसे बांग्लादेश को देखकर अब लज्जा नहीं आती, बल्कि भय होता है।

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