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अंत्योदय को बचाने की जरूरत है

Sun, 21 Jun 2015 06:17 PM IST
ज्यां द्रेज
ज्यां द्रेज Updated Sun, 21 Jun 2015 06:17 PM IST
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Need to save Antyodaya

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार गरीब-विरोधी होने की धारणा से भले लड़ने का दावा कर रही हो, पर अंत्योदय अन्न योजना को लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली से चरणबद्ध तरीके से बाहर निकालने का फैसला कर उसने गरीबों को बड़ा झटका दिया है। यह कदम अन्यायपूर्ण है और अवैध भी।

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अंत्योदय योजना के तहत गांवों के अत्यधिक गरीब परिवारों को 35 किलो खाद्यान्न नाममात्र की कीमतों (चावल तीन रुपये और गेहूं दो रुपये प्रति किलो) पर दिए जाते हैं। हाशिये पर मौजूद कुछ वर्गों, जैसे विपन्न आदिवासी समूह, को सर्वोच्च न्यायालय के भोजन के अधिकार संबंधी आदेश के तहत अंत्योदय कार्ड मिला हुआ है। इस योजना से दो करोड़ परिवार लाभान्वित हैं। अनेक विधवाओं, बुजुर्गों और कमजोर वर्गों के लिए यह जीवन रेखा की तरह है।
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राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून (एनएफएसए) अंत्योदय योजना को जारी रखने की वकालत तो करता है, पर यह केंद्र को इसका दायरा तय करने का अधिकार भी देता है। इसका लाभ उठाते हुए यह प्रावधान किया गया कि किसी लाभार्थी के राज्य से बाहर जाने पर, उसकी स्थिति बेहतर होने पर, अथवा मृत्यु होने पर वह अंत्योदय योजना का हिस्सा नहीं रहता, तो किसी नए परिवार को इस योजना से जोड़ा नहीं जाएगा।
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एक प्रशासक की नजर से यह उचित कदम जान पड़ता है कि सभी सार्वजनिक जन वितरण प्रणाली कार्डधारक को एक ही वर्ग में शामिल किया जाए, और सभी को प्रति माह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत पांच किलो रियायती खाद्यान्न दिए जाएं। यह सुविधाजनक नजरिया अच्छा चाहे जितना भी लगता हो, पर यह वास्तविक प्राथमिकता और खाद्य सुरक्षा कानून के तहत बनाई गई श्रेणियों के फर्क को नजरंदाज करता है। दरअसल, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत ' प्रति परिवार अधिकार' को 'प्रति व्यक्ति अधिकार' में बदला गया है। इस कानून से पहले अधिकतर राज्यों में परिवार के आधार पर 25 या 35 किलो अनाज का वितरण किया जाता था। मगर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून में इसे प्रति व्यक्ति के आधार पर परिभाषित किया गया। यानी प्राथमिकता वाले परिवारों में प्रति व्यक्ति पांच किलो खाद्यान्न। यह अधिक न्यायसंगत दृष्टिकोण है, पर प्रति परिवार प्रावधान को प्रति व्यक्ति में बदलने से छोटे परिवारों को ज्यादा नुकसान है, खासकर विधवाओं या उन बुर्जुगों के लिए, जो अकेले या सिर्फ अपने जीवन साथी के साथ रहते हैं। अंत्योदय योजना का अर्थ है, अत्यंत गरीब को विशेष सहायता देना। जन वितरण प्रणाली के तहत उन्हें दाल व खाद्य तेल मुहैया कराना। लिहाजा इस योजना को चरणबद्ध तरीके से खत्म करना सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन होगा।

यह खासकर उस झारखंड में तो और गंभीर मुद्दा है, जहां आगामी एक जुलाई से खाद्य सुरक्षा कानून की शुरुआत की जा रही है। गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों (बीपीएल परिवार) को अभी एक रुपये प्रति किलो की दर से 35 किलो चावल देने का प्रावधान है। जिस बीपीएल परिवार के सदस्यों की संख्या सात से कम है, उन्हें राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत घाटा उठाना पड़ेगा। उनके नुकसान को पाटने का एक तरीका यह होगा कि प्रति व्यक्ति पांच किलो के बदले सात किलो अनाज दिए जाएं, जैसा कि छत्तीसगढ़ में किया गया है। हालांकि झारखंड की सरकार ने इस दिशा में सकारात्मक रवैया नहीं दिखाया है। दूसरा तरीका यह हो सकता है कि अंत्योदय श्रेणी का विस्तार किया जाए, ताकि कम से कम बीपीएल श्रेणी के परिवारों में होने वाली कटौती पूरी की जा सके। हालांकि इस विकल्प को जन वितरण प्रणाली आदेश से बाहर कर दिया गया है।

इस तरह से देखें, तो केंद्र सरकार का अगला कदम राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (एनएसएपी) में कटौती करना होगा। इसके तहत विधवाओं, बुजुर्गों और अशक्त व्यक्तियों को एक छोटी रकम मासिक पेंशन के रूप में देने का प्रावधान है। इस कार्यक्रम का हालिया मूल्यांकन काफी सकारात्मक रहा है। बावजूद इसके केंद्र सरकार एनएसएपी में कटौती करने के पक्ष में है। अव्वल तो, वृद्धावस्था पेंशन में केंद्रीय योगदान वर्ष 2006 से 200 रुपये मासिक पर रुका हुआ है। तिस पर इस बार बजट में एनएसएपी के आवंटन में कटौती भी की गई है, जिससे इस तुच्छ राशि को बरकरार रखना भी मुश्किल हो गया है।


बहरहाल, पहले से चल रही प्रभावी गैर-अंशदायी पेंशन योजनाओं को मजबूत बनाने के बजाय केंद्र सरकार ने नई प्रधानमंत्री अटल पेंशन योजना शुरू की है। यह अंशदायी और काफी हद तक स्वयं वित्तपोषित होने के कारण पूर्व की योजना से अलग है। इस योजना के प्रावधान खासकर उन लोगों को लुभा सकते हैं, जो मध्यम आय वर्ग के हैं। मगर यह उन लोगों के लिए ज्यादा काम की नहीं है, जो अर्थव्यवस्था में हाशिये पर हैं। हालांकि यह केंद्र सरकार के लिए एक अच्छा सौदा जरूर है कि बिना किसी जिम्मेदारी के उसे अगले 20 वर्षों तक पेंशन अंशदान मिलता रहेगा। इसे विडंबना नहीं, तो और क्या कहेंगे, कि इस पेंशन योजना की शुरुआत उन अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर की जा रही है, जिन्होंने 15 वर्ष पूर्व अंत्योदय अन्न योजना शुरू की थी।

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