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हंबनटोटा में चीनी जहाज का मतलब : जासूसी को लेकर भारत की चिंताएं और कर्जदार श्रीलंका की मजबूरी

Sat, 20 Aug 2022 08:53 AM IST
Harsh Kakkar हर्ष कक्कड़
Updated Sat, 20 Aug 2022 08:53 AM IST
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सार
चीनी जहाज युआन वांग-5 भले ही श्रीलंकाई बंदरगाह पर रुका है, लेकिन उसका नियंत्रण चीनियों के हाथ में है। इससे पहले, वर्ष 2014 में दो चीनी पनडुब्बियां, जिसमें एक परमाणु शक्ति वाली पनडुब्बी भी थी, भारत की आपत्तियों के बावजूद श्रीलंका में रुकी थीं।
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Meaning of Chinese ship at Hambantota for india to Look its Maritime strategy
हंबनटोटा पहुंचा चीनी जासूसी जहाज - फोटो : ANI

विस्तार

भारत और अमेरिका की चिंताओं व आपत्तियों के बावजूद बीते 16 अगस्त को चीनी जासूसी जहाज युआन वांग-5 श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह पहुंच गया है। यह जहाज पहले 11 अगस्त को ही पहुंचने वाला था, लेकिन भारत की चिंताओं के कारण इसमें देरी की गई। चीन से चलने के बाद यह रास्ते में कहीं रुका नहीं, हालांकि इसकी गति जरूर धीमी कर दी गई। कोलंबो स्थित चीनी दूतावास ने श्रीलंकाई नेतृत्व को हंबनटोटा में इसे रुकने की अनुमति देने के लिए राजी कर लिया। चीन ने दावा किया कि यह केवल ईंधन भरने और चालक दल के 'रिफ्रेशमेंट' के लिए रुका है। इस जहाज के चालक दल में लगभग 2,000 सदस्य हैं। हंबनटोटा बंदरगाह का निर्माण वर्ष 2010 में चीन से कर्ज लेकर किया गया था। श्रीलंका इस बंदरगाह का फायदा उठाने में इसलिए विफल रहा, क्योंकि ज्यादातर जहाज हंबनटोटा बंदरगाह को बाइपास कर पहले से ही स्थापित कोलंबो बंदरगाह पर रुकते हैं। श्रीलंका सरकार चीन का कर्ज चुकाने में विफल रही और बंदरगाह को भारी नुकसान हुआ। तत्कालीन श्रीलंकाई प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने 99 साल के पट्टे पर एक चीनी कंपनी को बंदरगाह हस्तांतरित करने के समझौते पर दस्तखत किया था। भारत ने चीन के इस जासूसी जहाज पर चिंता जताई थी, लेकिन श्रीलंका के पास सीमित विकल्प थे।



चीनी जहाज युआन वांग-5 भले ही श्रीलंकाई बंदरगाह पर रुका है, लेकिन उसका नियंत्रण चीनियों के हाथ में है। इससे पहले, वर्ष 2014 में दो चीनी पनडुब्बियां, जिसमें एक परमाणु शक्ति वाली पनडुब्बी भी थी, भारत की आपत्तियों के बावजूद श्रीलंका में रुकी थीं। भारत की चिंता इस तथ्य से उपजी है कि युआन वांग मूलतः बैलिस्टिक मिसाइल और उपग्रहों का पता लगाने के लिए तैयार किया गया है, जिसके बारे में यह भी दावा किया जाता है कि यह जासूसी जहाज संचार और अन्य डाटा का पता लगाता है। यह ओडिशा तट स्थित अब्दुल कलाम परीक्षण रेंज से दागी गई भारतीय बैलिस्टिक मिसाइलों का पता लगा सकता है और उनकी सीमा और सटीकता को माप सकता है। इस जहाज की हवाई पहुंच 750 किलोमीटर है, जो दक्षिण भारत स्थित भारतीय रक्षा प्रतिष्ठानों को अपनी निगरानी के दायरे में ला सकती है। इस जहाज को समुद्री सर्वेक्षण के लिए भी तैयार किया गया है, जो पनडुब्बी संचालन के लिए आवश्यक है। चीनी वर्षों से ऐसा करते आ रहे हैं। भारत को इस बात की चिंता है कि भविष्य में अन्य चीनी नौसैनिक जहाज श्रीलंका पहुंच सकते हैं।


चिंता का एक कारण यह भी है कि यह जहाज अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त कोलंबो बंदरगाह पर नहीं, बल्कि चीनी नियंत्रित हंबनटोटा बंदरगाह पर रुका है। इस जहाज का स्वागत अन्य लोगों के साथ कोलंबो स्थित चीनी राजदूत ने किया, जो इस क्षेत्र में चीनी जहाज के आगमन के महत्व को प्रदर्शित करता है। तथ्य यह है कि यह जहाज भारतीय चिंताओं के बावजूद हंबनटोटा में रुका, जिसे चीन की कूटनीतिक जीत माना जा रहा है। इस जहाज की रहस्यमय प्रकृति तब स्पष्ट हुई, जब जहाज की अगवानी करने वाले चीनी राजदूत को भी जहाज पर चढ़ने की अनुमति नहीं दी गई। भारत अपने हितों के क्षेत्र में सभी चीनी नौसैनिक जहाजों की आवाजाही पर नजर रखता है, इसलिए हिंद महासागर में प्रवेश के बाद से युआन वांग-5 की गति का अनुमान लगा सकता है। हालांकि श्रीलंकाई लोगों ने कहा कि वे नहीं चाहते कि हंबनटोटा का इस्तेमाल सैन्य उद्देश्यों के लिए किया जाए, लेकिन इसकी संभावना बहुत कम है, क्योंकि बंदरगाह एक चीनी कंपनी के नियंत्रण में है।

 श्रीलंका ने यह कहते हुए डॉकिंग (रुकने) की अनुमति देने के अपने निर्णय का बचाव किया कि यह जहाज एक 'अनुसंधान जहाज' की श्रेणी के तहत बंदरगाह पर आया था। इस जहाज में चीनी नौसैनिक हैं, इसलिए इसे अनुसंधान जहाज नहीं माना जा सकता है। चीनी राजदूत ने संभवतः जहाज को रुकने देने की बीजिंग की इच्छा पर इसलिए जोर दिया, क्योंकि बंदरगाह चीनी कंपनी के अधीन है और जहाज में युद्ध जैसे सामान नहीं हैं, इसलिए इसकी आवाजाही को रोका नहीं जा सकता है, और समझौते के तहत श्रीलंका सरकार के पास सीमित विकल्प हैं। चीन ने हंबनटोटा में रुकने के अपने फैसले का बचाव करते हुए दावा किया, 'युआन वांग-5 की समुद्री वैज्ञानिक अनुसंधान गतिविधियां अंतरराष्ट्रीय कानून और अंतरराष्ट्रीय आम रिवाज के अनुरूप हैं।'

भारत के लिए यह हंबनटोटा में रुकने वाले चीनी नौसैनिक जहाजों की एक शृंखला की शुरुआत हो सकती है। दीर्घ काल में इस बंदरगाह का सैन्यीकरण भी किया जा सकता है। भले ही श्रीलंका भारत के करीब है और विशेष रूप से आर्थिक पतन के बाद सहायता के लिए भारत पर निर्भर है, लेकिन वह एक स्वतंत्र देश है, जिसके चीन के साथ अपने संबंध हैं। श्रीलंका पर चीन का आठ अरब डॉलर का बकाया है, जबकि आर्थिक पतन से उबरने के लिए संघर्ष कर रहे श्रीलंका को भारत चार अरब डॉलर की सहायता दे रहा है। इस तरह से भारत श्रीलंका को कुछ हद तक ही मदद कर सकता है, लेकिन उससे आगे श्रीलंका सरकार स्वयं अपना निर्णय लेगी। एक बार जब श्रीलंका ने जहाज को रुकने की अनुमति देने की घोषणा कर दी, उसके बाद भारत सरकार ने कोई बयान नहीं दिया।

 यह संभव है कि श्रीलंकाई नेतृत्व ने भारत से परामर्श किया हो और अपनी दुविधा बताई हो, जिसे भारत ने मान लिया होगा। भारत ने चीनी जहाज के आगमन से ठीक एक दिन पहले श्रीलंका को एक डोर्नियर विमान उपहार में दिया था, जिसका अर्थ है कि युआन वांग-5 के रुकने का भारत-श्रीलंका संबंधों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। चीनी जहाज शीघ्र ही हंबनटोटा बंदरगाह से प्रस्थान कर सकता है, हालांकि, अगले कुछ महीनों के लिए वह हिंद महासागर में रहेगा और भारतीय गतिविधियों की निगरानी के साथ-साथ समुद्री सर्वेक्षण भी करेगा। भारतीय नौसैनिक एजेंसियां इस जहाज की निगरानी करती रहेंगी, क्योंकि यह भारत के हितों के क्षेत्र में काम करेगा। चीनी जहाजों की आवाजाहीकी निगरानी से ज्यादा जरूरी यह है कि हम अपने हितों के क्षेत्र में चीनियों का मुकाबला करने के लिए अपनी खुद की नौसैनिक शक्ति का विकास करें।

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