दवाई ही नहीं, औजारों पर भी ध्यान दें
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देश की चिकित्सा सेवा में दलालों के गठजोड़ को मीडिया बराबर सामने ला रहा है। बताया जा रहा है कि चिकित्सा सेवा की पहुंच, उपलब्धता और सामर्थ्य में कितनी दिक्कतें हैं। इसमें मरीजों को होने वाली परेशानियों के विषय में भी बताया जा रहा है। मगर इन तमाम बहसों में यह नहीं कहा जा रहा कि जरूरत देश में एक बेहतर स्वास्थ्य तंत्र बनाने की है। वैश्विक आबादी का 18 फीसदी हिस्सा अपने यहां बसता है, मगर बीमारियों में हमारा योगदान 20 प्रतिशत है, जो पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा है। यही वजह है कि चिकित्सकीय उपकरणों पर खासा ध्यान देने की जरूरत है। यह स्वास्थ्य सेवा का ऐसा क्षेत्र है, जिसकी हमेशा अवहेलना की गई और उसे गलत समझा गया।
गैर संचारी रोगों (एनसीडी) के बढ़ने का कारण माने जाने वाले चिकित्सकीय उपकरण वास्तव में मरीजों को बेहतर करने और उनकी जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, मगर उन पर स्वास्थ्य सेवा के मद का सिर्फ छह फीसदी ही खर्च किया जाता है। अपने देश में दिक्कत यह है कि यहां चिकित्सकीय उपकरणों को भी दवाई का हिस्सा मान लिया गया है। जबकि सामान्य ज्ञान यही है कि दोनों बिल्कुल जुदा हैं। कई आधुनिक चिकित्सकीय उपकरण रोगों के मशीनी/ विद्युतीय इंजीनियरिंग निराकरण में इस्तेमाल होते हैं, वहीं दवाई औषध विज्ञान और रसायन शास्त्र पर आधारित होती है। इतना ही नहीं, चिकित्सकीय उपकरण मशीनी अथवा विद्युतीय गलती की वजह से नाकाम होते हैं, जबकि दवाई तब अपना असर नहीं दिखाती, जब मरीजों को या तो वह गलत दी जाती है अथवा जरूरत से ज्यादा दे दी जाती है। 1,300 लोगों पर किए गए एक हालिया सर्वेक्षण का नतीजा बताता है कि महज तीन-चौथाई लोगों ने ही चिकित्सकीय उपकरणों का इस्तेमाल किया। यानी महज छह फीसदी लोगों ने यह माना कि ये उपकरण दवाई से अलग हैं। इतना ही नहीं, स्थिति यह भी है कि दुनिया भर में मौजूद 14,000 तरह के उपकरणों में महज 14 ही भारत में मान्य किए गए हैं।
लिहाजा यह समझना अनिवार्य है कि उपकरणों और दवाइयों में आखिर अंतर क्या है? इसे एक उदाहरण से समझते हैं। एस्प्रीन नामक दवाई कहीं से भी खरीदें, उसकी गुणवत्ता समान रहेगी। मगर दिल संबंधी रोगों के इलाज में इस्तेमाल किए जाने वाले स्टेंट या हड्डियों के प्रत्यारोपण में इस्तेमाल होने वाले जीवनरक्षक उपकरणों को खरीदने में खासा ध्यान रखना होता है। स्टेंट के कई रूप बाजार में मौजूद होते हैं, जो उसकी लंबाई-चौड़ाई, मोटाई अथवा व्यास के आधार पर अलग-अलग होते हैं। इतना ही नहीं, दवाई को निगलने के बनिस्बत इन उपकरणों को शरीर में लगाने के लिए अतिप्रशिक्षित डॉक्टरों की जरूरत होती है, साथ ही ऑपरेशन के समय भी विशेष ध्यान रखना पड़ता है।
लिहाजा मरीज अधिक से अधिक सुरक्षित प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कर सके, इसके लिए जरूरी है कि हमारे नियामक इन्हें मंजूरी देते समय जोखिम आधारित दृष्टिकोण अपनाएं। बेशक कम जोखिम वाले उपकरण, मसलन सीरिंज, पट्टियां अथवा बैशाखियां सामान्य दवाई दुकानों में बेची जा सकती हैं, मगर अत्यधिक जोखिम वाले उपकरणों को लेकर खास नियम बनाने की जरूरत है। इसे उपयुक्त और जीवाणुहीन अस्पतालों में बेचने और मरीजों की विशिष्ट जरूरतों के हिसाब से मुहैया कराने की भी आवश्यकता है।
आमतौर पर यह माना जाता है कि आयातीत उपकरण 'काफी महंगे' होते हैं। मगर सच यह है कि भारत में चिकित्सकीय उपकरणों की कीमत दुनिया में सबसे कम है। मसलन, टांके में इस्तेमाल होने वाला धागा 25 रुपये से कम कीमत में ही उपलब्ध है; फिर चाहे वह देशी हो अथवा आयातित। सच्चाई यह है कि तकनीकी रूप से उन्नत उच्च जोखिम वाले चिकित्सकीय उपकरणों का 80 फिसदी हिस्सा हम विदेशों से मंगाते हैं। जब तक हमारे स्थानीय उद्योग मरीजों की इस जरूरत को पूरा करने में सक्षम नहीं हो जाते, इन उपकरणों के आयात शुल्क में कमी करके हम चिकित्सा क्षेत्र को लाभ पहुंचा सकते हैं। पर यहां भी जरूरत ऐसा माहौल बनाने की है, जिसमें चिकित्सकीय उपकरणों को हमारी स्वास्थ्य प्रणाली का विशिष्ट स्तंभ माना जाए। औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन (संशोधन) विधेयक 2013 में पहली बार इसे लेकर एक अलग अध्याय में परिभाषित किया गया है, जिससे भविष्य की उम्मीद बंधती है।