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नई शिक्षा नीति और घुमंतू समुदाय

Sun, 20 Jun 2021 05:33 AM IST
अश्विनी शर्मा अश्वनी शर्मा
अश्वनी शर्मा Published by: अश्विनी शर्मा Updated Sun, 20 Jun 2021 05:33 AM IST
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New Education Policy and Nomadic Communities
छात्र-छात्राएं (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock

फ्रांसीसी क्रांति के पहले और क्रांति के दौरान पेरिस और लंदन की पृष्ठभूमि पर चार्ल्स डिकेंस ने एक उपन्यास लिखा था, ए टेल ऑफ टू सिटीज, जो बहुत चर्चित हुआ। इस उपन्यास में कही गई बात और विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने उस दौर में थे। डिकेंस इस उपन्यास के माध्यम से कहते हैं कि समय के अलग-अलग दौर होते हैं। हर दौर में समय के मायने भी बदल जाते हैं। कुछ लोगों के लिए यह प्रकाश का समय है, तो कुछ लोगों के लिए अंधेरे का समय है। कुछ के लिए आशा का झरना है, तो कुछ के लिए घोर निराशा की सर्दी। कुछ लोगों के लिए विश्वास का युग है, तो कुछ लोगों के लिए अविश्वास का युग।


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नई शिक्षा नीति, 2020 भी कुछ समुदाय के लिए आशा का झरना लेकर आई है, तो कुछ के लिए निराशा की सर्दी। मसलन, दरिया किनारे रहने वाले समुदाय, पशुचारक समाज, मजमे लगाने वाले लोग, फेरी लगाकर जीवन चलाने वाले समुदाय और घुमंतू समुदाय के लिए इस नीति में बहुत-सी कमियां हैं, जिनका समाधान किए बगैर इस नीति की सफलता संभव नहीं है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2020 के मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) में भारत को 189 देशों में 131 वां स्थान प्राप्त हुआ है। मानव विकास रिपोर्ट के मुताबिक, श्रीलंका और भूटान भी सूचकांक में भारत से बेहतर हैं।

हमारे संविधान में शिक्षा राज्य सूची का विषय है। इससे संबंधित नीति बनाने का अधिकार राज्य सरकार को है। केंद्र सरकार दिशा दिखा सकती है। उस पर चलना या ऊटपटांग तरीके से चलना राज्य सरकार पर निर्भर करता है। नई शिक्षा नीति में शिक्षा के साथ हुनर प्रशिक्षण की भी बात कही जा रही है। यह प्रावधान उन सभी समुदायों के लिए उपयोगी है, जो अपने हुनर से आजीविका पाते हैं। इस मायने में आदिवासी बच्चों के लिए तो पहले से ऐसे स्कूलों ओर आश्रमशालाओं की व्यवस्था की गई है, जहां उन्हें शिक्षा के साथ हुनर की ट्रेनिंग दी जाती है। अन्य समुदायों के लिए आजाद भारत में ऐसा पहली बार होगा।

जुलाई, 2020 में नई शिक्षा नीति आई थी। लगभग एक साल बीत गया है, किंतु धरातल पर ऐसा कुछ होता हुआ नजर नहीं आ रहा है, जहां हुनर सिखाया जा रहा हो। हालांकि इसका बड़ा कारण कोविड रहा है, लेकिन लॉकडाउन खुलने के बाद यह काम क्या पहले से थके हुए स्कूलों और जंग खाए शिक्षकों से संभव है? पहली बात यह कि इन समुदायों के जीवन व उनके ज्ञान के साथ खास बात जुड़ी है। इनका ज्ञान किताबों से नहीं आता, बल्कि समाज की जरूरत व जीवन प्रक्रिया से जुड़ा है। ये लोग निरंतर अभ्यास से ही उसे आत्मसात करते हैं। यदि ये समुदाय बचेंगे, तभी यह ज्ञान बचेगा। दूसरी बात उस ज्ञान के हस्तांतरण की प्रक्रिया से जुड़ी है। ये समुदाय अपने बच्चों को जन्म से ही अपने काम से, उसकी साधना से जोड़ देते हैं। गड़ेरियों का बच्चा पशुओं के रेवड़ में ही पैदा होता है। जोगी-सपेरा का बच्चा जन्म से ही सांप के साथ खेलता है। गड़िया लुहार का बच्चा लोहे का काम देखता हुआ बड़ा होता है। कहने का मतलब यह है कि इस ज्ञान की कोई निश्चित प्रक्रिया नहीं है। तीसरी अहम बात, इन समुदायों के बच्चे आठ-दस साल के होते-होते अपनी आजीविका अर्जित करना शुरू कर देते हैं। वे आजीविका के लिए पच्चीस-तीस साल तक पढ़ाई नहीं करते। नई शिक्षा नीति वहां तक कारगर है, जहां आठ-दस साल के बच्चों को हुनर से आजीविका मिल सके।

चौथी अहम बात यह है कि ये समुदाय सदियों से हमारी औपचारिक शिक्षण व्यवस्था से बाहर रहे हैं। उन्हें अनौपचारिक तरीके से ही शिक्षित किया जा सकता है। ऐसा कोई भी बगैर सोचे-समझे उठाया गया कदम हमारी नई शिक्षा नीति पर बट्टा लगाएगा, जिसका खामियाजा ये समुदाय तो भरेंगे ही, बाकी समुदायों को भी इसका नुकसान उठाना पड़ेगा। पांचवीं अहम बात यह कि हमारे यहां किसी भी राज्य सरकार के स्कूली पाठ्यक्रम में इन समुदायों के लिए बहुत ही नाममात्र का लिखा गया है। इनके बारे में हमारी सारी समझ महज पूर्वाग्रह, सुनी-सुनाई बात ओर दोयम दर्जे के शोध पर टिका है। ये सारी सोच इनको चोर उचक्के, नाचने-गाने वाले ओर तंबू-डेरे वाले मानती है। जबकि ये समाज को चलाने वाले लोग रहे हैं। राज्य सरकारों को अपने स्कूली पाठ्यक्रम में इनको उचित स्थान देना होगा, ताकि उनके जीवन व संस्कृति से लोग परिचित हो सकें और उनके प्रति सम्मान और सहज प्रेम का भाव पैदा हो सके।

छठा अहम बिंदु यह है कि हमारे यहां अर्थव्यवस्था में 93 फीसदी रोजगार अनौपचारिक क्षेत्र में है। औपचारिक क्षेत्र में तो केवल सात फीसदी रोजगार ही है और उसमें भी सरकारी सेवाएं तो बहुत सीमित हैं। यह स्थापित सत्य है कि हम सभी को सरकारी नौकरी नहीं दे सकते। यदि समय रहते वे अपने हुनर से रोजगार अर्जित कर सकें, तो इससे बेहतर क्या हो सकता है! नई शिक्षा नीति के साथ हमें नया पाठ्यक्रम, नई सोच और विशिष्ट योग्यता वाले शिक्षक चाहिए, जो इन सभी समुदायों को, उनके जीवन संघर्ष को, उनकी संस्कृति को समझ सके। उस पढ़ाई में रस होना चाहिए, जिससे बच्चे उसे अपना समझें। अन्यथा इस नीति की हालत भी सरकारी स्कूल जैसी होने में समय नहीं लगेगा।
 

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