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मोदी के सामने लालू
नीलांजन मुखोपाध्याय
Updated Sun, 11 Oct 2015 07:38 PM IST
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बिहार के समस्तीपुर, बेगुसराय, खगड़िया, भागलपुर, बांका, मुंगेर, लखीसराय, शेखपुरा, नवादा और जमुई जिलों की 49 विधानसभा सीटों पर आज मतदान होने जा रहा है। लगभग बीस फीसदी सीटों का जनादेश आज ईवीएम में कैद हो जाएगा। बिहार की इस चुनावी लड़ाई में मुकाबला भले ही नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अब तक घोषित न किए गए मुख्यमंत्री के बीच होता लग रहा हो, पर वस्तुतः मुख्य मुकाबला मोदी और लालू के बीच है, जिनमें से कोई भी मुख्यमंत्री नहीं बनेगा।
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भाजपा के अब तक के चुनाव प्रचार अभियान का प्रमुख चेहरा मोदी ही रहे हैं, तो यह चुनाव लालू के शानदार राजनीतिक पुनरुत्थान का भी गवाह बन रहा है। वैसे तो लोकसभा चुनाव में भी उनका मत प्रतिशत काफी ज्यादा था, पर चुनावी विमर्श के केंद्र में वह खुद को नहीं ला पाए थे। पर इस बार पटना में जब महागठबंधन के प्रचार अभियान की विगत 30 अगस्त को शुरुआत हुई, तब स्टार वक्ता के रूप में उन्होंने सबसे अंत में भाषण दिया था। यह बताता है कि नीतीश कुमार महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के भले ही प्रत्याशी हों, पर स्टार प्रचारक तो लालू ही हैं। यहां तक कि भाजपा ने भी लालू यादव के खिलाफ ही नकारात्मक प्रचार करने का फैसला किया और तर्क दिया कि नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले महागठबंधन को वोट देने का मतलब जंगलराज को वोट देना है।
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पिछले कुछ हफ्तों में लालू यादव और नरेंद्र मोदी के बीच सार्वजनिक कड़वाहट दिखाई पड़ी। इसकी शुरुआत लालू यादव ने मोदी की नकल उतार कर की। लालू ने एक तो मजाक उड़ाकर प्रधानमंत्री का कद घटाया और फिर जातिगत ध्रुवीकरण को काफी मजबूत किया, जो बिहार में हमेशा एक निर्णायक तत्व रहा है। मोदी के जंगलराज के मुहावरे के ठीक उलट मंडलराज का नारा देकर उन्होंने अपने मतदाताओं से वायदा किया कि यदि महागठबंधन सत्ता में आता है, तो अधूरे एजेंडे को आगे बढ़ाया जाएगा।
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अपने प्रचार को मुख्यतः लालू यादव के खिलाफ केंद्रित कर मोदी ने दांव खेला। इसी तरह लालू को चुनाव अभियान के केंद्र में रखकर महागठबंधन ने भी जोखिम मोल लिया है। तथ्य यह है कि चुनाव में सभी राजनीतिक पार्टियां जाति कार्ड खेलती हैं। पर दूसरे नेता ऐसा जहां छिपे तौर पर करते हैं, वहीं लालू यादव खुलेआम कहते हैं कि उनकी पूरी राजनीति पिछड़ी जातियों को सशक्त बनाने को लेकर है। इसका सबसे बड़ा फायदा है कि उनके समर्थक पूरी तरह उनके साथ खड़े हैं। जिन यादव मतदाताओं ने उनका साथ छोड़ दिया था, उनके भी लालू के पक्ष में लौटने की संभावना है।
लेकिन लालू की इस चुनावी रणनीति का एक उलटा असर भी पड़ा है। इससे सवर्णों में ध्रुवीकरण हुआ है और शहरी मतदाता भी उनके खिलाफ हुए हैं। बेशक यह स्पष्ट है, क्योंकि पारंपरिक रूप से मीडिया शहरी केंद्रों का रुझान जानने में सफल रहा है, पर लालू के वोटरों पर इसका क्या असर पड़ा है, इसे जनादेश के बाद ही जाना जा सकता है। तर्क यह भी दिया जा रहा है कि बिहार के युवा जाति अस्मिता की राजनीति छोड़ अब विकास पर ध्यान दे रहे हैं। इसकी सच्चाई तो नतीजा आने के बाद पता चलेगी, पर इससे इन्कार नहीं कि 2010 के मुकाबले इस बार जाति का ज्यादा खुलकर इस्तेमाल हुआ है।
मोदी के कार्यकाल में यह पहला ऐसा विधानसभा चुनाव है, जिसमें सत्ताधारी दल के खिलाफ राज्य में खास सत्ता-विरोधी रुझान नहीं है। अब तक जितने भी चुनावी सर्वे सामने आए हैं, सबमें एक निष्कर्ष समान है कि जो लोग महागठबंधन को वोट नहीं करने वाले, उनका नजरिया भी नीतीश कुमार के खिलाफ नहीं है। वे भी मानते हैं कि नीतीश कुमार ने अच्छा काम किया है। खासकर उन्होंने अपराध पर नियंत्रण पाने और विद्युतीकरण एवं सड़क निर्माण परियोजनाओं की गति बढ़ाने में अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया है। हालांकि रोजगार सृजन के मुद्दे पर नीतीश का प्रदर्शन कमजोर रहा है, पर इस मुद्दे पर मोदी सरकार को भी अभी खुद को साबित करना है।
नीतीश कुमार की छवि जहां 'एक काम करने वाले मुख्यमंत्री' की है, वहीं मोदी को देशवासियों के मन में बढ़ती इस भावना को दूर करना होगा कि अपने वायदे पूरे में करने में उनकी सरकार कुछ हद तक ही सफल हुई है। मोदी को बिहार के मतदाताओं की अतिरिक्त राजनीतिक जागरूकता से निपटना होगा, जिन्होंने हाल के वर्षों में राज्य में उसी सरकार को वोट दिया है, जिसकी केंद्र में सरकार नहीं है। केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी को वोट देने का सवाल बुरी तरह से 'बिहारी बनाम बाहरी' के मुद्दे से जुड़ा हुआ है, जिसे नीतीश कुमार ने उठाया है।
तथ्य यह भी है कि राजग का प्रचार अभियान केवल भाजपा की किस्मत के आकलन पर केंद्रित है। राजग में भी तीन सहयोगी शामिल है, जो 83 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं। उनकी संभावनाओं का निर्धारण लोगों को प्रभावित करने की उनकी क्षमता से होगा। चूंकि केंद्र में गठबंधन के सदस्यों को शिकायत है कि सरकार के फैसले लेने की प्रक्रिया में उन्हें उचित महत्व नहीं दिया जाता; हालांकि जीतनराम मांझी की पार्टी इसकी अपवाद है, इसलिए उनके प्रचार के तरीके का भाजपा पर काफी महत्वपूर्ण असर पड़ेगा।
सवाल यह है कि वे सिर्फ अपने उम्मीदवारों के लिए प्रचार करेंगे या भाजपा उम्मीदवारों के पक्ष में भी प्रचार करेंगे। धरातल पर तो राजग गठबंधन काफी मजबूत दिख रहा है, पर सतह के नीचे काफी मतभेद हैं। इसके विपरीत राजनीतिक अस्तित्व के लिए चुनौतीपूर्ण संघर्ष होने के कारण नीतीश और लालू का महागठबंधन अपेक्षाकृत बेहतर दिख रहा है और वे अपने सहयोगियों के लिए भी प्रचार कर रहे हैं। यह बिहार के मतदाताओं को निर्णायक रूप से आकर्षित करने वाला है।
वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक