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परिक्रमा की मंशा और प्रतिबंध की राजनीति

Tue, 24 Sep 2013 08:17 PM IST
शीतला सिंह
शीतला सिंह Updated Tue, 24 Sep 2013 08:17 PM IST
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motives of parikrama and politics of restrictions

उत्तर प्रदेश सरकार ने अब विश्व हिंदू परिषद की 13 अक्तूबर तक यानी दुर्गापूजा के मौके पर नित्य पंचकोसी परिक्रमा के घोषित कार्यक्रम पर भी रोक लगा दी है। केवल साधु-संतों और बिना किसी लाव-लश्कर, झंडा-बैनर, गाजा-बाजा और हथियारों के जो लोग परिक्रमा करना चाहेंगे, उन्हें इससे मुक्त रखा गया है।

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इससे पहले विहिप की चौरासी कोसी परिक्रमा का कार्यक्रम सरकारी सक्रियता और लोगों के रुचि न लेने के कारण विफल हो गया था। विहिप ने यह आयोजन अयोध्या में राम मंदिर स्थापना आंदोलन को पुनः आरंभ करने की नीयत से किया है। जबकि राज्य सरकार का कहना है कि चूंकि यह मामला शीर्ष न्यायालय में विचाराधीन है, ऐसे में इस तरह का कार्यक्रम विवाद को नए सिरे से खड़ा करने और क्षेत्र में सांप्रदायिक उत्तेजना फैलाकर इसका राजनीतिक लाभ उठाने का प्रयत्न है।
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लोग भूले नहीं होंगे कि विहिप और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 28 नवंबर, 1990 को अयोध्या मार्च की देश भर में कैसी तैयारी की थी। लेकिन तब सरकार ने अयोध्या में बाहरी लोगों का प्रवेश रोकने के लिए जगह-जगह बैरीकेडिंग कर बड़े पैमाने पर पुलिस और सुरक्षा बलों की तैनाती की थी।
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उसके पहले मुलायम सिंह ने फैजाबाद हवाई अड्डे पर सभा की थी। तब उन्होंने परंपरागत परिक्रमा मेले में भी, जो अक्षय नवमी के दिन होता है, लोगों से भाग न लेने की याचना करते हुए उस पर भी प्रतिबंध लगा दिया था। उससे बहुसंख्यक समुदाय में संदेश गया था कि यह सरकार उनके पारंपरिक धार्मिक आयोजनों की भी विरोधी बन गई है।

तब लोग उच्च न्यायालय के पास यह सवाल लेकर पहुंचे थे कि क्या कानून-व्यवस्था के नाम पर धार्मिक आयोजनों पर प्रतिबंध लगाना उचित है। अदालत ने भी यही निर्देश दिया था कि परंपरागत धार्मिक आयोजन में भाग लेने से किसी को न रोका जाए।

लेकिन उससे निपटने के लिए अयोध्या को सुरक्षा बलों द्वारा घेर दिया गया था, जगह-जगह प्रतिबंधात्मक व्यवस्थाएं थीं तथा इन्हें तोड़ने वालों के लिए देहात में अस्थायी जेल बनाए गए थे। उसके बावजूद करीब 28,000 लोग अयोध्या पहुंचे थे। उस प्रतिबंध का लाभ तब विहिप से जुड़ी भारतीय जनता पार्टी को मिला था। 1991 में उसे पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा में बहुमत मिला था। लेकिन बदली हुई परिस्थितियों में राम मंदिर मुद्दा और भाजपा से लोगों का मोहभंग हो चुका है।

इसके बावजूद नित्य परिक्रमा पर प्रतिबंध का सरकार का फैसला व्याख्या तो मांगता है। क्या विहिप की नित्य परिक्रमा कार्यक्रम को संविधान में दी हुई धार्मिक स्वतंत्रता और पूजा-अर्चना की छूट माना जाए या इसके खिलाफ प्रतिबंधात्मक कदम जायज हैं?

इस दृष्टि से तो उत्तर प्रदेश सरकार के प्रतिबंध का फैसला अनुचित ही लगता है, क्योंकि राज्य सरकार को लोक व्यवस्था बनाए रखने के लिए कदम उठाने की तो छूट है, लेकिन कोई परिक्रमा कब करे या न करे, यह उसके दायित्व में नहीं आता। इसी प्रकार शांतिपूर्ण निरायुध सम्मेलन, भारत के राज्य क्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण और किसी भाग में आने-जाने, बसने या निवास करने का अधिकार भी देश के नागरिकों के मूल अधिकारों में है। इस मूल अधिकार को राजनीति की भेंट नहीं चढ़ाया जा सकता।

यह भी सही है कि नित्य परिक्रमा की घोषणा विहिप के अधिकार क्षेत्र में नहीं है। साफ है कि चुनाव से पहले धार्मिक तनाव फैलाना ही इसका उद्देश्य है, जिसके लिए खास तौर से धार्मिक आवरण में इसे पेश करके देश भर से अपने समर्थकों को बुलाने का प्रयत्न हो रहा है। यानी परिक्रमा से लाभ उठाने की इच्छा रखने वाला समुदाय इस क्षेत्र में उत्तेजना पैदा करने के लिए उतावला है।


ऐसे में, प्रशासन ने वैसे लोगों की आवाजाही पर प्रतिबंध लगाकर गलत नहीं किया है, जो कानून-व्यवस्था की रक्षा पर प्रतिकूल असर डाल सकते हैं, लेकिन अच्छा होता कि इसमें विहिप की घोषणा का कहीं जिक्र ही न होता। जहां तक नित्य परिक्रमा का संबंध है, यदि उसे तारीखों में बांधा जाएगा, तो निश्चित रूप से असलियत सामने आ ही जाएगी कि परंपरागत आयोजनों से भिन्न इस कार्यक्रम की आवश्यकता आखिर क्यों पड़ी।

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