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लोकतंत्र के मुंह पर ताला
नागार्जुन
Updated Sat, 10 May 2014 08:51 PM IST
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लोकतंत्र के मुंह पर ताला
द्वारे पर मकड़ी का जाला
बैठ गया है अफसर आला
पगलों से पड़ना था पाला
कहीं दाल है पानी-पानी
कहीं दाल में काला-काला
लोकतंत्र के मुंह पर ताला
कहीं दलाली कहीं घुटाला
मनके बिखरे टूटी माला
जपते थे जनतंत्री माला
नाना जी ने संकट पाला
उल्लू तक वरदान पा गए
तकरीरों का खुला पनाला
कहीं दलाली कहीं घुटाला
शरम नहीं है, लाज नहीं है
काम नहीं है, काज नहीं है
रॉयल्टी है राज नहीं है
पुरखों की आवाज नहीं है
गूंज भर गई है खोखल में
फिर भी आता बाज नहीं है
शरम नहीं है, लाज नहीं है।
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द्वारे पर मकड़ी का जाला
बैठ गया है अफसर आला
पगलों से पड़ना था पाला
कहीं दाल है पानी-पानी
कहीं दाल में काला-काला
लोकतंत्र के मुंह पर ताला
कहीं दलाली कहीं घुटाला
मनके बिखरे टूटी माला
जपते थे जनतंत्री माला
नाना जी ने संकट पाला
उल्लू तक वरदान पा गए
तकरीरों का खुला पनाला
कहीं दलाली कहीं घुटाला
शरम नहीं है, लाज नहीं है
काम नहीं है, काज नहीं है
रॉयल्टी है राज नहीं है
पुरखों की आवाज नहीं है
गूंज भर गई है खोखल में
फिर भी आता बाज नहीं है
शरम नहीं है, लाज नहीं है।