शहादत बड़ी या जाति

तरुण विजय Updated Mon, 27 Jun 2016 08:01 PM IST
Martyrdom large or race
तरुण विजय
कश्मीर में जेहादी आतंकवादियों से लड़ते हुए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के कांस्टेबल वीर सिंह (52) शहीद हो गए। एक ओर जहां पूरा देश शहीद को श्रद्धांजलि दे रहा था, वहीं उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के नगला केवल गांव में तथाकथित सवर्ण उस शहीद की चिता के लिए जमीन तक के उपयोग की अनुमति नहीं दे रहे थे। जमीन सार्वजनिक थी। वहां शहीद की पार्थिव देह पंचतत्वों में विलीन होती और वहां उनकी मूर्ति भी लगती। वीर सिंह को जेहादियों की गोलियां लगने का हम दुख मनाएं या इन विकृत मानस से किए गए शहीद के अपमान का?
जेहादी वीर सिंह को नहीं जानते थे, वे उन्हें सिर्फ भारत को प्रतीक मानकर चल रहे थे। जो भी भारत का रक्षक है, वर्दीधारी है, वह उनके निशाने पर आता है। 52 वर्षीय वीर सिंह, उनके बच्चे,पिता, परिवार-सब कुल मिलाकर हिंदुस्तान बन गए जेहादियों के लिए। लेकिन हिंदुस्तान के अहंकारी जातिवादियों ने वीर सिंह को क्या माना? सिर्फ एक 'छोटी' जात का दलित या नट या अछूत या बस तिरस्कार के योग्य मनुष्य से भी कम देहधारी। दुख इस बात का है कि देश में सड़क दुर्घटना के अपराधी को सजा का प्रावधान है, परंतु शहीद सैनिक का अपमान करने वाले के लिए सजा ही नहीं है। पर ये वीर सिंह हिंदू समाज के तिरस्कृत, जाति भेद पीड़ित, अंबेडकर की भाषा में बहिष्कृत भारत के नागरिक होते हैं। इनकी मेधा, मेधा नहीं। इनकी बहादुरी, बहादुरी नहीं। इनकी शहादत सिर्फ सन्नाटा ओढ़े एक मौत मान ली जाती है। हम ढोंग करते हैं, महान धर्मशास्त्रों और विचारों का। स्वामी विवेकानंद ने इसी पर चोट करते हुए कहा था कि महान धर्मग्रंथों का बखान करने के बावजूद जाति में डूबे हिंदुओं का व्यवहार निकृष्टतम है।

आज के हिंदू समाज सुधारक यह कहने का साहस भी नहीं कर पाएंगे कि अगर ब्राह्मण को ही शिक्षा के लिए सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है, तो फिर उन पर किया जाने वाला शिक्षा का खर्च बंद कर केवल उन पर खर्च करो, जिन्हें अछूत या दलित कहा जाता है।
जाति भेद का यह शत्रुतापूर्ण कटु सत्य तब कभी-कभी सामने आता है, जब मीडिया में समाचार छपते हैं कि शंकर और कौशल्या का विवाह हुआ, तो भले ही दोनों हिंदू थे, लेकिन शंकर को इसलिए कौशल्या के सामने तड़पा-तड़पाकर मार डाला गया, क्योंकि वह छोटी जाति का था, जिसने तथाकथित बड़ी जाति की कौशल्या से प्रेम करने का अपराध किया था। कौशल्या आज भी कोयंबटूर के पास अपने शंकर के घर में ही रहती है। वह अपने मायके नहीं गई, पर कौशल्या का दुख बांटने कोई साधु-संन्यासी नहीं गया। वे सब यह बखान करने में व्यस्त रहे कि उनका कोई ग्रंथ अस्पृश्यता की इजाजत नहीं देता। इन कथनों का सत्य तो शिकोहाबाद में वीर सिंह के साथ जो घटा, उससे प्रकट होता है, न कि जिल्दबंद किताबों से सजी आलमारियों द्वारा।

बाईस हजार सीवर कर्मचारी जो लगभग सभी वाल्मीकि या दलित थे, सीवर की सफाई करते हुए उपयुक्त उपकरणों के अभाव में मारे गए। क्या आपने सुना कि उन पर कभी किसी ने चर्चा की या इन स्वच्छता शहीदों के बारे में बेहतर जीवन जीने का विचार रखा?

कुछ समय पहले हम वीर सिंह जैसे लोगों की जाति के युवाओं के साथ उत्तराखंड के जौनसार बावर क्षेत्र में मंदिर दर्शन के निमित्त गए। वहां पत्थरों की ऐसी बरसात हुई कि हमें जान बचाकर भागना पड़ा। अगर एक भी पत्थर गलती से सही निशाने पर पड़ा होता या हम उन पढ़े-लिखे सवर्णों की भीड़ में फंस गए होते, तो यह लेखक श्रद्धांजलि का विषय बन चुका होता। उस पर तुर्रा यह कि इस मामले में दोष उन्हीं पर मढ़ा गया, जिन्होंने मंदिर दर्शन के समान अधिकार की मांग की थी। सबसे रोचक बात तो यह हुई कि इन समरसता और समानता के धुरंधर नेताओं ने दलों की दीवारें लांघकर एक सवर्ण एकजुटता स्थापित कर ली, ताकि पत्थर फेंकने वालों का महिमामंडन हो तथा पत्थर खाकर लहूलुहान होने वाले स्वयं अपराधबोध से ग्रस्त किए जा सकें।

जाति भेद की नफरत यदि समझनी और जाननी है, तो गांव, शहर, कस्बे के कोनों पर रहने वाले अनुसूचित जाति के किसी परिवार की जिंदगी का एक दिन जीकर देखिए। आजकल केवल सवर्णों की बैठक में सवर्णों द्वारा समरसता की बात कर सवर्णों से तालियां पिटवाने का शौक बढ़ गया है। उनका असर सामाजिक समरसता और समानता पर कितना होता है? कुछ आध्यात्मिक विभूतियां आज भी हैं, जो अस्पृश्यता के विरुद्ध अपने-अपने स्तर पर लड़ रही हैं। लेकिन जब तक समाज में जाति भेद के विरुद्ध अस्वीकृति का स्वर मुख्यधारा का स्वर नहीं बनता और अनुसूचित जाति के लोगों को सजावटी पदों के बजाय महत्वपूर्ण निर्णायक पदों पर बिठाना जरूरी नहीं माना जाता, तब तक इस देश और वीर सिंह को जेहादी और जातिवादी आतंक को एक साथ ढोने पर मजबूर होना पड़ेगा।

विडंबना यह है कि जिस मीडिया में समानता की बातों पर बहुत कुछ लिखा जाता है, वहां दलितों की उपस्थिति एक प्रतिशत भी नहीं होती, क्योंकि दलित दुख पर लिखने वाले मुख्यधारा की मीडिया में शामिल नहीं किए जाते। जो काम रामविलास पासवान या मायावती के हिस्से में छोड़ दिया जाता है, ताकि मंदिर प्रवेश से लेकर विद्यालयों और नौकरियों में प्रवेश की बात वही करें, वह काम उसी तरह सर्वसमावेशी समाज को करना चाहिए, जैसे महामना मदनमोहन मालवीय ने किशोर जगजीवन राम को सासाराम से बुलाकर काशी हिंदू विश्वविद्यालय में निःशुल्क शिक्षा दिलाकर किया था या बाला साहेब देवरस ने स्वयंसेवकों को निर्देश दिया था कि यदि अस्पृश्यता पाप नहीं है, तो कुछ भी पाप नहीं है, इसलिए अस्पृश्यता मिटाने के लिए काम करना हमारे स्वयंसेवकत्व को सार्थक करता है। पर दुख है कि केवल मोहन भागवत को यह आह्वान करना पड़ता है कि हिंदुओं के लिए दो श्मशान घाट, दो कुएं और दो मंदिर हमें अस्वीकार्य हैं। इस पर बाकी लोग क्यों नहीं बोलते?

जाति भेद का दुख भारत मां का दुख है, और हिंदुओं को अभी तक समझ नहीं आया कि अंबेडकर को यह क्यों कहना पड़ा कि था कि मैं हिंदू पैदा जरूर हुआ हूं, लेकिन हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं।

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