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ताकतवर मोदी की अमेरिका यात्रा
एलन बेरी
Updated Sat, 27 Sep 2014 07:35 PM IST
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नरेंद्र मोदी जैसे ही भारत के प्रधानमंत्री बने, उनके दफ्तर के रहस्यपूर्ण फोन कॉलों के बारे में सरगोशियां फैलने लगीं, अवसर के अनुकूल कपड़े न पहनने और उद्योगपतियों के साथ बिंदास अंदाज में बैठक करने पर पड़ने वाली डांट ने अधिकारियों को हैरत में डाल दिया। मोदी का संदेश सुना गया। अपने सामान्य रहन-सहन के लिए ख्यात मोदी का उद्देश्य सरकारी कामकाज में अनुशासन लाना था।
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अमेरिका इस सप्ताह मोदी के रंग-ढंग के बारे में जान सकेगा। चौंसठ वर्षीय मोदी का न्यूयॉर्क और वाशिंगटन का पांच दिनों का दौरा बेहद तनाव भरा है, और इस यात्रा के दौरान हिंदुओं का धार्मिक त्योहार नवरात्र पड़ने के कारण वह उपवास पर हैं। इस दौरान वह सिर्फ चाय और शहद के साथ लेमोनेड ले रहे हैं।
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नरेंद्र मोदी के लिए यह अमेरिकी दौरा एक बहुत बड़ा अवसर है, जो खुद को भारत को बदल देने के रूपक के तौर पर देखते हैं-वह महत्वाकांक्षी, आत्मविश्वास से लबरेज और किसी भी किस्म की सुस्ती पर धैर्य खो देने वाले व्यक्ति हैं। दुनिया का और कोई राजनेता शायद ही इस तरह फर्श से अर्श तक पहुंचा हो-करीब एक दशक पहले गुजरात दंगों पर उनके तौर-तरीके से क्षुब्ध अमेरिका ने उन्हें वीजा देने से मना कर दिया था, उन्हीं मोदी को एक बेहद लोकप्रिय नेता और अमेरिका के जरूरी रणनीतिक साझेदार के तौर पर न्यूयॉर्क के लिए उड़ान भरते देखा गया। उसी सहजता से चीन जैसी उभरती ताकत का भी पिछले दिनों उन्होंने सामना किया।
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इन चार महीनों में मोदी ने उन लोगों को निराश कर दिया है, जो उनमें मार्गरेट थैचर की छवि देखने की उम्मीद पाले हुए थे। इसके बजाय उन्होंने मंत्रियों के अधिकारों में कटौती कर और उन्हें अपने कामकाज के प्रति केंद्रित कर देश को बदल देने की ठानी है। मोदी सुशासन की एक मशीन तैयार कर रहे हैं, जिसे वह लंबे समय तक चलाने की इच्छा रखते हैं।
जैसी सफलता वह चाहते हैं, इसके लिए उन्हें भारतीय अर्थव्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करने की जरूरत पड़ेगी। उनके कामकाज को देखने वाले आश्चर्य करते हैं कि नीतियों के क्रियान्वयन में क्या वह बाहरी लोगों पर भरोसा करेंगे। जबकि आलोचकों का कहना है कि वह शक्तियों को केंद्रीकरण जिस तरह कर रहे हैं, उसमें अपने अधिकारियों का उनसे सवाल करना मुश्किल हो जाएगा।
एम जे अकबर, जो भाजपा प्रवक्ता भी हैं, इन चिंताओं को खारिज करते हैं। उनका कहना है कि मोदी द्वारा उठाए गए शुरुआती कदम उनकी अपनी सरकार के लिए नियम-कानून तय करने और नौकरशाही के उस लचर तौर-तरीके को बदलने की दिशा में थे, जिसमें कैबिनेट की बैठक के दौरान ही अधिकारी उस बैठक से संबंधित मुद्दे पर ट्वीट या एसएमएस कर देते थे। अकबर कहते हैं, 'वह सख्त आदमी हैं और दिल्ली ने लंबे समय से ऐसा सख्त आदमी नहीं देखा है।'
हाल ही में सीएनएन को दिए एक इंटरव्यू में मोदी ने स्पष्ट किया कि उनका लक्ष्य देश की ऐतिहासिक छवि को पुनः प्रतिष्ठित करना है। उन्होंने कहा, 'भारत को कभी सोने की चिड़िया कहा जाता था। जिस ऊंचाई पर हम थे, वहां से गिर गए हैं। लेकिन अब हमारे सामने ऊपर उठने का मौका है।'
मोदी की सख्ती दिल्ली के सत्ता गलियारों में साफ-साफ महसूस की जा रही है। शुरुआती महीनों में हर सप्ताह ये अफवाहें सामने आती थीं कि मोदी और उनकी टीम की अधिकारियों पर नजर है। एक शुक्रवार को प्रधानमंत्री कार्यालय से एक मंत्री के पास फोन गया कि उनके डेस्क पर बिना मंजूरी की इतनी फाइलें रखी हुई हैं। पीएमओ को पता था कि उस मंत्री ने ठीक कितनी फाइलों पर दस्तखत नहीं किए हैं। उस फोन ने मंत्री को इतना परेशान कर दिया कि वह सप्ताहांत तक उन फाइलों पर काम करते रहे और उन सबको निपटाया। पार्टी के अधिकारी इन घटनाओं पर कोई टिप्पणी नहीं करते, लेकिन वे यह जरूर कहते हैं कि अधिकारियों पर नजर रखी जा रही है।
मोदी ने प्रधानमंत्री कार्यालय को सरकार के सबसे ताकतवर केंद्र के रूप में तब्दील कर दिया है। पहले बिना अनुमति के कैबिनेट मंत्रियों को मीडिया से बातचीत करने के प्रति हतोत्साहित किया गया।बगैर मंजूरी के मंत्रियों को अपनी निजी स्टाफ नहीं रखने दिया गया। और अपने पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों के विपरीत अनेक नियुक्तियां वह खुद करते हैं। नाम न बताने की शर्त पर कुछ अधिकारियों ने द हिंदुस्तान टाइम्स में शिकायत की कि कैबिनेट की बैठक शुरू होने से कुछ घंटे पहले सरकार बैठक का एजेंडा जारी कर रही है, जिससे नीति निर्माण में उनकी हिस्सेदारी लगभग असंभव हो चली है।
पत्रकार और शिव नडार यूनिवर्सिटी में वरिष्ठ फेलो सिद्धार्थ वरदराजन कहते हैं, 'इंदिरा गांधी के समय में भी उनके कुछ सलाहकार बहुत ताकतवर थे।...मौजूदा प्रधानमंत्री की ताकत इंदिरा गांधी की याद दिलाती है, लेकिन मुझे लगता है कि इस मामले में वह इंदिरा गांधी से भी अधिक शक्तिशाली हैं, क्योंकि इनके पास सलाहकारों की उतनी संख्या नहीं है।'
पत्रकारों के पास अब शीर्ष अधिकारियों से सवाल पूछने की कोई गुंजाइश ही नहीं रह गई है। जैसा कि एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने विगत मंगलवार को प्रकाशित एक चिट्ठी में शिकायत की है, कि नौकरशाही के एक बड़े हिस्से ने चुप्पी साध ली है, और पत्रकार प्रधानमंत्री कार्यालय से सामान्य सूचना पाप्त करने के लिए जूझ रहे हैं, क्योंकि पीएमओ ने अभी तक मीडिया से संपर्क करने वाले व्यक्ति की नियुक्ति ही नहीं की है।
भारत के उद्योग घरानों के सामने भी इसी तरह की मुश्किलें हैं। लंबे समय से वे मंत्रालयों में बैठने वाले अधिकारियों के साथ व्यक्तिगत और अनौपचारिक मुलाकात के अभ्यस्त हैं। लेकिन अब उन्हें नए प्रोटोकॉल का सामना करना पड़ रहा है-अधिकारियों के साथ उनकी बैठकें औपचारिक होंगी, सरकारी दफ्तरों में होंगी, और मानना चाहिए कि वे प्रधानमंत्री की निगरानी तंत्र के अंदर होंगी।
इसने उद्योगों को भी परेशान कर दिया है। एक बड़ी भारतीय कंपनी के अधिकारी ने गोपनीयता की शर्त पर प्रतिक्रिया दी, 'क्या उद्योगों से चौकन्ना रहने के उद्देश्य से ही मोदी ने इस तरह के फैसले किए हैं? अगर ऐसा संदेश जाता है, तो वह भी बहुत खतरनाक है, क्योंकि इससे आप यह बताना चाह रहे हैं कि उद्योग ही भ्रष्टाचार की वजह हैं।'
दूसरी ओर, मोदी के समर्थकों का कहना है कि अधिकारों के केंद्रीकरण का नतीजा दिखने लगा है। मसलन, मंत्रीगण अनुशासित हैं। लंबित परियोजनाओं ने गति पकड़ी है। भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार के चिह्न दिखने लगे हैं। लगातार दो साल तक विकास दर पांच फीसदी से कम रहने के बाद मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही में आर्थिक विकास दर 5.7 फीसदी रही है।
इसके बावजूद मोदी के पास फैसले लेने का समय सीमित है। अनेक महत्वपूर्ण पद खाली पड़े हैं। इसके अलावा बाहरी विशेषज्ञों का चुनाव भी आसान नहीं है। पर भाजपा से जुड़े एक विशेषज्ञ की टिप्पणी है-मोदी बाहरी व्यक्ति के सुझाव पर सौ फीसदी भरोसा करते भी नहीं।