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समुद्र को भी समझने की जरूरत है

Tue, 17 Jun 2014 07:56 PM IST
मुकुल श्रीवास्तव
मुकुल श्रीवास्तव Updated Tue, 17 Jun 2014 07:56 PM IST
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Need to understand sea

पर्यावरण के प्रमुख मुद्दों में कूड़ा प्रबंधन भी है, पर यह कूड़ा धरती के लिए ही नहीं, बल्कि समुद्रों के लिए भी बड़ा खतरा बनता जा रहा है। आमतौर पर यह धारणा है कि समुद्र बहुत विशाल है, जिसमें कुछ भी डाल दिया जाए, पर्यावरण पर इसका फर्क नहीं पड़ेगा, पर वास्तविकता इसके उलट है।

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पृथ्वी पर उपलब्ध कुल जल का लगभग सत्तानबे प्रतिशत समुद्र में है। समुद्र हमारी धरती के लगभग इकहत्तर प्रतिशत हिस्से पर है। समुद्र की उपस्थिति पर धरती का अस्तित्व निर्भर करता है। परंतु विगत कुछ वर्षों से धरती पर मौजूद अन्य जलाशयों की भांति मनुष्यों ने समुद्र को भी अपने अविवेकपूर्ण आचरण का शिकार बनाना शुरू कर दिया है। अधिक चिंताजनक विषय यह है कि इस ओर हमारे पर्यावरणविदों का ध्यान न के बराबर है। हाल ही में दुर्घटना का शिकार हुए मलयेशिया के विमान का मलबा ढूंढते समय जिस मात्रा में अत्यधिक प्रदूषक कूड़ा निकला है, उसने संपूर्ण विश्व का ध्यान समुद्री प्रदूषण की विकराल होती समस्या की ओर आकर्षित किया है। बढ़ती जनसंख्या और भूमिगत संसाधनों पर निरंतर बढ़ते जा रहे दबाव से यह तो तय है कि आने वाले वक्त में हमें अपनी भूख और प्यास मिटाने के लिए समुद्र की ही शरण में जाना पड़ेगा, इसलिए यह आवश्यक है कि हम समुद्र का संरक्षण करें।
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समुद्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है- प्लास्टिक। बदलती जीवन शैली, 'प्रयोग करो और फेंको' की मनोवृति और सस्ती प्लास्टिक की उपलब्धता ने प्लास्टिक का उत्पादन और कचरा, दोनों ही बढ़ाया है। प्लास्टिक कचरे के निस्तारण की पर्याप्त व्यवस्था अभी सभी देशों में नहीं है। पर्यावरण संस्था ग्रीन पीस के आकलन के मुताबिक, हर साल लगभग अट्ठाईस करोड़ टन प्लास्टिक का उत्पादन होता है, जिसका बीस प्रतिशत हिस्सा समुद्र में चला जाता है। इसकी वजह से न केवल समुद्री जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है, बल्कि पूरे समुद्री पारितंत्र के भी बिखरने का खतरा उत्पन्न हो गया है।
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विश्व में प्रति वर्ष लगभग 14,000 करोड़ पाउंड कूड़ा-कचरा समुद्र में फेंका जाता है। जापान में 2011 में आए सूनामी ने प्रशांत महासागर में कूड़े का सत्तर किलोमीटर लंबा एक टापू बना दिया। यह तो केवल एक उदाहरण भर है। विश्व भर में समुद्री कूड़े से बने ऐसे अनेकों टापू हैं, और यदि समुद्र में कूड़ा डालने की हमारी आज की गति बरकरार रही, तो वह दिन दूर नहीं, जब समुद्र में हर तरफ सिर्फ कूड़े के टापू ही नजर आएंगे।


हालांकि विश्व के कई देशों में इस समस्या का हल ढूंढने की कोशिशें शुरू हो गईं हैं। भारत में भी वर्ष 2000 में ठोस कचरे के निस्तारण को लेकर एक नीति बनाई गई थी, पर वह आज भी कागजों पर ही है। सीवेज का भी लगभग 70 प्रतिशत कचरा बिना निस्तारण के नदियों में डाल दिया जाता है, जो अंततः समुद्र तक पहुंचता है। चूंकि समुद्र की विशालता के कारण समूचे समुद्र की सफाई संभव नहीं है। इसलिए इससे बचने का एकमात्र रास्ता जागरूकता और बेहतर प्लास्टिक कूड़ा प्रबंधन है। इस दिशा में ठोस पहल की आवश्यकता है।

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