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त्योहारों के मौसम में बाजार

Mon, 19 Oct 2015 07:18 PM IST
उपेंद्र प्रसाद
उपेंद्र प्रसाद Updated Mon, 19 Oct 2015 07:18 PM IST
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Market during festival season

देश की अर्थव्यवस्था की दूसरी छमाही शुरू हो गई है। यह दूसरी छमाही व्यापारिक-आर्थिक गतिविधियों का व्यस्त सीजन है और इसकी व्यस्तता त्योहारों के कारण बढ़ जाती है। नवरात्र से बाजार में जो तेजी शुरू होती है, वह दीपावली के बाद तक चलती है। जिनके धंधे में मंदी आ रही होती है, वे उम्मीद करते हैं कि उस मंदी की भरपाई इस छमाही की तेजी से पूरी कर लें। पर सवाल यह है कि इस साल की दूसरी या अंतिम छमाही में बाजार का मूड क्या है। कारोबारियों के लिए क्या यह उत्साह का सौगात लेकर आया है या इसका संदेश कुछ और ही है?

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थोक मूल्य सूचकांक के आधार पर मुद्रास्फीति की दर नीची बनी हुई है। नीची क्या, यह तो नकारात्मक जोन में भी आ गई थी। कुछ खाद्य वस्तुओं में महंगाई की दर बहुत ज्यादा है, लेकिन कुल मिलाकर उपभोक्ता सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति की दर भी कम ही है। इस माहौल में केंद्रीय बैंक पर पिछले एक साल से दबाव पड़ रहा था कि वह मुद्रा नीति की कठोरता को कम करे और बैंकिंग व्यवस्था की ब्याज दर को कम करने वाले निर्णयों की घोषणा करे, लेकिन रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ब्याज दर में कटौती की मांग लगातार नकार रहे थे। वह ऐसा कदम नहीं उठाना चाहते थे, जिससे बाजार में कीमतें बढ़े, लेकिन लगातार बढ़ते दबाव के कारण और मुद्रास्फीति के गिरते आंकड़ों के कारण उन्होंने भी ब्याज दर कम करने का निर्णय कर ही लिया।
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रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दर कम करने के उपायों की घोषणा के बाद बाजार में तेजी आई है। शेयर बाजार रिकॉर्ड ऊंचाई को छूने के बाद कमजोर होने की प्रवृत्ति दिखा रहा था। शेयर सूचकांकों की उठापटक के बीच लग रहा था कि आनेवाला समय शेयर बाजार के लिए मनहूस हो सकता है, पर रिजर्व बैंक द्वारा अपनी मुद्रा नीति को थोड़ा मुलायम कर लेने के कारण शेयर बाजार को सहारा मिल रहा है, हालांकि चीन जैसी अर्थव्यवस्थाओं द्वारा अपने संकट का हल करने के लिए उठाए जा रहे उपायों का भी विपरीत असर शेयर बाजार पर पड़ता है।
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प्रधानमंत्री की 'मेक इन इंडिया’ परियोजना विदेशी निवेश को आकर्षित करने में सफल हो रही है। यह भारत में निवेश माहौल के प्रति विदेशियों के बढ़ते विश्वास का सूचक है। हालांकि अब भी भारत में निर्विघ्न निवेश के रास्ते में बहुत बाधाएं है, लेकिन निवेश माहौल के प्रति विदेशियों के बढ़ते विश्वास और विदेशी निवेश के बढ़ने के कारण शेयर बाजार का भविष्य बेहतर है। त्योहारों के इस माहौल में शेयर बाजारों में निवेश के खतरे ज्यादा नहीं हैं।

सोना भारतीयों के लिए विशेष आकर्षण की वस्तु है। त्योहारों में इसकी रिकॉर्ड खरीदारी होती रही है। पिछले कुछ वर्षों से इसकी कीमतें बढ़ी हुई थीं। कीमत बढ़ने के कारण इसकी मांग भारत में कमजोर हो गई थी। निवेश के दूसरे उपकरण के उपलब्ध होने के कारण इसकी खरीद भी प्रभावित हुई थी। जब यह अपनी रिकॉर्ड कीमत से नीचे खिसकने लगा, तो इसकी मांग भारत में और भी कमजोर हो गई, क्योंकि डर लगा कि कहीं यह और भी सस्ता न हो जाए, पर लगता है कि अब यह अपने सबसे निचला स्तर प्राप्त कर चुका है और इसके और भी नीचे जाने की संभावना बहुत कम है। जाहिर है, उत्सव के इस माहौल में सोने की चमक बाजार में फिर लौटने की संभावना है।

देश का संपत्ति बाजार पिछले दो साल से तबाह है। रियल एस्टेट कंपनियों की मांग थी कि रिजर्व बैंक ब्याज दर घटाए और कम दर के होम लोन को संभव बनाए। केंद्रीय बैंक ने कुछ हद तक उनकी मांग मान ली है, लेकिन प्रॉपर्टी बाजार की समस्या सिर्फ होम लोन की दर ही नहीं है। इसकी समस्या यह है कि इसमें बहुत तेजी आई थी और यह अपनी ही तेजी का शिकार हो गया है। महंगे-महंगे फ्लैट बना लिए गए हैं और उन कीमतों पर उनके ग्राहक ही नहीं हैं। जिन कीमतों पर ग्राहक उपलब्ध हैं, उन कीमतों पर प्रॉपर्टी उपलब्ध नहीं है। बड़े-बड़े शहरों और उनके उपनगरों में अधिक कीमतों वाले इतने मकान उपलब्ध हैं कि बिकने की वर्तमान गति के हिसाब से उनके स्टॉक समाप्त होने में छह साल से भी ज्यादा लग जाएंगे।

प्रॉपर्टी बाजार की यह कमजोरी देश की अर्थव्यवस्था के लिए अशुभ संकेत है, क्योंकि मकानों के निर्माण में छह सौ उद्योगों के उत्पादों का इस्तेमाल होता है। जाहिर है, मकान निर्माण में रुकावट से इन छह सौ उद्योगों में मंदी आने का खतरा पैदा हो गया। वैसे अनेक उद्योग तो मंदी के शिकार हो भी गए हैं। मकान निर्माण रोजगार देने का भी एक बहुत बड़ा जरिया है। इसमें आई मंदी बेरोजगारी को भी बढ़ावा दे रही है, जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए शुभ नहीं है। इसलिए रियल इस्टेट और मकान निर्माण सेक्टर को लेकर हमारे नीति निर्माताओं को गंभीर चिंतन करना पड़ेगा कि इससे जुड़ी समस्या से कैसे निपटा जाय।

जहां तक उपभोक्ता बाजार की बात है, तो इसमें तो त्योहारों के दौरान तेजी आ ही जाती है। पिछले साल कुछ कम तेजी आई थी और अनेक कारोबारी मंदी की शिकायत कर रहे थे। लेकिन इस बीच बाजार की हलचलें कुछ तेज हुई हैं। ऑनलाइन कारोबारी कंपनियों को मिल रहे रिकॉर्ड ऑर्डर इसके संकेत हैं कि उपभोक्ता बाजार पिछले साल की तुलना में ज्यादा संपन्न है।


रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दर में कटौती किए जाने के कारण उपभोक्ता बाजार में भी तेजी आनी स्वाभाविक है। इसके कारण देश की अर्थव्यवस्था में ज्यादा नकदी आ जाती है। चाहे तरीका जो हो, उपभोक्ताओं की क्रयशक्ति बढ़ जाती है, और बाजार को यही चाहिए। जाहिर है, तमाम कमियों के बावजूद त्योहारों के मौसम में इस बार बाजार में ज्यादा रौनक रहने की संभावना है। प्रॉपर्टी बाजार को छोड़ दिया जाय, तो अन्य अनेक बाजार अब बेहतर स्थिति में आ गए हैं।

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