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उस राम भक्त की याद

subhasini sehgal ali सुभाषिनी सहगल अली
Updated Fri, 15 Nov 2019 07:20 AM IST
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Memory of that ram bhakta
सुभाषिनी सहगल अली - फोटो : a

अयोध्या पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आ गया। बड़ा लंबा-चौड़ा फैसला है। लंबे रास्तों और छोटी-छोटी पगडंडियों से होते, सर्वोच्च न्यायालय अपने फैसले तक पहुंचा। जीतने वालों ने खुशियां मनाई। हारने वाले खामोश रहे। और शांति बनी रही। शायद इसका भी पता लग गया कि अशांति फैलाने वाले कौन होते हैं। फैसले तक पहुंचने की राह में मील का पत्थर एक तारीख है, जिसका जिक्र हुआ है। वह तारीख है 6 दिसंबर, 1992।


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6 दिसंबर की रात मेरे शहर कानपुर में दंगा शुरू हो गया था। वह कैसे शुरू हुआ और फिर कैसे एकदम से तब रुक गया, जब राष्ट्रपति शासन लगा और जिला प्रशासन बदल दिया गया, इसकी याद तो सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को सुनते हुए आई, पर इसके साथ बहुत दिन से भूली हुई याद भी अचानक आ गई। कानपुर के दक्षिणी छोर में नौबस्ता मोहल्ला है। यहां दुकानें हैं, कई मंदिर हैं, एक मस्जिद है और बहुत बड़ी आबादी है। इस आबादी में बंगले वाले भी हैं और बस्ती वाले भी। बस्ती वालों में हर धर्म और जाति के लोग हैं। उनके घर एक दूसरे से सटे हुए हैं।

इस बस्ती में आमिना अपने पति और दो बच्चों के साथ रहती थीं। आमिना हर तरह से अनोखी थीं। वह महिला नेता भी थीं और हरेक की हमदर्द भी। कभी वह रिक्शे वाले के लिए भिड़ जाती थीं, तो कभी सरकारी अस्पताल में मरीज के लिए। जाहिर है कि जब वह शहर भर में जानी-पहचानी थीं, तो अपने मोहल्ले में तो वह सबकी परिचित थीं। जब दंगा शुरू हुआ, तो आमिना के पति किसी रिश्तेदार के यहां और बच्चे पड़ोस में चले गए। आमिना लोगों की मदद में लग गईं और दंगाई उनकी तलाश में उनकी बस्ती में पहुंच गए। वे उनका नाम लेकर चिल्ला रहे थे, 'कहां है आमिना?'

आमिना के घर से सटा हुआ तिवारी जी का मकान था। तिवारिन और आमिना में गहरी दोस्ती थी। तिवारिन आमिना के घर का पानी नहीं पीती थीं, पर वह आमिना से प्यार बहुत करती थीं। दोनों बैठकर घंटों न जाने कहां-कहां की बातें कर खूब हंसतीं और एक दूसरे के गले में बाहें डाल देती थीं। जब दंगाई आमिना की तलाश में आए, तो उनके लिए अपने घर से निकलना असंभव था। तिवारिन सब कुछ सुन रही थीं। उन्होंने झट से, पिछला दरवाजा खोला और आमिना को अपने चौके में घसीट लिया।

दंगाई आमिना के घर से मायूस निकले। अपने दरवाजे पर उन्होंने तिवारिन को खड़ा देखा, तो रुककर उनसे पूछा ‘आमिना तुम्हारे घर में है क्या?’ और वे उसके घर में झांकने लगे। उन लोगों ने चौके की तरफ देखा, तो तिवारिन ने कहा, ‘ऊ तो चौका है।' दंगाई रुके, जाने लगे, फिर रुके। रुककर उन्होंने तिवारिन से कहा ‘रामायण उठाकर कसम खाओ कि आमिना तुम्हारे घर में नहीं है।’  तिवारिन ने मानस उठाई और कसम खा ली। इस घटना की जानकारी मुझे कुछ दिन बाद दंगा-पीड़ितों के शिविर में आमिना ने दी।  

मैं तिवारिन से मिलने नौबस्ता गई। मैंने कहा ‘तिवारिन, तुमने तो चौके के साथ-साथ अपना धरम भी भ्रष्ट कर दिया। झूठी कसम खा डाली।' तिवारिन ने जवाब दिया ‘जब रामजी मिलिहैं, तो हम उनका समझा देबे। ऊ हमका जरूर माफ कर देहैं। बाकी अगर हमरे पीछे आमिना मर जाती, तो हमरी कौनों माफी न होती’ (जब रामजी मिलेंगे, तो मैं उन्हें समझा दूंगी और वह मुझे माफ भी कर देंगे। लेकिन अगर हमारी वजह से आमिना मर जाती, तो हमें कभी माफी न मिलती।‘  सर्वोच्च न्यायालय ने जिस दिन अपना फैसला सुनाया, उस दिन, बहुत दिनों के बाद मुझे उस असली राम भक्त की याद आई।
-लेखिका माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य हैं।

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