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आत्ममुग्धता से निकलें मोदी

Sat, 07 Feb 2015 12:23 AM IST
एम के वेणु
एम के वेणु Updated Sat, 07 Feb 2015 12:23 AM IST
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modi must come out of self infatuation.

दिल्ली विधानसभा चुनाव का नतीजा चाहे जो भी आए, लेकिन इस चुनाव के दौरान साफ तौर पर महसूस की गई एक राजनीतिक अंतर्धारा की वजह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को परेशानी हो सकती है। दिल्ली में 40 फीसदी मतदाता बिहार और उत्तर प्रदेश के प्रवासी हैं। इनमें से ज्यादातर दलित एवं पिछड़ी जातियों के हैं, जो स्वरोजगार में लगे हैं। निजी बातचीत में कुछ भाजपा नेता भी स्वीकार करते हैं कि इस वर्ग के ज्यादातर लोग अरविंद केजरीवाल के साथ हैं। यह मोदी के लिए चिंता की बात होनी चाहिए, क्योंकि लोकसभा चुनाव में उन्हें भारी विजय इसी कारण मिली कि उन्होंने इस वर्ग के लोगों की अधूरी आकांक्षाओं को पूरा करने का वायदा किया था। ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश और बिहार में इन्हीं लोगों के वोट के कारण भाजपा को काफी सीटें मिलीं।

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भाजपा की तरफ इस नए वोट बैंक के झुकाव से मोदी इतने वाकिफ थे, कि प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने अक्सर अपने भाषणों में लोहिया के समाजवाद का स्मरण किया। उन्होंने लोहिया के नाम का जिक्र कुछ हद तक इस तथ्य के प्रति कृतज्ञता के रूप में किया कि अन्य पिछड़ी जातियों ने भाजपा को संभावित विकल्प के रूप में देखना शुरू कर दिया है। भाजपा ने उनके खुद के पिछड़ा वर्ग से होने का इस्तेमाल सोच-समझकर संकेत देने के लिए किया था।
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सवाल उठता है कि यह समीकरण दिल्ली में क्यों कामयाब होता नहीं दिखता, जबकि यहां भारी संख्या में उत्तर प्रदेश और बिहार की गैर-सवर्ण जातियां हैं। ऐसी स्थिति तब है, जबकि मोदी ने व्यक्तिगत रूप से चुनावी नारा दिया कि जो देश चाहता है, वही दिल्ली चाहती है। मोदी ने खुद ही दिल्ली चुनाव को एक तरह से उनकी सतत लोकप्रियता पर जनमत संग्रह बनाना चाहा। अब भाजपा पिछले कुछ हफ्तों से केजरीवाल के चुनाव प्रचार के चरम पर पहुंचने के बाद इस वास्तविकता से इन्कार कर रही है। भाजपा के नेता स्वीकार करते हैं कि केजरीवाल ने उन्हें भ्रम में डाल दिया है।
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दिल्ली का जनादेश अभी नहीं आया है, इसके बावजूद भाजपा जाहिर तौर पर चिंतित है कि अत्यंत निर्धन वर्ग की दिलचस्पी भाजपा के प्रति जल्दी ही खत्म हो सकती है। अगर यह सच है, तो भाजपा को इस वर्ष के अंत में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में उतरने से पहले गंभीर आत्मनिरीक्षण करना होगा।

ऐसी भावना है कि मोदी लोकसभा चुनाव में मिले बहुमत से उपजे अपनी सरकार के बढ़ते अहंकार का उसी तरह शिकार हो सकते हैं, जिस तरह राजीव गांधी 1985-86 में हुए थे। इस अहंकार का एक बड़ा कारण है कि सरकार ने अपने निष्ठावानों की तुलना में अन्य लोगों की बात सुननी बंद कर दी है। इतिहास हमें बताता है कि सियासत का यह पुराना रोग है, लेकिन जहां तक राजग सरकार की बात है, तो इसे यह रोग जल्दी हो गया है।

मसलन, भाजपा इस बात से पूरी तरह आश्वस्त है कि उसने बड़ी संख्या में जो अध्यादेश लाए हैं, उसे लोगों ने सहजता से लिया है, क्योंकि वे मोदी को एक निर्णायक नेता मानते हैं तथा उन्हें भरोसा है कि मोदी 'प्रगति' की राह में किसी तरह का रोड़ा आने नहीं देंगे। भाजपा का अहंकार तब दिखता है, जब वह कानून के महत्वपूर्ण बिंदुओं पर बहस के विकल्प के तौर पर खुलेआम संसद का संयुक्त सत्र बुलाने की बात करती है। भाजपा के वरिष्ठ नेताओं को दृढ़ यकीन है कि कुछ ही समय बाद राज्यसभा में भी उनका बहुमत हो जाएगा। उनकी अंतर्निहित धारणा है कि मोदी की लोकप्रियता न केवल बरकरार है, बल्कि बढ़ रही है। भाजपा के आत्म-संतुष्ट प्रवक्ता कहते हैं कि चूंकि मोदी के प्रति लोगों की उम्मीदें अब भी बनी हुई हैं, इसलिए परेशान होने की जरूरत नहीं है। हालांकि दिल्ली के चुनाव में इस धारणा को भारी झटका लगा है, चाहे अंतिम नतीजा कुछ भी क्यों न हो।

वैसे हकीकत यह है कि अपनी ही बयानबाजी के जाल में मोदी के फंसने की शुरुआत हो गई है। लोहिया और गांधी के समाजवाद का उनका आह्वान आज हास्यास्पद लग रहा है, क्योंकि भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर विपक्षी दलों ने उन्हें घेरने की तैयारी कर ली है। लोहिया और गांधी, दोनों ही इस अध्यादेश को इस आधार पर सिरे से खारिज कर देते कि यह उद्योग के लिए किसानों की जमीन जबरन छीनने की बात करता है। सहमति का अनुबंध हमारी लोकतांत्रिक परंपरा का मूल है और इसे पूरी तरह से खत्म करना गैर-गांधीवादी काम है। दुर्भाग्य से यह अध्यादेश यही गैर-गांधीवादी काम कर रहा है।

याद कीजिए, मोदी ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि उनकी आर्थिक नीति को एक शब्द में प्रकट किया जा सकता है-ट्रस्टीशिप (सरपरस्ती या संरक्षण)। लेकिन ट्रस्टीशिप की मूल धारणा की आपने तभी हत्या कर दी, जब 'विकास' के बड़े उद्देश्य के नाम पर आपने साधारण लोगों की जमीन जबरन छीन ली। कोई आश्चर्य नहीं कि आज व्यावसायिक समुदाय और शेयर बाजार के बड़े निवेशक आगे बढ़कर चीख-चीखकर भूमि अधिग्रहण अध्यादेश का समर्थन कर रहे हैं। पूंजीपति वर्ग सोचता है कि संसद का संयुक्त सत्र जरूर बुलाया जाना चाहिए, क्योंकि मोदी को छोड़कर बाकी सभी राजनेता प्रगति को रोक रहे हैं। किसी भी राजनेता को तभी गंभीर चिंता शुरू कर देनी चाहिए, जब पूंजीपति वर्ग उसका सबसे मुखर समर्थक बन जाए!


दिल्ली के विधानसभा चुनाव का परिणाम प्रधानमंत्री मोदी के लिए पहली चेतावनी साबित हो सकते हैं कि वह हाल के विधानसभा चुनावों में मिली भाजपा की जीत के बाद अपने छवि प्रबंधकों द्वारा निर्मित 'बढ़ती लोकप्रियता की धारणा' से अतिशीघ्र बाहर आ जाएं। भारतीय राजनीति में चीजें तेजी से बदलती हैं। मोदी को आत्ममुग्धता से बाहर निकलकर अपने और एनडीए सरकार के कामकाज का तटस्थतापूर्वक आकलन करना चाहिए।

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