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आर्थिक विकास को गति देने वाला नेतृत्व चाहिए

Thu, 10 Apr 2014 01:03 AM IST
जयंतीलाल भंडारी
जयंतीलाल भंडारी Updated Thu, 10 Apr 2014 01:03 AM IST
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Needs leadership which would accelerate economic growth

सोलहवीं लोकसभा के चुनाव के लिए तमाम राजनीतिक दलों ने अपने चुनावी घोषणापत्रों में कहा है कि अगर वे सत्ता में आए, तो आर्थिक विकास के विभिन्न क्षेत्रों के लिए प्राथमिकता से कार्य करेंगे। हाल ही में अमेरिका के अग्रणी मत सर्वेक्षक संगठन गैलप ने अपने सर्वेक्षण में कहा है कि भारत के लोकसभा चुनाव में विकास और अर्थव्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।

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सर्वेक्षण में करीब 35 फीसदी भारतीयों ने माना है कि अर्थव्यवस्था बदतर होती जा रही है। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में भी अधिकांश मतदाताओं ने महंगाई, भ्रष्टाचार, रोजगार और विकास जैसे चार अहम मुद्दे बताए हैं।
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महंगाई ने आम आदमी सहित मध्यवर्ग की भी कमर तोड़ दी है। बढ़ती महंगाई देश के सभी लोगों के जीवन स्तर के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों को भी प्रभावित कर रही है। उद्योग मंडल एसोचैम के सर्वेक्षण 2013 में कहा गया है कि पिछले तीन वर्षों के दौरान भोजन से जुड़ी हुई आवश्यक वस्तुओं की खपत में तकरीबन 40 फीसदी की भारी कमी देखने को मिली है। मौजूदा कीमत स्तर पर जहां गरीब परिवार खपत के स्तर को बरकरार नहीं रख पा रहे, वहीं मध्यवर्गीय परिवारों की खरीद क्षमता तेजी से घट रही है।
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चुनाव में भ्रष्टाचार भी प्रमुख चुनावी मुद्दा है। दुनिया के 177 देशों की भ्रष्टाचार से संबंधित ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल की नवीनतम सूची में भारत वर्ष 2013 में भी 94वें स्थान पर है। ब्रिक्स देशों में भारत सबसे ज्यादा भ्रष्ट देश साबित हुआ है। प्रमुख उद्योग संगठन सीआईआई ने कहा है कि केंद्र में एक स्वच्छ और भ्रष्टाचार मुक्त सरकार के द्वारा ही भारत को अधिक विकास और समृद्धि की राह पर ले जाया जा सकता है। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था का जो हाल हुआ है, उसमें भ्रष्टाचार एक प्रमुख कारण रहा है।

रोजगार भी एक चुनावी मुद्दा दिखाई दे रहा है। यह मुद्दा युवाओं के जीवन से जुड़ा हुआ है। देश में उद्योग-व्यवसाय में सुस्ती के कारण रोजगार के अवसर नहीं बढ़ रहे। सेवा क्षेत्र की रफ्तार भी मंद पड़ी हुई है। पिछले तीन-चार वर्षों में विकास दर घटने के कारण लोगों की बढ़ती हुई मुश्किलें भी एक प्रमुख आर्थिक मुद्दा है। वर्ष 2013-14 में विकास दर घटकर पांच फीसदी से भी कम रह गई है।

ऐसे में लोगों को ऐसे नेतृत्व की अपेक्षा है, जो विकास दर बढ़ाने का हौसला रखे, जो देश को आर्थिक मजबूती दे सके, बाजार की निराशाओं को आशा में बदल सके, तेजी से आर्थिक एवं कारोबार संबंधी नीतिगत फैसले ले सके और उन्हें कार्यान्वित कर सके। देश को ऐसी सरकार चाहिए, जो सब्सिडी या आर्थिक पुनर्वितरण की नीतियों को सही तरीके से लागू करने की दिशा में कदम बढ़ा सके, बुनियादी क्षेत्र में निवेश को प्राथमिकता दे सके और शेयर बाजार को नई गति दे सके।

बाजार ने यह उम्मीद बांध रखी है कि चुनाव के बाद केंद्र में स्थिर सरकार बनेगी। लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद उद्योग-व्यवसाय जगत की धारणा में सुधार हुआ है। सूचकांक में तेजी है, विदेशी निवेश आ रहा है और कोर सेक्टर का प्रदर्शन बेहतर हुआ है।


लेकिन यदि कोई अस्थिर सरकार सत्ता में आती है, तो शेयर बाजार के साथ साथ बॉन्ड व विदेशी मुद्रा बाजार में भी कुछ निराशाएं दिख सकती हैं। आम मतदाता को भले आर्थिक मुद्दों की जटिलता की बहुत समझ न हो, पर महंगाई, भ्रष्टाचार, रोजगार और विकास के मुद्दों से विगत दिसंबर में हुए चार राज्यों के चुनाव में भी मतदाता सबसे अधिक प्रभावित हुए थे।

साफ है कि आर्थिक मुद्दों पर जो दल और उम्मीदवार अपनी जितनी उपयोगिता सिद्ध करेगा, वह लोकसभा चुनाव में विजय होने की उतनी ही संभावनाएं रखेगा।

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