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निर्वासन
कल्लोल चक्रवर्ती
Updated Sat, 04 Oct 2014 08:29 PM IST
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अखिलेश हमारे समय के एक सजग और जरूरी लेखक हैं। 'चिट्ठी', 'शापग्रस्त' और 'जलडमरूमध्य' जैसी कहानियों और 'अन्वेषण' जैसे उपन्यास का लेखक 'निर्वासन' में जीवन के एक विराट फलक के साथ हमारे सामने है। ठीक ही इंगित किया गया है कि यह निर्वासन उपन्यास में कई-कई स्तरों पर है।
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एक निर्वासन खुद कथानायक सूर्यकांत का अपने परिवार से है। एक निर्वासन उनके चाचा का अपने परिवार से है। एक निर्वासन भगेलू पांडे का है, तो एक निर्वासन उनके पोते रामअजोर पांडे का है। लेखक ने भाषा से निर्वासित हुए शब्दों और जीवन से निर्वासित हुई चीजों को भी उसकी समग्रता के साथ रखा है। रामअजोर पांडे उन्नीसवीं शताब्दी में अकाल के कारण निर्वासित होने को विवश हुए थे। लेकिन इक्कीसवीं सदी में सूर्यकांत और उनके चाचा का अपने परिवारों से निर्वासन ज्यादा सूक्ष्म और पीड़ादायक है। यहां सिर्फ एकांत और विस्थापन नहीं है, बृहस्पति और रामअजोर पांडे के गठजोड़ के बहाने धार्मिक कट्टरवाद और कॉरपोरेट पूंजी का गठबंधन भी है। यहां महानगरीय जीवन में अकेले रहने की यंत्रणा है, जहां दफ्तर से लौटते सूर्यकांत के लिए गौरी की चिंता कई किस्म की दुश्चिंताओं में बदल जाती है।
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अखिलेश ने अपने समय की कथा कही है, जो इतनी व्यापक, तथ्यबहुल और सुदूरप्रसारी हो गई है कि कहीं-कहीं उबाऊ लगती है, बोझ भी। पर शोध का जो स्तर इसमें है, वह प्रभावित करने वाला है। इसमें उन्नीसवीं शताब्दी का अकाल और लोगों के गिरमिटिया बनने की कथा है, अवध में जमींदारों के खिलाफ आंदोलन में बाबा रामचंद्र के नेतृत्व का जिक्र है, आपातकाल है, उन्नीस सौ चौरासी है, तो मानबहादुर सिंह की हत्या और राजेश शर्मा की आत्महत्या का जिक्र है। और तो और, समकालीन पत्रकारिता का विद्रूप भी यहां है।
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सूर्यकांत अपने बारे में कैंसर की झूठी खबर फैलाता है और अपने पत्रकार दोस्त बहुगुणा से नौकरी के लिए कहता है, तो एक टीवी चैनल वाला उन्हें रखने को तैयार होता है, जिसमें पहले दस दिनों तक उनके बारे में यह विज्ञापन दिखाया जाना है-मौत से घिरा पत्रकार लाएगा जिंदगी के समाचार। लेकिन चैनल वाले को जैसे ही पता चलता है कि सूर्यकांत को कैंसर नहीं है, वैसे ही वहां उसकी नौकरी की संभावना भी खत्म हो जाती है! इसी तरह हिंदी अखबारों में आए बदलाव ने स्थानीय खबरों को कितना महत्वपूर्ण बना दिया है और थोड़ी दूर की खबरों को कितना महत्वहीन, इसका भी वर्णन यहां है। अतीत से वर्तमान-और वर्तमान से अतीत में उसकी यात्रा का कौशल भी उतना ही हैरान करने वाला है। चूंकि इस उपन्यास का फलक विशाल है, ऐसे में अखिलेश के रचनात्मक कौशल की कसौटी अलग-अलग कालखंडों और जीवन रूपों के ट्रीटमेंट पर तय होनी है। और इस लिहाज से लेखक ने निराश नहीं किया है।
अतीत से वर्तमान और वर्तमान से अतीत में उसकी यात्रा का कौशल भी उतना ही हैरान करने वाला है। लेखक में गजब का बतरस है। कथा को किसी भी मोड़ पर विस्तार देने में उन्हें महारत हासिल है। सूक्ष्म ब्योरों को पकड़ने की उनकी क्षमता लाजवाब है-अकाल में लुटे-पिटे हुए सात लोगों के सामने जब पूड़ी-सब्जी और मीठी चटनी के दोने आते हैं, तो आखिर में वे दोने की सींक निकालकर बचे मसाले और तरी को भी साफ कर देते हैं। इसी तरह सूर्यकांत की दादी की जिजीविषा का विवरण अद्भुत है। सूरीनाम में गन्ने के खेत में रोने को फसल की बढ़ोतरी के लिए एक कर्मकांड बताना और आपातकाल के दौरान सुल्तानपुर के किस्से व्यंग्य के बेहतरीन उदाहरण हैं।
इस उपन्यास में थोड़े और निर्मम संपादन की जरूरत थी, तो देवकांत बरुआ की जगह चंद्रकांत बरुआ छप जाने के कारण नहीं, बल्कि इसलिए कि इसकी मोटाई कम होने पर पाठकों की वे शिकायतें नहीं होतीं, जो आज हैं। इसके बावजूद गोसाइगंज गांव का जो चित्रण हुआ है, चाचा और भतीजे के बीच का जो विशद वार्तालाप है, सुल्तानपुर से लौटते हुए सूर्यकांत के भाई और बहनोई में अमेरिका जाने को लेकर जो विवाद होता है, ट्रेन में लौटते हुए सूर्यकांत के मोबाइल पर उनके संदेश और कॉल जिस तरह आते हैं और अपने आत्मीयजनों द्वारा दी गई चीजों से भरे थैले को नीचे गिराकर इतिहास और संबंधों के बोझ से वह खुद को जिस तरह मुक्त करता है, वे पढ़ने लायक है। कोई भी कृति अपने आप में पूरी नहीं होती। एसएमएस और वनलाइनर के दौर में भारी-भरकम उपन्यास किसी को आकर्षित नहीं कर सकता। लेकिन कई विषय ऐसे हैं, जो विराट पटकथा की मांग करते हैं। निर्वासन का महत्व इसी में है।