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ऐसा कर्मयोगी दूसरा नहीं

Wed, 06 Feb 2013 09:42 PM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Wed, 06 Feb 2013 09:42 PM IST
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not another man of action

महर्षि मुद्गल पावन तीर्थभूमि कुरुक्षेत्र के अग्रणी तपस्वी साधकों में थे। वह छात्रों को शास्त्रों का अध्ययन कराते, अतिथियों की सेवा में तत्पर रहते तथा दीन-दुखियों की सहायता करने की प्रेरणा देते। शेष बचे समय में वह भगवान की उपासना करते। महर्षि दुर्वासा उनके अतिथि सत्कार की परीक्षा लेने के लिए छह हजार शिष्यों के साथ उनके आश्रम में पहुंचे। मुद्गल जी ने सभी का उपयुक्त अतिथि सत्कार किया और उन्हें ससम्मान बिठाया।

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महर्षि दुर्वासा ने कई बार उन्हें उत्तेजित करने का प्रयास किया, किंतु मुद्गल जी ने क्रोध को पास भी नहीं फटकने दिया। यह देखकर महर्षि दुर्वासा ने उन्हें आशीर्वाद दिया, तुम्हें शीघ्र स्वर्ग की प्राप्ति होगी।
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नियत समय पर देवदूत उन्हें स्वर्ग ले जाने के लिए आए। महर्षि मुद्गल जी ने उनसे पूछा, क्या स्वर्ग में मैं वंचितों की सेवा, अतिथियों का सत्कार और ईश्वर की भक्ति कर सकूंगा। उन्हें उत्तर मिला, स्वर्ग में आप केवल सुख भोग सकेंगे। वहां कोई कर्म नहीं कर पाएंगे। मुद्गल जी बोले, आप वापस चले जाएं, मुझे स्वयं सुख भोगने में नहीं, दूसरों को सुख पहुंचाने, सेवा और सत्कार करने में आनंद प्राप्त होता है।
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भगवान की भक्ति करके मुझे जो संतोष मिलता है, वह सांसारिक सुखों में कैसे मिल पाएगा। इसलिए मुझे कर्मयोगी ही रहने दें। देवदूत उस अनूठे कर्मयोगी के आगे नतमस्तक हो उठे।

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