भागवत की हिदायत के मायने
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दिवंगत समाजवादी नेता बापू कालदाते कहा करते थे कि भारतीय जनता पार्टी दरअसल राजनीतिक दल है ही नहीं। वह सांस्कृतिक-सामाजिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजनीतिक इकाई है। इसलिए वह एक स्वायत्त राजनीतिक दल की तरह काम कर ही नहीं सकती। हो सकता है कि बापू कालदाते की इस बात से बहुत लोग सहमत न हों। कुछ लोग इसे 'छद्म धर्मनिरपेक्ष' लोगों का षड्यंत्र भी मानेंगे। लेकिन यह बात भाजपा के नेता भी मानते हैं कि संघ उनकी मातृ संस्था है। हालांकि संघ की ओर से यह सफाई दर्जनों बार दी जा चुकी है कि वह भाजपा के कामकाज में दखल नहीं देता, लेकिन वास्तविकता में ऐसा दिखता नहीं है। चाहे वह लालकृष्ण आडवाणी को अध्यक्ष पद से हटाने का फैसला हो या फिर नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने का, तय संघ मुख्यालय में ही होता है।
अगर यह सच है, तो क्यों संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपने स्वयंसेवकों को हिदायत दी कि नमो-नमो करना उनका काम नहीं है? इस पर संघ की सफाई से सहमत हुआ जा सकता है कि संघ प्रमुख के बयान को गलत ढंग से समझा गया। दरअसल मीडिया ने समझा कि संघ नरेंद्र मोदी का विरोध कर रहा है। सच यही है कि संघ प्रमुख नरेंद्र मोदी का विरोध नहीं कर रहे थे। वह चाहें भी तो अब ऐसा नहीं कर सकते। अब इस दांव पर बहुत कुछ लगा हुआ है। नरेंद्र मोदी को लेकर भाजपा बहुत दूर तक जा चुकी है। इतनी दूर कि लौटना चाहे भी, तो इस चुनाव में नहीं लौट सकती। तो फिर यह बयान क्यों आया?
इसके लिए भाजपा की अंदरूनी राजनीति को समझना होगा। पहली बात यह कि भाजपा कैडर वाली पार्टी है। कार्यकर्ताओं और संगठन के आधार पर चलती है। पार्टी के भीतर लोकतंत्र भले ही अंशत: ही लागू होता हो, लेकिन वहां कांग्रेस की तरह एकतरफा फैसले नहीं होते। ऐसे में संघ भी जानता है कि उसे हर हाल में कई नेताओं को साथ लेकर चलना होगा। कोई एक तारणहार की तरह भले ही दिखता हो, लेकिन वह पार्टी के रथ को अकेले नहीं खींच सकता। यही वजह है कि जब अटल बिहारी वाजपेयी सर्वमान्य नेता थे, तब भी लालकृष्ण आडवाणी का कद कम नहीं होने दिया गया। ऐसी पार्टी में आज मोदी का जो कद बन गया है, उससे पार्टी के कई और नेता एकाएक बौने दिखाई देने लगे हैं। चाहे वह पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह हों या फिर लोकसभा और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष क्रमशः सुषमा स्वराज और अरुण जेटली। भले ही देश में मतदाताओं का एक वर्ग इस बात से आश्वस्त हो कि देश में मोदी की लहर है, लेकिन संघ को जमीनी हकीकत पता है। उसे पता है कि कल जब परिणाम आएंगे, तब दूसरे नेताओं की भी जरूरत होगी और सहयोगी दलों की भी। ऐसे में संघ यह खतरा नहीं उठा सकता कि पार्टी नमो-नमो करती रहे और दूसरे नेता उपेक्षित होकर हाशिये पर चले जाएं।
दूसरी बात यह कि अब तक मोदी की कार्यप्रणाली से संघ को भी एहसास हो गया है कि वह बेहद आत्मकेंद्रित व्यक्ति हैं। पिछले छह महीनों में उन्होंने जितने भी भाषण दिए हैं, उसके विश्लेषण से पता चलेगा कि उसमें अहम् ब्रह्मास्मि जैसी ध्वनि नजर आती है। इन भाषणों में न संघ के सिद्धांतों का जिक्र है और न उसके योगदान का। संघ का इतिहास गवाह है कि वह किसी भी नेता का कद बड़ा होना तो बर्दाश्त कर सकता है, लेकिन संगठन से बड़ा नहीं। उन्होंने वाजपेयी के अनुभव से सबक सीखा है। जब केंद्र में एनडीए की सरकार थी, तब वाजपेयी संघ के बहुत से सुझावों को अनदेखा करने लगे थे। कौन नहीं जानता कि गोविंदाचार्य संघ के कितने चहेते थे, लेकिन वाजपेयी की जिद में उन्हें दरकिनार करना ही पड़ा। हालांकि वाजपेयी ने संघ के प्रति अपना रुख कभी रूखा नहीं होने दिया, लेकिन अनुमान लगाया जा सकता है कि संघ नमो-नमो के जाप से क्यों परहेज करना चाहता है।
तीसरी बात और ठोस वजह है, वर्ष 2004 के चुनाव परिणाम। भाजपा के नेतृत्व वाली पहली केंद्र सरकार छह साल की अपनी उपलब्धियों से आत्ममुग्ध थी। तब लालकृष्ण आडवाणी के सुझाव और संघ की सहमति से समय पूर्व चुनाव करवाने का फैसला किया गया था। आडवाणी और दिवंगत नेता प्रमोद महाजन ने अपने 'वॉर रूम' में शाइनिंग इंडिया का नारा चुना था। वह नारा मतदाताओं के लिए था। चुनाव परिणाम आने के बाद अनौपचारिक बातचीत में महाजन ने स्वीकार किया था कि गलती यह हो गई कि इस नारे पर मतदाताओं से पहले कार्यकर्ताओं ने भरोसा कर लिया। परिणाम यह हुआ कि एक चुनाव में जितनी मेहनत कार्यकर्ताओं को करनी थी, उतनी भी नहीं की गई। एनडीए की सत्ता पलट गई। संघ को वह सबक याद है। इसलिए संघ प्रमुख ने समय रहते अपने स्वयंसेवकों को चेता दिया है कि पिछली बार की तरह न हो जाए। कहीं ऐसा न हो कि इस बार नमो-नमो करते रह जाएं।
जब गठबंधन ही राजनीतिक समीकरण का सच हो गया है, तो हो सकता है कि संघ प्रमुख मतदाता और दूसरे राजनेताओं को भी एक संदेश देना चाहते हों। संदेश यह कि संघ भाजपा का पिछलग्गू नहीं है या फिर यह कि भाजपा अपना काम खुद करे, संघ अपना खुद करेगा। कहना कठिन है कि संघ और भाजपा के रिश्तों के गड्डमड्ड में यह संदेश किस हद तक अभीष्ट तक पहुंचेगा।
ऐसा नहीं है कि मोहन भागवत के इस बयान में मोदी के लिए कोई संकेत नहीं था। वह तो सौ प्रतिशत था। लेकिन यह संदेश उनके खिलाफ नहीं था। यह संघ और भाजपा के कार्यकर्ताओं के लिए एक चेतावनी थी। अब अगर इसका गलत संदेश नीचे तक पहुंच गया, तो भाजपा को परेशानी हो सकती है।