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आपसी विवाद : बच्चों के साझा संरक्षण के लिए

Thu, 06 Jan 2022 07:38 AM IST
Ritu Saraswat ऋतु सारस्वत
Updated Thu, 06 Jan 2022 07:38 AM IST
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सार
1997 में डेबोरा और लेस्ली वार्कलेन ने अपनी किताब कंस्ट्रक्टिंग फादरहुड में पिताओं की भूमिकाओं को संकीर्णता के दायरे में बांधने को लेकर तमाम मिथकों की चर्चा की, परंतु 2014 में प्रकाशित डू फादर्स मैटर : व्हाट साइंस इज टेलिंग अस अबाउट पैरेंट्स वी हैव ओवरलुक्ड में पाल रायबर्न ने उन तमाम बिंदुओं पर वैज्ञानिक शोध के बाद प्रकाश डाला, जिसके बारे में किसी ने भी गंभीरता से विचार नहीं किया था।
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Mutual Disputes: For the shared protection of children
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock

विस्तार

दंपति के आपसी विवाद और अलग होने से बच्चों का बचपन न पिसे, बच्चों को मां और पिता दोनों का प्यार मिले, इसके लिए साझा पालन-पोषण की व्यवस्था को अमल में लाने को लेकर हाल ही में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से जवाब-तलब किया है। पंजाब के गुरदासपुर से जुड़े एक मामले में न्यायालय ने पिता को बेटी से मिलने के लिए हर शुक्रवार का समय देने का आदेश दिया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए चंडीगढ़ स्थित उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की गई थी और इसकी सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने केंद्र से जवाब मांगा।



बच्चों की परवरिश का प्रश्न देश भर की न्यायालयों के लिए चुनौती बनता जा रहा है, क्योंकि हजारों की तादाद में घरेलू विवाद के मामले देश की विभिन्न अदालतों में लंबित हैं। भारत का कानून तलाकशुदा दंपति में से किसी भी एक को बच्चों को अपने साथ रखने की इजाजत दे सकता है, परंतु पन्नों में लिखी गई ये धाराएं वास्तविकता के धरातल पर यथार्थ रूप कम ही ग्रहण कर पाती हैं। वर्ष 2012 में ठाणे पारिवारिक न्यायालय (मुंबई) में सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार, उस समय विशेष में दायर 83 बच्चों के संरक्षण की याचिका में केवल दो ही पिताओं को बच्चों का संरक्षण मिला। 


कारण स्पष्ट है, न्यायालय के समक्ष भी मां की भावनाओं को इतने विराट रूप में प्रस्तुत किया जाता है कि पिता का संपूर्ण अस्तित्व ही गौण हो जाता है। भारतीय न्यायिक व्यवस्था माताओं को संरक्षण देने की अवस्था में पिताओं को अपने बच्चों से मिलने, बात करने और समय बिताने के लिए निश्चित समयावधि का अधिकार देती हैं, पर क्या वाकई ऐसा हो पाता है? जो रिश्ते कड़वाहट से भरे अलग होने को आतुर हों, वह कैसे सहजता से उन भावनाओं को संबल देंगे, जिससे किसी दूसरे पक्ष को सुकून और खुशी मिल सके।

दुखद परंतु वास्तविक स्थिति यही है कि अलगाव की स्थिति में पिताओं के लिए अपने बच्चों से मिल पाना किसी चुनौती से कम नहीं होता। कोई भी कानून तभी तक समाज के लिए लाभप्रद होता है, जब तक कि वह परिस्थिति के अनुकूल हो। समाज एक परिवर्तनशील अवधारणा है, इसलिए कानून का उसी अनुरूप बदलाव अपेक्षित है। मूल समस्या यह है कि अभी तक बच्चों के विकास पर जितने भी शोध हुए हैं, वे सभी मां की भूमिका तक केंद्रित थे। 

1997 में डेबोरा और लेस्ली वार्कलेन ने अपनी किताब कंस्ट्रक्टिंग फादरहुड में पिताओं की भूमिकाओं को संकीर्णता के दायरे में बांधने को लेकर तमाम मिथकों की चर्चा की, परंतु 2014 में प्रकाशित डू फादर्स मैटर : व्हाट साइंस इज टेलिंग अस अबाउट पैरेंट्स वी हैव ओवरलुक्ड में पाल रायबर्न ने उन तमाम बिंदुओं पर वैज्ञानिक शोध के बाद प्रकाश डाला, जिसके बारे में किसी ने भी गंभीरता से विचार नहीं किया था। रायबर्न ने अपनी किताब में चर्चा की कि द्वितीय विश्व युद्ध में वे बच्चे, जिनके पिता युद्ध में उनकी बाल्यावस्था में ही चले गए थे, उन बच्चों को वयस्क होने पर सामाजिक संबंधों को बनाने में खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ा।

इस्राइल की शोधकर्ता रूथ फील्डमेन का शोध बताता है कि बच्चे की देखभाल के समय जिस तरह के हार्मोनल बदलाव मां में होते हैं, वैसे ही बदलाव पिता में भी होते हैं। जब पिता का दिमाग यह स्वीकार कर लेता है कि बच्चा संभालने का दायित्व उस पर है, तो बच्चे के साथ उसका भी लगाव मां जैसा ही हो जाता है। ये वे अध्ययन हैं, जिनके संबंध में भारत में चर्चा तक नहीं हुई है। अब समय आ गया है कि इस विषय पर गंभीरता से चर्चा की जाए। 

हमें इस सत्य को स्वीकार करना ही होगा कि न तो अदालतें और न ही पारिवारिक विवादों को सुलझाने वाले मध्यस्थ इतने सक्षम हैं कि वे बच्चे के मनोविज्ञान को समझ सकें। ऐसे में साझा परवरिश ही एक ऐसा विकल्प हो सकता है, जिसमें बच्चों को माता-पिता, दोनों का प्यार मिल सके। आवश्यक हो गया है कि उस कानून को अमलीजामा पहनाया जाए, जिसकी सिफारिश भारत के विधि आयोग ने अपनी 257वीं रिपोर्ट में ‘संरक्षक और प्रतिपाल्य’ (गार्डियन ऐंड वार्डस ऐक्ट, 1890) में सुधार करने हेतु ‘जॉइंट कस्टडी’ के प्रावधान को जोड़ने के संबंध में की थी।

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