शास्त्रीय संगीत में जुगलबंदी कायम रहे: गुरु-शिष्य परंपरा में मजहब मायने नहीं रखता, यह विविधताओं को जोड़ता है
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विस्तार
करीब बीस साल पहले मैं एक अकादमिक सम्मेलन में शामिल होने लाहौर गया था। वहां मेरी मुलाकात शास्त्रीय संगीत सीखने वाले एक युवा गायक से हुई। वह अपने गुरु से संगीत सीखने के लिए हर सप्ताह कराची जाता था। मुझे भले ही सुर का कोई ज्ञान नहीं है, लेकिन हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत से लगाव रहा है। इसलिए प्रतिभाशाली पाकिस्तानी गायक से एक बात जानकर मुझे हैरानी हुई। उसने बताया कि उसके गुरु एक खास राग का उपहास करते हुए कहते थे कि वह तो ‘हिंदुओं का राग’ है। मैंने उसे यह नहीं बताया कि भारत में शास्त्रीय संगीत के कलाकारों के बीच इस तरह का भेदभाव नहीं होता। मैं उसे बता सकता था कि उसकी पसंदीदा गायिकाओं में से एक रोशनआरा बेगम ने पाकिस्तान जाने के बाद भी शंकरा और दुर्गा जैसे रागों को गाना जारी रखा था, जबकि इन रागों के नाम हिंदू देवी-देवताओं पर आधारित हैं। मैं उसे सलामत अली खान की गाई ठुमरी ‘नदिया किनारे मोरा गांव’ का उदाहरण भी दे सकता था। सलामत अली भी पाकिस्तान में रहते थे।
लाहौर में उस गायक से हुई बातचीत तब फिर याद आई, जब मैं महात्मा गांधी के दस्तावेजों का अध्ययन कर रहा था। ये दस्तावेज प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय के नाम से प्रसिद्ध संस्थान में रखे हैं। दस्तावेजों में मुझे एक ऐसी फाइल मिली, जिसका संबंध शास्त्रीय संगीत से था।
नवंबर 1944 में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के प्रख्यात गायक ओंकारनाथ ठाकुर ने गांधी को एक पत्र लिखा था। उन्होंने पत्र में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में संगीत संकाय शुरू करने में गांधी से मदद मांगी थी। ठाकुर का कहना था कि विश्वविद्यालय में प्रस्तावित इस नए विभाग के माध्यम से भारतीय शास्त्रीय संगीत की विभिन्न शैलियों का व्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन किया जा सकेगा। उन्होंने गांधी को लिखा था, “संगीत की शैलियों के चयन में किसी भी प्रकार का नस्लीय भेदभाव नहीं किया जाएगा। भारतीय संस्कृति में संगीत का जो स्थान है और भारतीय सभ्यता में मौजूद विभिन्न प्रवृत्तियों के बीच समन्वय स्थापित करने की जो अद्भुत क्षमता उसमें है, वह सब जानते हैं।” ओंकारनाथ ठाकुर चाहते थे कि गांधी इस नई पहल का साथ दें और इसके लिए धन जुटाने में मदद भी करें। इस फाइल में दक्षिण भारतीय वायलिन वादक परूर सुंदरम अय्यर का पत्र भी शामिल था, जिसमें उन्होंने ठाकुर के प्रस्ताव के समर्थन में विचार रखे थे।
मूल रूप से केरल के रहने वाले सुंदरम अय्यर ने 7 नवंबर, 1944 को गांधी को लिखे पत्र में अपनी नई योजना को समर्थन देने का आग्रह किया। उनका मानना था कि भारत में एक व्यवस्थित संगीत विश्वविद्यालय की स्थापना देश में पिछले कई वर्षों से आयोजित हो रहे विभिन्न संगीत सम्मेलनों की गतिविधियों को एक मुकाम तक पहुंचाने वाला कदम होगी। सुंदरम अय्यर ने लिखा, “हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने में संगीत सबसे प्रभावशाली माध्यम है।” उन्होंने यह भी बताया कि हिंदू और मुस्लिम संगीतकार नैमत खां (सदारंग के नाम से प्रसिद्ध) कबीर, तुलसी और मीरा की रचनाएं गाते हैं और उस दौरान किसी भी तरह के विवाद में नहीं पड़ते। सुंदरम अय्यर ने पत्र इस अपील के साथ समाप्त किया, “आशा है कि गांधी संगीत विश्वविद्यालय की स्थापना करने की कृपा करेंगे, ताकि हमारे संगीत की अमर और अमूल्य धरोहर की गरिमा बनी रहे। विश्वविद्यालय की स्थापना होते ही हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रसार होगा और हमें लंबे समय से जिस स्वराज की प्रतीक्षा है, वह प्राप्त हो सकेगा।” जहां ठाकुर ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को विभिन्न परंपराओं के बीच समन्वय स्थापित करने वाला माध्यम बताया था, वहीं सुंदरम अय्यर ने स्पष्ट शब्दों में उसे हिंदू-मुस्लिम एकता का एक प्रमुख साधन बताया। वह किराना घराने के अब्दुल करीम खां के करीबी मित्र और प्रशंसक थे।
दुर्भाग्य से, महात्मा गांधी की ओर से सुंदरम अय्यर को लिखे किसी जवाब का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। हालांकि उन्होंने ठाकुर को संक्षिप्त उत्तर दिया था। गांधी का सुझाव था कि ठाकुर को शांति निकेतन के मॉडल का अनुसरण करना चाहिए और संगीत को स्वाभाविक रूप से विकसित होने देना चाहिए। इसके लिए राजनीतिक संरक्षण या कॉरपोरेट जगत के धन पर निर्भर रहने के बजाय संगीत को स्वाभाविक विकास का अवसर देना उचित होगा। 1948 में गांधी का निधन हो गया। इसके दो वर्ष बाद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में संगीत संकाय की स्थापना हुई, जिसके प्रमुख ओंकारनाथ ठाकुर बनाए गए। उस समय सुंदरम अय्यर स्वयं मद्रास विश्वविद्यालय में संगीत के प्रोफेसर के रूप में कार्यरत थे। उनके बेटे और शिष्य एम.एस. गोपालकृष्णन ने कर्नाटक और हिंदुस्तानी, दोनों संगीत शैलियों में वायलिन बजाना शुरू किया। वह कभी-कभी ओंकारनाथ ठाकुर के साथ भी संगत करते थे। उसी दौरान ओंकारनाथ ठाकुर के सान्निध्य में संगीत साधना करने कर्नाटक संगीत में प्रशिक्षित युवा वायलिन वादक एन. राजम बनारस आईं, जो आज भी 88 वर्ष की उम्र में संगीत साधना कर रही हैं। उन्हें इस समय जीवित महानतम शास्त्रीय वाद्य संगीतकारों में से एक माना जाता है। बनारस में रहने वाली तमिल मूल की एन. राजम ने बनारस की ही धरती पर पले-बढ़े बिस्मिल्लाह खान के साथ कई यादगार जुगलबंदियां कीं। उनकी प्रस्तुतियां इस बात की शानदार मिसाल हैं कि संगीत हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत करने वाला एक प्रभावशाली माध्यम है। यदि नादस्वरम को कर्नाटक संगीत परंपरा में शहनाई के समकक्ष माना जाए तो दक्षिण भारत में बिस्मिल्लाह खान के लगभग समानांतर व्यक्तित्व शेख चिन्ना मौलाना थे। वह मंदिरों के शहर श्रीरंगम में रहते थे और वहीं नादस्वरम बजाते थे।
शास्त्रीय संगीत ऐसा क्षेत्र है, जहां हिंदुओं और मुसलमानों ने सबसे अधिक साथ रहकर काम किया, साधना की और मिलकर रचनाएं सृजित कीं। इस संदर्भ में यह महत्वपूर्ण है कि केसरबाई केरकर के लिए अल्लादिया खान का क्या महत्व था या रविशंकर के संगीत व्यक्तित्व के निर्माण में अलाउद्दीन खान की क्या भूमिका रही। वहीं, एक खूबसूरत मिसाल आगरा घराने के शराफत हुसैन खान और लताफत हुसैन खान की यमन राग में प्रस्तुत की गई वह शानदार बंदिश भी है, जिसका मुखड़ा है- ‘दर्शन देवो शंकर महादेवा’। यह रचना भारतीय संगीत की उस साझा सांस्कृतिक विरासत का प्रमाण है, जिसमें धार्मिक पहचानें कला की सीमाएं तय नहीं करतीं।
वास्तव में, विभाजन ने हमारी संगीत विरासत की परंपरा को गहरी चोट पहुंचाई। इस नुकसान के संकेत पाकिस्तान में दिखाई दिए और वहां इसका असर लंबे समय तक बना रहा। इसी पृष्ठभूमि में यह भी समझा जा सकता है कि बड़े गुलाम अली खान ने 1950 के दशक में पाकिस्तान को छोड़कर भारत लौटने का फैसला क्यों किया। 1947 के बाद पाकिस्तान में सार्वजनिक मंचों पर सक्रिय हिंदू या सिख संगीतकार लगभग न के बराबर रह गए। वहीं, भारत में दर्जनों, बल्कि सैकड़ों उत्कृष्ट मुस्लिम और सिख संगीतकार सक्रिय रहे। उन्हें व्यापक सराहना मिली और उनमें से कई ने हिंदू शिष्यों को भी संगीत की शिक्षा दी। इस तरह भारत में संगीत की साझा परंपरा जीवित रही।
बॉलीवुड भी अब काफी हद तक बदल रहा है, हालांकि कभी उसने ही लता मंगेशकर का जादुई असर पैदा करने वाला वह गीत ‘अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम’ रचा था, जिसे 1961 में साहिर लुधियानवी ने लिखा था और जयदेव ने संगीतबद्ध किया था? यह गीत दोनों धर्मों के ईश्वर को एक ही भाव से संबोधित करता है। हमारा शास्त्रीय संगीत भारतीय सभ्यता की बड़ी उपलब्धियों में से एक है। इसकी मूल प्रकृति में समाई बहुलता, विविधता और सांस्कृतिक समन्वय की परंपरा कायम रहनी चाहिए।