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नौ वर्ष नौ महीने चले अढ़ाई कोस
अशोक सण्ड
Updated Mon, 24 Feb 2014 07:07 PM IST
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संसदीय कार्यमंत्री भले नाथ हों कमल के, लेकिन ‘कमल’ वालों ने उनकी एक न सुनी। आंकड़ों को सहेजने वालों के हिसाब से विगत चार साल नौ महीनों में मात्र 1,331 घंटे ही कार्यरत रही पंद्रहवी लोकसभा। नौ वर्ष नौ महीने में भ्रष्टाचार में लिप्त रहने के बाद अंतिम घड़ी में व्हिसल ब्लोअर बिल पारित कर इतिश्री रेवाखंडे समाप्त हो गया पूरा अध्याय। इतिहास रचने के लिए पर्याप्त था इतना समय। पर्दा न गिरता, तो कुछ नौटंकी और देख लेते देशवासी।
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फूल-मालाओं का चलन तो इतिहास सरीखा हो गया है। अब कुर्सियां और माइक चलने लगे हैं संसद और विधानसभाओं में। खटारा गाड़ी नंबर यूपीए टू 2014 की स्टेयरिंग संभाले मन मोहना की भ्रष्टाचार की पोटलियां ढोती लॉरी के ठप होते ही आंकड़े समेटने और अपडेट करने में दक्ष सखा अपना बही-खाता खोलकर बोले, सिक्सटी परसेंट से अधिक समय फालतू बर्बाद हुए पंद्रहवीं लोकसभा के। बहुत खराब रही इस गाड़ी की एवरेज। परचम वे भारत के निर्माण का लहरा रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि नौ दिन चले अढ़ाई कोस वाली कहावत ही चरितार्थ हुई।
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संसद के सत्र कभी किसी की सौम्यता से चल गए, तो कभी किसी की न्यायप्रियता आड़े आ गई। रहन-सहन नाम का रहा। ‘रहन’ में रही ठाठ-बाट, जिसमें कोई कम्प्रोमाइज नहीं। ‘सहन’-शीलता का स्टॉक न जाने कब से खाली पड़ा है। मित्र की पीड़ा सतह पर थी, लेकिन सतही इतनी कि संसदीय कामकाज का पर्याप्त समय फालतू चला गया। छींटाकशी पहले भी होती थी। पक्ष-विपक्ष कांव-कांव भी करते थे। मिर्च-मसालों के साथ आरोप-प्रत्यारोप भी चलता था। लेकिन अनूठा रहा पंद्रहवीं लोकसभा का प्रदर्शन। मिर्च आंख में झोंकी गई। आत्मसम्मान, सदाचरण, विचारधारा-सब फालतू हैं माननीयों के लिए।
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जो कुछ घट रहा है, एक पूर्व न्यायाधीश के मतानुसार, इसकी वजहों में कतार में खड़े होकर ‘मूर्खतापूर्ण’ योगदान देने वाले बंदे का भी है। बाहरी समर्थन दे रही है कवि की पंक्तियां- ऊंची बातें ऊंचा पद है/नैतिकता का छोटा कद है/चुन-चुन कर भेजी थी आंखें/अंधी की अंधी संसद है। सरकार को जो करना है करेगी। एक सांपनाथ, तो दूसरा नागनाथ। हमारी आपकी स्थिति काटो नाग जहां मन भावे सरीखी। नाहक दुखी हो रहे हैं आप। चिल्लाते रहिए फालतू। फालतूपन को मंडित करना या कुंठा पालना भी फालतू ही है।