ताकत का बेजा इस्तेमाल
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प्रधान न्यायाधीश जस्टिस आर एम लोढ़ा ने मोदी सरकार को इस बात के लिए लताड़ा है कि कैसे उसने एकतरफा फैसला लेते हुए वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमण्यम की सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश के बतौर नियुक्ति पर रोक लगा दी। दरअसल प्रधान न्यायाधीश ने सुब्रमण्यम के साफ-सुथरे रिकॉर्ड को देखते हुए, उनके नाम की खासतौर पर सिफारिश की थी। मगर मोदी सरकार ने सर्वोच्च अदालत के प्रति असम्मान दिखाते हुए, कॉलेजियम ने जिन चार नामों की सिफारिश की थी, उनमें से सुब्रमण्यम का नाम हटा दिया। ऐसे में, प्रधान न्यायाधीश के पास सार्वजनिक तौर पर नाराजगी जाहिर करने के सिवाय कोई चारा नहीं बचा था। जाहिर है, मोदी सरकार पर लगा यह दाग न्यायपालिका के साथ उसके रिश्तों पर असर डालेगा।
मोदी सरकार ने एक पखवाड़े से भी ज्यादा वक्त तक सुब्रमण्यम की फाइल को रोके रखा, और उसे प्रधान न्यायाधीश के पास भी नहीं भेजा। इसी दौरान सरकार ने दूसरे तीन नामों को अपनी मंजूरी के साथ राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पास भेजने में तनिक देर नहीं लगाई। गोपाल सुब्रमण्यम की नजर में यह कानून का उल्लंघ्ान था, क्योंकि एकतरफा ढंग से उनका नाम हटाने से पहले सरकार ने प्रधान न्यायाधीश से सलाह नहीं ली थी। जब यह सब हो रहा था, तब प्रधान न्यायाधीश रूस की यात्रा पर थे। दरअसल, भूतपूर्व प्रधान न्यायाधीश एस वेंकटचलैय्या ने प्रधान न्यायाधीश लोढा को फोन पर ही बता दिया था कि सरकार कानून का घोर उल्लंघन कर रही है। तब जस्टिस लोढा ने उन्हें आश्वासन दिया था कि नई दिल्ली आने पर वह इस मामले को देखेंगे।
इस बीच, सरकार पहले ही कानून का उल्लंघन कर चुकी थी, और राष्ट्रपति भी उनके पास भेजे गए तीन नामों पर अपनी मुहर लगा चुके थे। इसके अलावा सरकार के एक वर्ग ने मीडिया में जिस तरह से उनके खिलाफ दुष्प्रचार में कोई कसर नहीं छोड़ी, सुब्रमण्यम के पास अपना नाम वापिस लेने के सिवाय कोई रास्ता नहीं था। सच तो यह है कि सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीश के तौर पर किसी उम्मीदवार की ऐसी अनदेखी सरकार की संकीर्ण मानसिकता को ही दर्शाती है। फिर सुब्रमण्यम का मामला तो एक संकेत भर है, कि आने वाले समय में एनडीए सरकार अपनी ताकत का कैसा इस्तेमाल करने वाली है। अब बात केवल एक न्यायाधीश की नहीं रह गई है, इस घटनाक्रम को 'उच्चतम न्यायपालिका के गुजरातीकरण' का संकेत कहा जा सकता है। मोटे तौर पर देखें, तो पिछले दस वर्षों में गुजरात सरकार ने अपनी राजनीतिक ताकत का जैसा इस्तेमाल किया, उससे राज्य के लोगों का प्रदेश की जांच व्यवस्था और न्यायिक तंत्र से भरोसा उठ चुका है। शायद यही वजह है कि सर्वोच्च अदालत ने दंगा पीड़ितों से जुड़े कई मामलों की सुनवाई की व्यवस्था राज्य से बाहर की। अगर यही हालत पूरे देश में हो जाए, तो नतीजों की भयावहता की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
कथित फर्जी मुठभेड़ में सोहराबुद्दीन और उसकी पत्नी की मौत और उसके बाद इस घटना के एकमात्र गवाह तुलसीराम प्रजापति की मौत का मामला भी उन्हीं में से एक है, जिसे सर्वोच्च अदालत ने निष्पक्ष जांच और सुनवाई के लिए गुजरात से बाहर भेजा। इस संदर्भ में सर्वोच्च अदालत ने गोपाल सुब्रमण्यम को सोहराबुद्दीन के मामले में अदालत को सहयोग करने आग्रह किया था। वह न सिर्फ इसके लिए राजी हुए, बल्कि इस मामले के तार अमित शाह से जुड़े होने के रहस्य को भी उन्होंने बेनकाब किया। शायद उनका यही कदम उनके सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश बनने की राह में रोड़ा बन गया। और अब भाजपा सरकार को लगता है कि लोकसभा चुनावों में मिले जनादेश की बदौलत, गुजरात से जुड़े सभी मामलों में न्यायपालिका ने अब तक जो भी कदम उठाए हैं, उनके राजनीतिकरण करने का उसे लाइसेंस मिल गया है।
यह महज संयोग नहीं है कि इधर केंद्र सरकार सुब्रमण्यम की नियुक्ति पर सवाल खड़े कर रही थी, और दूसरी ओर उसी दौरान मुंबई स्पेशल कोर्ट में सोहराबुद्दीन मामले में अमित शाह के वकील को न्यायाधीश की डांट सुननी पड़ी। दरअसल अमित शाह के वकील उनके अदालत में पेश न होने के पीछे बेहद कमजोर तर्क दे रहे थे। फिर अचरज नहीं, मुंबई के उस न्यायाधीश के तबादले की खबर सुनने में आई। ताकत का मजा तभी है, जब संयम के साथ इसका इस्तेमाल हो। मगर केंद्र की सत्ता संभालने के पहले महीने में तो भाजपा ऐसा दिखाने में नाकामयाब ही रही है।
2011 में यूपीए सरकार के दौरान जब सुब्रमण्यम ने सॉलिसिटर जनरल के पद से इस्तीफा दिया था, तब प्रधान न्यायाधीश जस्टिस लोढा ने निजी तौर पर उनके चरित्र, तौर-तरीकों और काम को लेकर उनकी प्रतिबद्धता की तारीफ की थी। मगर आज उन पर जो आरोप लग रहे हैं, वह जस्टिस लोढा की टिप्पणियों से मेल नहीं खाते। संदेह तब और गहराता है, जब हम देखते हैं कि सीबीआई और आईबी जैसी एजेंसियां, एनडीए के पिछले कार्यकाल समेत पिछले दो दशकों से बेहद नाजुक मसलों पर सुब्रमण्यम की सलाहों और योग्यता के प्रति सम्मान जाहिर करती रही हैं।
गौरतलब है कि संसद पर हमले जैसे महत्वपूर्ण मामले तक को भी पिछली एनडीए सरकार ने उनके ही सुपुर्द किया था। भूतपूर्व प्रधान न्यायाधीश एस एच कापड़िया भी मानते हैं कि अपने पूरे करियर में उन्होंने गोपाल सुब्रमण्यम जैसा योग्य, विद्वान और प्रखर व्यक्ति नहीं देखा। सरकारी एजेंसियां सुब्रमण्यम पर जैसे आरोप लगा रही हैं, वे इन प्रशंसाओं के बीच कितने तुच्छ लगते हैं।
उम्मीद थी कि बड़े जनादेश को उतने ही व्यापक नजरिये का साथ मिलेगा, मगर कार्यकाल के शुरुआती दौर में ही केंद्र सरकार छिछली चालाकियों का सहारा लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय जैसे संस्थान के प्रति दुर्भावना रखती दिख रही है।